छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार (आरटीई) कानून में संशोधन के लिए पेश विधेयक को लोकसभा में बुधवार को पारित कर दिया गया। यह विधेयक कुछ दिनों पहले राज्यसभा में पारित हो चुका है। इसमें मदरसा, वैदिक पाठशाला जैसी अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं को आरटीई के दायरे से बाहर करने और सभी तरह की अशक्तता वाले बच्चों को शिक्षा के अधिकार का प्रावधान किया गया है। मुस्लिम बहुल इलाकों में लड़कियों के लिए स्कूल खोलने की मांग करते हुए राजग ने सिब्बल के जवाब का बहिष्कार किया। बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार संशोधन विधेयक 2012 पर चर्चा का जवाब देते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि शिक्षा के अधिकार कानून में संशोधन कर सभी तरह के अशक्त बच्चों को कक्षा में सामान्य बच्चों की तरह शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि इसके तहत आटिज्म, सेरेबल्र पाल्सी, मानसिक अशक्तता और अन्य तरह की अशक्तता वाले बच्चों को कक्षा में अन्य बच्चों की तरह शिक्षा का अवसर प्रदान करने की व्यवस्था है। इसके लिए कानून में अशक्तता की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है। हमारा मानना है कि छह से 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। मंत्री ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून के संबंध में कुछ वगरे से यह मांग की जा रही थी कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को इसके दायरे से बाहर रखा जाए। इस मांग को स्वीकार करते हुए मदरसा, वैदिक पाठशालाओं जैसे अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं को आरटीई के दायरे से बाहर रखा गया है। सिब्बल ने कहा कि यह भी मांग की गई थी कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को स्कूल प्रबंधन समिति के दायरे से बाहर रखा जाए। इसे भी स्वीकार कर लिया गया है और अब ऐसे मामलों में स्कूल प्रबंधन समिति की परामर्शक की भूमिका होगी। उन्होंने कहा कि इस संबंध में उच्चतम न्यायालय का भी निर्णय सामने आया है जिसमें कहा गया है कि इस कानून का कोई प्रावधान गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थओं पर लागू नहीं होगा हालांकि यह सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं पर पूरी तरह से लागू होगा। सिब्बल ने कहा कि कानून में एक और संशोधन करते हुए यह प्रावधान किया गया है कि सभी श्रेणियों में छात्र-शिक्षक अनुपात को कानून लागू होने के तीन वर्षो में मापदंड के अनुरूप बनाया जाएगा। साथ ही इस कानून के अमल में किसी तरह की बाधा को केंद्र दूर करेगा। डिस्लेक्सिया पीड़ित बच्चों को भी कानून के दायरे में लाया जाएगा : केंद्र सरकार ने बुधवार को लोकसभा में घोषणा की कि डिस्लेक्सिया-जैसी मानसिक बीमारी से पीड़ित बच्चों को भी मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून के दायरे में जल्द ही लाया जाएगा। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने राज्यसभा से पारित हो चुके नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार संशोधन विधेयक 2012 पर चर्चा शुरू होने से पहले सदस्यों को आस्त किया कि सरकार डिस्लेक्सिया-जैसी गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रस्त छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को भी इस कानून के दायरे में लाएगी ताकि उनके भी शिक्षा के अधिकार सुनिश्चित हो सकें।
Saturday, May 19, 2012
निजी स्कूलों में गरीबी कोटे की फीस बढ़ेगी!
शिक्षा के अधिकार कानून (आरटीई) के तहत राजधानी के निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए दिल्ली सरकार अधिकतम फीस में बढ़ोतरी करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह लवली ने विशेष बातचीत में इसका खुलासा किया। उन्होंने साफ तौर कहा कि निजी स्कूलों के इस अनुरोध पर दिल्ली सरकार की ओर से विचार किया जा रहा है और जल्द ही इस पर कोई फैसला सरकार ले लेगी। शिक्षा मंत्री श्री लवली ने कहा कि दिल्ली सरकार सरकारी स्कूलों के बच्चों पर जितना खर्च करती है उतना ही उन्होंने पब्लिक स्कूलों में गरीबी कोटे में पढ़ने वाले बच्चों को दे रही है। लेकिन निजी स्कूलों ने इसे कम बताकर इसे बढ़ाने का अनुरोध किया है जिस पर बातचीत चल रही है। शिक्षा अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर बैठक हुई है। दरअसल मौजूदा समय में निजी स्कूलों को दिल्ली सरकार अधिकतम प्रति बच्चा 1190 प्रति भुगतान कर रही है। अभी तक स्कूल वाले इस लिए चुप थे कि उन्हें लग रहा था सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हें राहत मिल जाएगी लेकिन जिस प्रकार से सुप्रीम कोर्ट ने गरीबी कोटे के मामले में उन्हें राहत न देते हुए हर हाल में 25 फीसदी गरीबी कोटे को लागू करने का आदेश सुना दिया उसके बाद अब निजी स्कूल दिल्ली सरकार को यह कह कर दबाव बना रहे हैं कि सरकार या तो गरीबी कोटे की फीस बढ़ाए या अन्यथा वे सामान्य बच्चों की फीस में और ज्यादा इजाफा कर देंगे जिससे सामान्य बच्चों पर फीस का दबाव बढ़ेगा। इस बाबत अत्यधिक फीस वाले निजी स्कूलों ने दिल्ली सरकार को लिखित रूप से अनुरोध किया कि उनकी व्यवस्थाओं और खर्चो को देखते हुए गरीबी कोटे की अधिकतम फीस 1190 रुपए में बढ़ोतरी किया जाए। निजी स्कूलों में बीते दो सालों से गरीबी कोटे के तहत 25 फीसदी गरीब बच्चों का दाखिला हो रहा है। इसमें राजधानी के वे भी 100 पब्लिक स्कूल शामिल हैं जहां फीस 5 हजार 10 हजार रुपए तक है। 100 ऐसे स्कूल है जहां फीस 3 से 5-6 हजार प्रति बच्चा फीस है। इन स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए सरकारी फीस 1190 की गई है।
Monday, April 23, 2012
बुनियादी शिक्षा का समाजवादी सपना
अभिजीत मोहन शिक्षा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए जरूरी है। शिक्षा सभ्यता और संस्कृति की जीवंतता का आधार भी है। शिक्षा के माध्यम से ही समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता और सामाजिक गैर-बराबरी को खत्म किया जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव होगा, जब समाज में शैक्षिक भेदभाव की जगह समान बुनियादी शिक्षा सुलभ होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में क्रांतिकारी पहल की है। उसने शिक्षा का अधिकार कानून 2009 को संविधान सम्मत मानते हुए उस पर अपनी मुहर लगा दी है। अब छह से 14 साल के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देने का रास्ता साफ हो गया है। मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने राजस्थान की संस्था सोसायटी फॉर अनऐडेड प्राइवेट स्कूल और कई निजी स्कूलों से जुड़े संगठनों द्वारा शिक्षा के कानून अधिकार को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला देते हुए कहा है कि यह कानून सरकारी और सरकार द्वारा नियंत्रित स्कूलों, गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों और सरकारी सहायता लेने वाले अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू होगा। न्यायालय ने गैर सहायता प्राप्त निजी अल्पसंख्यक स्कूलों को कानून के दायरे से बाहर रखा है। शीर्ष अदालत का दूरगामी फैसला शिक्षा का अधिकार कानून-2009 को याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय में चुनौती दे रखी थी। उनके मुताबिक शिक्षा का अधिकार कानून निजी शैक्षणिक संस्थानों को अनुच्छेद 19 (1) जी के अंतर्गत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन करता है, जिसमें निजी प्रबंधकों को सरकार के दखल के बिना अपने संस्थान चलाने की स्वायतत्ता प्रदान की गई है। किंतु अदालत ने साफ कर दिया है कि शिक्षा अधिकार कानून संविधान सम्मत है और उसका अनुपालन अनिवार्य है। न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी है कि देश भर में सरकारी और गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होंगी। न्यायालय का फैसला दूरगामी परिणामों को समेटे हुए है। इस फैसले के बाद अब गरीब बच्चों के लिए सुविधासंपन्न स्कूलों का द्वार खुल गया है। वे भी अब इन स्कूलों में दाखिला ले सकते हैं। बता दें कि शिक्षा का अधिकार विधेयक कैबिनेट द्वारा 2 जुलाई, 2009 को स्वीकृत किया गया। राज्यसभा ने इस विधेयक को 20 जुलाई 2009 और लोकसभा ने 4 अगस्त, 2009 को पारित किया तथा 26 जुलाई, 2009 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद 27 अगस्त, 2009 को भारत सरकार के राजपत्र में प्रकाशित किया गया। फिर 1 अप्रैल, 2010 से इसे लागू कर दिया गया है। आजादी के बाद ही संविधान निर्माताओं ने शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में शामिल करना चाहा था, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके। छह दशक बाद संसद ने इस अधिकार की आवश्यकता को समझते हुए वर्ष 2002 में संविधान के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा नया अनुच्छेद 21-क जोड़कर इसे मूल अधिकार के रूप में अध्याय तीन में शामिल कर प्रवर्तनीय बना दिया। अब शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों के मुताबिक बच्चे या उसके अभिभावक से किसी भी प्रकार से सीधे या परोक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। यानी बच्चे की बुनियादी शिक्षा का जिम्मा सरकार के कंधे पर होगा। शिक्षा अधिकार कानून के मुताबिक केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय प्राधिकारी और माता-पिता सबके कर्तव्य सुनिश्चित किए गए हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद यह कानून अपना आकार कैसे लेता है और किस तरह केंद्र और राज्य सरकारें इस कानून को अमलीजामा पहनाती हैं। इस कानून को व्यावहारिक रूप देने में अब भी ढेरों कठिनाइयां हैं। इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए राज्य सरकारों को अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी। हालांकि निजी स्कूल प्रबंधकों ने शिक्षा अधिकार कानून का विरोध किया था, लेकिन न्यायालय का फैसला आने के बाद उनके लिए आदेश का अनुपालन बाध्यकारी होगा। किंतु वे इस फैसले से बहुत खुश नहीं हैं। यही वजह है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए याचिका दाखिल कर दी है। निजी स्कूल प्रबंधन तर्क दे रहे हैं कि इस फैसले से शिक्षा का स्तर गिरेगा और स्कूलों का वातावरण खराब होगा। 25 फीसदी आरक्षण उन्हें और भी विचलित कर रहा है। उनका कहना है कि दाखिले में आरक्षण अनुचित और अव्यावहारिक है। इससे विद्यालयों की आर्थिक स्थिति बिगड़ेगी। लेकिन सच्चाई यह है कि इन आरक्षित वर्ग के बच्चों की पढ़ाई का खर्चा पूरी तरह से राज्य सरकारों द्वारा उठाया जाना है। ऐसे में इस बात की आशंका बढ़ जाती है कि कानूनी प्रावधानों की डर से भले ही निजी स्कूल गरीब बच्चों को अपने यहां दाखिला दे दें, लेकिन क्या वे उनके साथ समानता का व्यवहार करेंगे? इस पर सहज विश्वास नहीं होता है। इसलिए भी कि उनका तंत्र गरीब बच्चों को लेकर संवेदनशील नहीं है। ऐसे में डर यह भी है कि कहीं भेदभाव की वजह से गरीब बच्चों के मन में हताशा का भाव न पैदा हो या वे कहीं डिप्रेशन के शिकार न हो जाएं। निजी हितों से ऊपर उठें निजी स्कूल आज जरूरत इस बात की है कि निजी स्कूलों का प्रबंध तंत्र राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए अपने संकीर्ण विचारों से ऊपर उठे और खुले मन से गरीब बच्चों को अपनाए। यह उनका सामाजिक और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व भी है। शिक्षा से वंचित बच्चों को शिक्षित करना सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं का उत्तरदायित्व है और निजी स्कूल प्रबंध तंत्र अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है। शिक्षा अधिकार कानून-2009 की सफलता के लिए राज्य सरकारों को भी सक्रिय होना पड़ेगा। दुर्भाग्य यह है कि इस कानून को लागू हुए दो साल होने जा रहे हैं, किंतु अभी तक कई राज्य सरकारों ने अधिसूचना तक जारी नहीं की है। वह भी तब जब केंद्र सरकार द्वारा आश्वासन दिया जा चुका है कि कानून के अनुपालन में किसी प्रकार धन की कमी नहीं आने दी जाएगी। शिक्षा अधिकार कानून 2009 के मुताबिक राज्य सरकारों को सुनिश्चित करना होगा कि गरीब वर्ग का कोई भी बच्चा किसी भी कारण से प्राथमिक शिक्षा से वंचित न हो। गुणवत्तायुक्त शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उनका काम है। सच तो यह है कि राज्य सरकारों की निष्कि्रयता की वजह से ही आज शिक्षा बदहाल स्थिति में है। पठन-पाठन की दुर्दशा चरम पर है। ढांचागत सुविधाओं का बेहद अभाव है। बच्चों के अनुपात के लिहाज से शिक्षकों की भारी कमी है। अगर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की बात करें तो यहां शिक्षकों के लाखों पद खाली हैं, लेकिन वित्तीय समस्याओं के कारण राज्य सरकारें शिक्षकों की भर्ती नहीं कर रही हैं। कक्षाओं की कमी के कारण विद्यालयों को दो-तीन पारियों में चलाना पड़ रहा है। पुराने विद्यालयों के भवन जर्जर हैं। कभी भी दुर्घटना के बड़े कारण बन सकते हैं। आज भी कई गांव ऐसे हैं, जहां दूर-दूर तक स्कूल नहीं हैं। विद्यालय और आवासीय क्षेत्रों में दूरी के कारण अधिकांश बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि राज्य सरकारें दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालय खोलें और उचित परिवहन साधनों का इंतजाम करें। यह कम विडंबना नहीं है कि जहां निजी विद्यालयों में वातानुकूलित कक्ष, सुसज्जित पुस्तकालय, व्यायामशाला, प्रयोगशाला, स्वच्छ पानी, शौचालय, खेल के मैदान आदि उपलब्ध हैं, वहीं सरकारी विद्यालयों के पास इन सुविधाओं का अभाव है। सरकार की मिड डे मील योजना से स्कूलों में छात्रों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन पढ़ाई-लिखाई का कार्य प्रभावित हो रहा है। ऐसी स्थिति में बदलाव लाने के लिए शिक्षा अधिकार कानून को ईमानदारी से लागू करना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Monday, April 16, 2012
गरीबों का अक्षर अधिकार
शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए भले ही दो साल हो गए हों पर इसके क्रियान्वयन को लेकर अस्पष्टता कभी कम नहीं हुई। अब जबकि इस कानून पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आया है, सरकार के लिए अपनी कार्यनीति तय करने में बड़ी मदद मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय में इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने फैसला सुनाया है कि देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में 25 फीसद गरीब बच्चों के दाखिले के प्रावधान में कहीं कोई विसंगति नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण के इस दायरे से सिर्फ सरकारी सहायता न पाने वाले अल्पसंख्यक संस्थानों को बाहर रखा है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए यह भी साफ किया कि यह फैसला गुरुवार यानी 12 अप्रैल से ही लागू होगा। लिहाजा इससे कानून के पास हो जाने के बाद हुए दाखिले प्रभावित नहीं होंगे। जाहिर है, न्यायालय इस महत्वपूर्ण कानून को भविष्य में कारगर रूप में देखना चाहता है। इसलिए अपने फैसले में भी उसने इस नजरिए को व्यापक तरजीह दी और गत वर्ष तीन अगस्त को सुरक्षित रखे फैसले को अंतिम रूप से सुनाने में इतना समय लिया। यह अलग बात है कि यह फैसला सर्वसम्मति से आने के बजाय बहुमत से आया। तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ में शामिल मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडिया और न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार ने जहां आरक्षण की हिमायत की, वहीं तीसरे न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन की राय में सरकारी सहायता न पाने वाले निजी और अल्पसंख्यक स्कूलों पर 25 फीसद आरक्षण की बाध्यता लागू नहीं होनी चाहिए। बहरहाल, अब जबकि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर लंबे समय से चली आ रही कई तरह की गलतफहमियों को दूर कर दिया है, गेंद एक बार फिर से सरकार के पाले में है। 2010 में जब यह कानून लागू हुआ था, तभी से यह सवाल केंद्र और राज्य सरकारों के सामने है कि वे प्राथमिक स्तर के शैक्षणिक ढांचे को कैसे चुस्त-दुरुस्त करें! पिछले दो सालों में पुराने स्कूलों में सुधार, नए स्कूल खोलने से लेकर शिक्षकों की बहाली तक के मुद्दों पर या तो पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया या फिर कुछेक कदम उठे भी तो वे भारी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। ऐसे में उम्मीद बांधना कि रातों रात सब कुछ ठीक हो जाएगा, कुछ ज्यादा ही उत्साह से भर जाना है। हाल में देश में प्राथमिक शिक्षा की सालाना ‘असर’ रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिससे सरजीमीनी हकीकत समझने में मदद मिलती है। रिपोर्ट के मुताबिक कई तरह के प्रोत्साहन कार्यक्रमों और सरकारी दबाव में ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में दाखिले का आंकड़ा तो 96.7 फीसद तक पहुंच गया पर उपस्थिति के मामले में यह बढ़त नजर नहीं आती। आलम यह है कि 2007 की स्थिति से तुलना करें तो 2011 में उपस्थिति का आंकड़ा 73.4 से खिसककर 70.9 पर आ गया। यही नहीं, इस चर्चित रिपोर्ट में स्कूलों में दी जा रही शिक्षा की स्तरीयता पर भी कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यह जरूर होगा कि अब सरकारी के साथ निजी विद्यालय भी सर्वशिक्षा का लक्ष्य पाने में जुटेंगे। पर यह महज इतनी अनुकूलता से पूरा होने से रहा। सरकार को चाहिए कि वह अपने अधीन आने वाले शैक्षणिक संस्थाओं को ढांचागत रूप से संपन्न करने के साथ शिक्षा की स्तरीयता बहाल करने के लिए कड़ी निगरानी व्यवस्था भी विकसित करे।
निजी स्कूलों को पढ़ाने होंगे 25 फीसदी गरीब
सुप्रीमकोर्ट ने 6 से 14 साल के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा के मौलिक अधिकार पर अपनी मुहर लगा दी है। अब गरीब बच्चों का हाईफाई निजी स्कूलों में पढ़ाई का सपना पूरा होगा। देश भर में सरकारी व गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होंगी। शीर्ष अदालत ने शिक्षा के कानून को संविधान सम्मत ठहराते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा, शिक्षा का कानून 2009 संविधान सम्मत है। मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने शिक्षा के कानून अधिकार को चुनौती देने वाली निजी स्कूलों की याचिका पर फैसले में कहा कि यह कानून सरकारी व सरकार द्वारा नियंत्रित संस्थाओं के स्कूलों, गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों और सरकारी सहायता या अनुदान प्राप्त करने वाले अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू होगा। गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों पर यह लागू नहीं होगा। कोर्ट ने कहा, कानून की धारा 12(1)(सी) और 18(3) संविधान के अनुच्छेद 30 (1) के तहत अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मिले अधिकार का उल्लंघन करती है। हालांकि न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन ने अलग से फैसला सुनाते हुए कहा है गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों पर भी 25 फीसदी गरीब बच्चों को मुफ्त में प्रवेश देने का कानून लागू नहीं होगा। न्यायमूर्ति राधाकृष्णन का फैसला अल्पमत का है, अत: यह प्रभावी नहीं होगा। दो न्यायाधीशों के बहुमत काफैसला ही प्रभावी होगा। यह फैसला आज से यानि 12 अप्रैल से लागू होगा। जो बच्चे पहले ही गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक स्कूलों में प्रवेश ले चुके हैं, उनके प्रवेश के मामलों में कोई रुकावट नही आएगी। मालूम हो कि सरकार ने संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 21 ए जोड़ा था जो कि 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है। अधिकार को लागू करने के लिए सरकार मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 लेकर आई। यह एक अप्रैल 2010 से लागू हो गया। इसमें कहा गया है कि प्रत्येक स्कूल को पड़ोस में रहने वाले बच्चों को अपने यहां प्रवेश देना होगा। और प्रत्येक स्कूल 25 फीसदी सीटें गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करेगा। इन्हें मुफ्त में शिक्षा दी जाएगी और उनसे किसी तरह की फीस नहीं ली जाएगी। निजी स्कूलों ने इस कानून को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी। सोसाइटी फार अनएडेड स्कूल आफ राजस्थान आदि की ओर से दाखिल याचिकाओं का निपटारा करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। निजी स्कूलों की दलील थी कि उन्हें संविधान में रोजगार का मौलिक अधिकार प्राप्त है और सरकार उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यह भी दलील थी कि वे जब सरकार से कोई सहायता नहीं लेते तो फिर सरकार उन पर मुफ्त शिक्षा देने का दबाव कैसे डाल सकती है। सुप्रीमकोर्ट ने दलीलें खारिज करते हुए कहा कि यह सही है कि संविधान में सभी को मनपसंद रोजगार या व्यवसाय करने और उसके प्रबंधन का मौलिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन सरकार कानून बना कर इस अधिकार पर कुछ नियंत्रण लगा सकती है। इसलिए शिक्षा का अधिकार कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने कहा है कि शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में आने वाली बाधाएं दूर करने के उद्देश्य से लाया गया है।
सर्व शिक्षा की तर्ज पर उच्चतर शिक्षा अभियान
शैक्षिक रूप से पिछड़े जिलों में बीते पांच वर्षो में 374 मॉडल डिग्री कालेज खोलने में नाकाम रही सरकार अब उच्च शिक्षा में बेहतरी के नए टोटके आजमाने की सोच रही है। उसका इरादा अब सर्वशिक्षा अभियान की तर्ज पर राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान शुरू करने का है। उसके तहत जिलों में नए डिग्री कालेज खोलने पर विचार चल रहा है। राज्य सरकारों को जमीन तो मुफ्त उपलब्ध करानी ही होगी, जबकि बाकी खर्च में तीन चौथाई बोझ केंद्र उठा सकता है। सूत्रों के मुताबिक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान नाम से प्रस्तावित नई योजना का मसौदा तैयार किया है। उसके तहत 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) में शैक्षिक रूप से पिछड़े जिलों में 374 मॉडल डिग्री कालेज खोलने की शुरू की गई योजना को उसमें मिला दिया जाएगा। नए विश्वविद्यालयों को खोलने की पहल होगी। पहले से चल रहे विवि को उच्चीकृत किया जाएगा। नए डिग्री कालेज भी खुलेंगे। गौरतलब है कि पिछली योजना में 374 मॉडल डिग्री कालेज खोलने के लिए लागत का एक तिहाई खर्च केंद्र को, जबकि बाकी दो तिहाई राज्यों को उठाना था। आठ करोड़ की लागत से बनने वाले इन डिग्री कालेजों के लिए केंद्र 2.66 करोड़ रुपये ही दे रहा था। खर्च के बड़े बोझ के चलते राज्यों ने हाथ खींच लिए और पांच साल में लगभग 80 डिग्री कालेज ही खुल पाए। लिहाजा इस बार प्रस्तावित योजना में केंद्र व राज्यों के बीच खर्च का बंटवारा 75:25 करने पर विचार चल रहा है। जबकि विशेष दर्जा वाले राज्यों में यह बंटवारा 90:10 का हो सकता है। जबकि नए संस्थानों के लिए मुफ्त में जमीन उपलब्ध कराने का पूरा जिम्मा राज्य सरकारों पर होगा। सरकार ने उच्च शिक्षा में मौजूदा लगभग 17 प्रतिशत के सकल दाखिला दर को 2020 तक 30 प्रतिशत करने का लक्ष्य तय किया है। सरकार को उम्मीद है कि इस कदम से इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। साथ ही उच्च शिक्षा में क्षेत्रीय असंतुलन दूर की जा सकेगी। हालांकि इस प्रस्तावित योजना पर अमल से पहले सरकार आगामी 13 अप्रैल को राज्यों के उच्च शिक्षा मंत्रियों से मशविरा करने जा रही है।
Monday, April 9, 2012
यूपी में फेल हुई रेलवे की जमीन पर स्कूल बनाने की मुहिम
सरकार कुछ भी कहे, लेकिन शिक्षा के मामले में सुनहरे सपने बेचने में उसका कोई सानी नहीं है। खासकर, बुनियादी शिक्षा के मामले में। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बात छोडि़ए, रेल मंत्रालय तो उससे भी दो कदम आगे निकल गया है। वह भी उत्तर प्रदेश में, जहां से खुद संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी चुनकर आते हैं। प्रदेश में रेलवे की जमीन पर दर्जन भर से अधिक केंद्रीय विद्यालय खुलने थे। दो साल पुराने इस फैसले को भी अफसरों ने ठेंगा दिया। संप्रग-दो में ही जनवरी, 2010 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय और रेल मंत्रालय ने देश भर में रेलवे की जमीन पर 50 केंद्रीय विद्यालयों को खोलने के लिए एक सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे। इन विद्यालयों में से 13 अकेले उत्तर प्रदेश में खुलने थे, जिसमें सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली स्थित कोच फैक्ट्री भी शामिल है। सुलतानपुर, प्रतापगढ़, टूंडला (फिरोजाबाद) और झांसी भी इन चयनित स्थानों में शामिल है, जहां से कांग्रेस के ही सांसद हैं। इसके अलावा लखनऊ, आगरा, सीतापुर, मऊ, वाराणसी सूबेदारगंज (इलाहाबाद), मैलानी और फतेहगढ़ में भी केंद्रीय विद्यालय खुलने थे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत केंद्रीय विद्यालय संगठन की तरफ से खुलने वाले इन 13 विद्यालयों में से 11 के लिए संबंधित मंडलों के रेल प्रबंधकों या फिर दूसरे जिम्मेदार अधिकारियों ने प्रस्ताव ही नहीं भेजा। अलबत्ता, मऊ व वाराणसी में खुलने वाले केंद्रीय विद्यालयों के लिए वाराणसी रेल मंडल से प्रस्ताव मिले हैं। उसमें भी मऊ के प्रस्ताव में खामियां हैं, जबकि वाराणसी के लिए मिला प्रस्ताव विचाराधीन है। बिहार में दानापुर रेल मंडल में झाझा और समस्तीपुर रेल मंडल में नरकटियागंज में भी केंद्रीय विद्यालय खुलने थे। यहां से प्रस्ताव तो मिला है, लेकिन उसमें कई कमियां हैं। मालूम हो कि एमओयू के मुताबिक जमीन रेलवे को मुहैया करानी थी, जबकि विद्यालय खोलने व संचालित करने का जिम्मा केंद्रीय विद्यालय संगठन का था। इतना ही नहीं, एमओयू के तहत रेलवे को कुल 50 केंद्रीय विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध करानी थी। दो साल बाद भी वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सिर्फ 43 स्थानों को ही चिह्नित करने की जानकारी दे पाया है। उनमें भी जम्मू-कश्मीर में जम्मू तवी, महाराष्ट्र में बल्लारशाह, भुसावल, दौड़, राजस्थान में जोधपुर व बीजीकेटी डीजल शेड समेत बेंगलूर और चेन्नई क्षेत्र से आधा दर्जन से अधिक चिह्नित स्थानों पर केंद्रीय विद्यालय खोलने के लिए अब तक प्रस्ताव नहीं मिले हैं। इसलिए यह मामला अभी तक अटका हुआ है। दोनों संबंधित मंत्रालयों में छाई सुस्ती के कारण यह परियोजना अब दम तोड़ती नजर आ रही है। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में सरकार क्या कदम उठाती है।
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