छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार (आरटीई) कानून में संशोधन के लिए पेश विधेयक को लोकसभा में बुधवार को पारित कर दिया गया। यह विधेयक कुछ दिनों पहले राज्यसभा में पारित हो चुका है। इसमें मदरसा, वैदिक पाठशाला जैसी अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं को आरटीई के दायरे से बाहर करने और सभी तरह की अशक्तता वाले बच्चों को शिक्षा के अधिकार का प्रावधान किया गया है। मुस्लिम बहुल इलाकों में लड़कियों के लिए स्कूल खोलने की मांग करते हुए राजग ने सिब्बल के जवाब का बहिष्कार किया। बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार संशोधन विधेयक 2012 पर चर्चा का जवाब देते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि शिक्षा के अधिकार कानून में संशोधन कर सभी तरह के अशक्त बच्चों को कक्षा में सामान्य बच्चों की तरह शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि इसके तहत आटिज्म, सेरेबल्र पाल्सी, मानसिक अशक्तता और अन्य तरह की अशक्तता वाले बच्चों को कक्षा में अन्य बच्चों की तरह शिक्षा का अवसर प्रदान करने की व्यवस्था है। इसके लिए कानून में अशक्तता की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है। हमारा मानना है कि छह से 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। मंत्री ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून के संबंध में कुछ वगरे से यह मांग की जा रही थी कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को इसके दायरे से बाहर रखा जाए। इस मांग को स्वीकार करते हुए मदरसा, वैदिक पाठशालाओं जैसे अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं को आरटीई के दायरे से बाहर रखा गया है। सिब्बल ने कहा कि यह भी मांग की गई थी कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को स्कूल प्रबंधन समिति के दायरे से बाहर रखा जाए। इसे भी स्वीकार कर लिया गया है और अब ऐसे मामलों में स्कूल प्रबंधन समिति की परामर्शक की भूमिका होगी। उन्होंने कहा कि इस संबंध में उच्चतम न्यायालय का भी निर्णय सामने आया है जिसमें कहा गया है कि इस कानून का कोई प्रावधान गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थओं पर लागू नहीं होगा हालांकि यह सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं पर पूरी तरह से लागू होगा। सिब्बल ने कहा कि कानून में एक और संशोधन करते हुए यह प्रावधान किया गया है कि सभी श्रेणियों में छात्र-शिक्षक अनुपात को कानून लागू होने के तीन वर्षो में मापदंड के अनुरूप बनाया जाएगा। साथ ही इस कानून के अमल में किसी तरह की बाधा को केंद्र दूर करेगा। डिस्लेक्सिया पीड़ित बच्चों को भी कानून के दायरे में लाया जाएगा : केंद्र सरकार ने बुधवार को लोकसभा में घोषणा की कि डिस्लेक्सिया-जैसी मानसिक बीमारी से पीड़ित बच्चों को भी मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून के दायरे में जल्द ही लाया जाएगा। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने राज्यसभा से पारित हो चुके नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार संशोधन विधेयक 2012 पर चर्चा शुरू होने से पहले सदस्यों को आस्त किया कि सरकार डिस्लेक्सिया-जैसी गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रस्त छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को भी इस कानून के दायरे में लाएगी ताकि उनके भी शिक्षा के अधिकार सुनिश्चित हो सकें।
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Saturday, May 19, 2012
Monday, April 16, 2012
गरीबों का अक्षर अधिकार
शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए भले ही दो साल हो गए हों पर इसके क्रियान्वयन को लेकर अस्पष्टता कभी कम नहीं हुई। अब जबकि इस कानून पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आया है, सरकार के लिए अपनी कार्यनीति तय करने में बड़ी मदद मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय में इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने फैसला सुनाया है कि देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में 25 फीसद गरीब बच्चों के दाखिले के प्रावधान में कहीं कोई विसंगति नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण के इस दायरे से सिर्फ सरकारी सहायता न पाने वाले अल्पसंख्यक संस्थानों को बाहर रखा है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए यह भी साफ किया कि यह फैसला गुरुवार यानी 12 अप्रैल से ही लागू होगा। लिहाजा इससे कानून के पास हो जाने के बाद हुए दाखिले प्रभावित नहीं होंगे। जाहिर है, न्यायालय इस महत्वपूर्ण कानून को भविष्य में कारगर रूप में देखना चाहता है। इसलिए अपने फैसले में भी उसने इस नजरिए को व्यापक तरजीह दी और गत वर्ष तीन अगस्त को सुरक्षित रखे फैसले को अंतिम रूप से सुनाने में इतना समय लिया। यह अलग बात है कि यह फैसला सर्वसम्मति से आने के बजाय बहुमत से आया। तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ में शामिल मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडिया और न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार ने जहां आरक्षण की हिमायत की, वहीं तीसरे न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन की राय में सरकारी सहायता न पाने वाले निजी और अल्पसंख्यक स्कूलों पर 25 फीसद आरक्षण की बाध्यता लागू नहीं होनी चाहिए। बहरहाल, अब जबकि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर लंबे समय से चली आ रही कई तरह की गलतफहमियों को दूर कर दिया है, गेंद एक बार फिर से सरकार के पाले में है। 2010 में जब यह कानून लागू हुआ था, तभी से यह सवाल केंद्र और राज्य सरकारों के सामने है कि वे प्राथमिक स्तर के शैक्षणिक ढांचे को कैसे चुस्त-दुरुस्त करें! पिछले दो सालों में पुराने स्कूलों में सुधार, नए स्कूल खोलने से लेकर शिक्षकों की बहाली तक के मुद्दों पर या तो पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया या फिर कुछेक कदम उठे भी तो वे भारी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। ऐसे में उम्मीद बांधना कि रातों रात सब कुछ ठीक हो जाएगा, कुछ ज्यादा ही उत्साह से भर जाना है। हाल में देश में प्राथमिक शिक्षा की सालाना ‘असर’ रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिससे सरजीमीनी हकीकत समझने में मदद मिलती है। रिपोर्ट के मुताबिक कई तरह के प्रोत्साहन कार्यक्रमों और सरकारी दबाव में ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में दाखिले का आंकड़ा तो 96.7 फीसद तक पहुंच गया पर उपस्थिति के मामले में यह बढ़त नजर नहीं आती। आलम यह है कि 2007 की स्थिति से तुलना करें तो 2011 में उपस्थिति का आंकड़ा 73.4 से खिसककर 70.9 पर आ गया। यही नहीं, इस चर्चित रिपोर्ट में स्कूलों में दी जा रही शिक्षा की स्तरीयता पर भी कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यह जरूर होगा कि अब सरकारी के साथ निजी विद्यालय भी सर्वशिक्षा का लक्ष्य पाने में जुटेंगे। पर यह महज इतनी अनुकूलता से पूरा होने से रहा। सरकार को चाहिए कि वह अपने अधीन आने वाले शैक्षणिक संस्थाओं को ढांचागत रूप से संपन्न करने के साथ शिक्षा की स्तरीयता बहाल करने के लिए कड़ी निगरानी व्यवस्था भी विकसित करे।
Tuesday, April 3, 2012
अनिवार्य शिक्षा का हश्र
शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए दो साल हो गए। यहां से पलटकर देखने पर रास्ता भले बहुत लंबा न दिखे पर अब तक के अनुभव कई बातें जरूर साफ करते हैं। मनरेगा जैसा ही हश्र इस कानून का भी होता दिख रहा है। प्रथम संस्था द्वारा तैयार की गई प्राथमिक शिक्षा की सालाना स्थिति पर तैयार ‘असर’ रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में नामांकन दर तो 96.7 फीसद तक पहुंच गई है पर उपस्थिति के मामले में यह बढ़त नहीं दिखती है। 2007 की स्थिति से तुलना करें तो स्कूलों में पढ़ने पहुंचने वाले बच्चों का फीसद 2011 में 73.4 से खिसक कर 70.9 पर आ गया है। यही नहीं, मुफ्त खाने का पल्रोभन परोसकर प्राथमिक शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा करने वाली सरकारी समझ का नतीजा यह है कि न तो बच्चों को ढंग से भोजन मिल रहा है और न ही अच्छी शिक्षा। ग्रामीण इलाकों में हालत यह है कि तीसरी जमात में पढ़ने वाले हर दस में से बमुश्किल एक या दो बच्चे ही ऐसे हैं, जो अक्षर पहचान सकते हैं। 27 फीसद ऐसे हैं जो ढंग से गिनती नहीं जानते हैं। 60 फीसद को अंकों का तो कुछ ज्ञान जरूर है पर जोड़-घटाव में उनके हाथ तंग हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों में खासतौर पर इस तरह की शिकायतें दर्ज की गई और बताया गया कि कागजी खानापूर्ति के दबाव में बच्चों को कक्षाएं फलांगने की छूट जरूर दे दी जा रही है पर तमाम ऐसे बच्चे हैं जो पांचवीं जमात में पहुंचकर भी कक्षा दो की किताबें ढंग से नहीं पढ़ पाते। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल लगातार शिक्षा के विस्तार और तरीके में सुधार के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। धरातल पर जो सचाई है, उसका भी पता मंत्री महोदय को है पर इस नाकामी के कारणों में जाने के बजाय वे आगे की योजनाओं की गिनती बढ़ाने में व्यस्त हैं। अब जब वह यह कहते हैं कि उनका सारा जोर रटंत तालीम की जगह रचनात्मक दक्षता उन्नयन पर है तो यह समझना मुश्किल है कि वे इस लक्ष्य को आखिर हासिल कैसे करेंगे? आंकड़े यह भी बताते हैं कि ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों का नेटवर्क ठप पड़ता जा रहा है। देश के 25 फीसद बच्चे आज प्राइवेट स्कूलों का रुख कर चुके हैं, आगे यह प्रवृत्ति और बढ़ेगी ही। केरल और मणिपुर में यह आंकड़ा साठ फीसद के ऊपर पहुंच चुका है। लिहाजा सरकारी स्तर पर यह योजनागत सफाई जरूरी है कि वह सर्व शिक्षा का लक्ष्य अपने भरोसे पूरा करना चाहते हैं या निजी स्कूलों के। क्योंकि यह एक और खतरनाक स्थिति गांव से लेकर बड़े शहरों तक पिछले कुछ सालों में बनी है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मानक ही प्राइवेट स्कूल हो गए हैं जबकि सचाई यह है कि यह सिर्फ प्रचारात्मक तथ्य है। अगर दसवीं और बारहवीं के सीबीएसई नतीजे को एक पैमाना मानें तो साफ दिखेगा कि सरकारी स्कूल ही अब भी तालीम के मामले में असरकारी हैं। लिहाजा, सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार के बगैर देश में शिक्षा का कोई बड़ा लक्ष्य हासिल कर पाना नामुमकिन है।
शिक्षा के अधिकार कानून पर जवाबदेही जरूरी : बाल आयोग
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सरकार के ‘शिक्षा का हक अभियान’ की सराहना करते हुए कहा है कि शिक्षा का अधिकार कानून पर स्कूलों से लेकर केंद्र के स्तर तक जवाबदेही तय होनी चाहिए। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून-2009 को लेकर निगरानी की जिम्मेदारी बाल आयोग की है। इस जिम्मेदारी को मिले दो साल पूरा होने के मौके पर आयोग ने इस संदर्भ में किए गए अब तक के कायरें के साथ ही भविष्य की योजनाओं का खाका पेश किया। बाल आयोग की अध्यक्ष शांता सिन्हा ने एक बयान में कहा, ‘शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर अब भी कई चुनौतियां हैं, जिन पर आगे काम किया जाएगा। इनमें शिकायत निवारण पण्राली स्थापित करने के साथ ही स्कूल से लेकर राज्य एवं केंद्र सरकार के स्तर तक जवाबदेही जरूरी है।’ उन्होंने कहा, ‘बाल श्रम विरोधी कानून एवं राष्ट्रीय बाल श्रम कार्यक्र म को शिक्षा के अधिकार कानून के अनुरूप बनाना भी जरूरी है। स्कूलों एवं शिक्षण संस्थानों में शारीरिक दंड देने पर भी पांबदी लगानी होगी। इस तरह के प्रावधान किए जाने चाहिए जिससे बेहसारा बच्चों और बाल श्रमिकों को शिक्षा के अधिकार के तहत सीधा फायदा मिल सके।’
शांता सिन्हा ने कहा, ‘हम मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से शुरू किए गए शिक्षा का हक अभियान की सराहना करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि यह ऐसा माहौल तैयार करेगा जिसमें शिक्षा को लेकर खड़ी हुई सभी चुनौतियों से निपटा जा सकेगा।’ ‘शिक्षा का हक अभियान’ की शुरुआत लोगों, विशेषत: युवाओं के बीच शिक्षा को लेकर जागरूकता फैलाने के मकसद से की गई है। इस अभियान का एक लक्ष्य शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर लोगों के बीच जागरूकता का प्रसार करना भी है। शिक्षा का अधिकार कानून 2010 में अमल में आया था। आयोग का कहना है कि अपनी ‘सोशल ऑडिट’ की प्रक्रि या के तहत उसने बीते दो वर्षों में 12 राज्यों के 439 वार्ड और 700 से अधिक स्कूलों को कवर किया। बाल आयोग ने कहा, ‘बीते दो वर्षों में शिक्षा के अधिकार को लेकर 11 राज्यों में जन सुनवाई हुई। इस दौरान लगभग 2,500 मामलों की सुनवाई की गई। मामलों के पंजीकरण और इसे आयोग के संज्ञान में लाने में 100 से अधिक गैर सरकारी संगठनों ने मदद की।’ आयोग ने कहा कि ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों को भी शिक्षा के अधिकार कानून के क्रि यान्वयन की जिम्मेदारी से जोड़ना होगा, जिससे यह कानून व्यापक रूप से प्रभावी हो सकेगा। Saturday, February 18, 2012
बारहवीं पास करते ही मिलेगा रोजगार !
अब वो दिन दूर नहीं जब बड़ी बड़ी नामचीन कंपनिया उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के बाहर खड़ी होंगी और इंटर पास करने वाले छात्रों को स्कूल कैंपस में ही मनचाहे वेतन पर मिलेगा रोजगार। जी हां, निचले स्तर की इस रोजगारोन्मुख शिक्षा पण्राली को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने मंजूरी दे दी है। माध्यमिक विद्यालयों में व्यावसायिक शिक्षा के साथ शैक्षिक पाठ्यक्रमों के एकीकरण का मसौदा भी तैयार कर लिया गया है। इन पाठ्यक्रमों को राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) ने काफी अध्य्यन और विचारिवमर्श के बाद तैयार किया है। पाठ्यक्रमों का आकषर्ण यह है कि अब हाई स्कूल के छात्रों के पास यह विकल्प होगा कि यदि वे उच्च शिक्षा के रास्ते पर नहीं जाना चाहते है तो वे माध्यमिक शिक्षा में ही ऐसा पाठ्यक्रम चुन सकते है जिसे पूरा करने के बाद उन्हें आगे पढ़ने की आवश्यकता नहीं है और उन्हें मनचाहे वेतन पर अच्छी नौकरी मिल जाएगी। हां, नौकरी देने वाले (नियोक्ता) समय समय पर इन छात्रों को नौकरी के साथ पढ़ाई के अवसर भी मुहैया कराएंगे। इन पाठ्यक्रमों को तैयार करने के लिए कई विकसित देशों में माध्यमिक शिक्षा के साथ व्यावसायिक शिक्षा के चालू पाठयक्रमों का अध्य्यन किया गया है। उक्त विषय पर एनआईओएस द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की सचिव अंशु वैश्य ने कहा कि बहुत से ऐसे कारण देखे गए हैं जिनके चलते कम उम्र के बच्चे अपनी पढ़ाई छोड़ देते है और इधर उधर रोजगार करने लगते है। ऐसी उम्र के बच्चों की पहचान करने के बाद इस तथ्य पर जोर दिया गया कि यदि स्कूली शिक्षा को व्यावसायिक शिक्षा की पढ़ाई से जोड़ दिया जाए तो आगे चल कर ये ही छात्र न केवल होनहार कामगार कहलाएंगे बल्कि उत्पादन की गुणवत्ता में भी काफी सुधार होगा। इन पाठ्यक्रमों का लाभ दूर दराज के छात्रों को देने के लिए इन्हें दूरस्थ शिक्षा से भी जोड़ा गया है। इस मौके पर एनआईओएस के अध्यक्ष डा. एस.एस.जेना ने छह माह से लेकर दो वर्ष तक के लिए तैयार किए गए रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रमों का श्रीमती वैश्य से विमोचन कराया। डा. जेना ने कहा कि इन पाठ्यक्रमों को तैयार करने से पहले नियोक्ताओं के पक्ष को भी ध्यान में रखा गया है।
Monday, October 31, 2011
कब बहुरेंगे दिन विविद्यालयों के
उच्च शिक्षा को प्राथमिकता देने में हम कितने पीछे हैं यह क्यूएस टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग के परिणामों से साफ है। इस रैंकिंग में वि के शीर्ष 200 विविद्यालयों में एक भी भारतीय विविद्यालय या शिक्षण संस्थान नहीं है। रैंकिंग के परिणामों के मुताबिक टॉप 500 की सूची में 218वें नंबर पर आईआईटी-दिल्ली, 225वें स्थान पर आईआईटी-मुंबई और 281वें स्थान पर आईआईटी-मद्रास का नंबर आता है। गौरतलब है कि इन तीनों संस्थानों की रैकिंग पिछले साल क्रमश: 202, 187 और 262 थी। जाहिर है कि हम डाउनफॉल की हालत का सामना कर रहे हैं। यह सूची यह बताने के लिए काफी है कि क्यों नस्ली हमले सहकर भी लोग ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में पढ़ते हैं और क्यों हमारे शिक्षा संस्थानों से कोई वेंकटरमण रामकृष्णन नहीं निकलता। बात यहीं खत्म नहीं होती। एशिया के शीषर्स्थ 200 विविद्यालयों में भारत का स्थान पांचवां है। सूची के करीब आधे विविद्यालय केवल दो देश चीन और दक्षिण कोरिया के हैं। ये दोनों देश इस मोच्रे पर दो दशक पहले भारत जैसे ही थे। साफ है कि उदारीकरण के बाद इन दोनों देशों ने अपनी शिक्षानीति में आमूलचूल बदलाए किए और हम केवल बातें ही बनाते रह गए। पिछले कुछ सालों का परिदृश्य देखें तो हमारे यहां केवल दोयम दज्रे के निजी विविद्यालय खुले हैं। विविद्यालयों की गुणवत्ता को लेकर अकसर यह तर्क सामने आता है कि गुणवत्ता का आधार दूसरे देश का कोई संस्थान नहीं हो सकता। ऐसा तर्क देने वालों का कहना है कि जब हमारे शिक्षण संस्थान देशी छात्रों और यहां की इंडस्ट्री की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं तो रैंकिंग देने वाले हमें जहां भी रखें, क्या फर्क पड़ता है। जाहिर है ये तर्क वैीकरण के इस माहौल में बेजा ही कहे जा सकते हैं। आज हमारी अर्थव्यवस्था तमाम संकटों के बावजूद करीब 8 प्रतिशत की विकास दर से आगे बढ़ रही है। इस दर को स्थायी बनाना एक शक्ति केंद्र के रूप में देश को विकसित करना है तो यह ग्लोबल तौर-तरीकों की शिक्षा केंद्रों की स्थापना के बगैर पूरा नहीं हो सकता। बगैर आधुनिक शिक्षण संस्थानों के हम प्रतिभाशाली जनशक्ति हासिल नहीं कर सकते। ऐसा नहीं कि हमारे पास यह जनशक्ति नहीं है लेकिन उसे हमेशा कुछ बेहतर करने के लिए ऑक्सफोर्ड, येल और कैब्रिज आदि विविद्यालयों का रास्ता नापना होता है। आज हमारे शीर्ष केंद्रीय विविद्यालयों में भी डिग्री केंद्रित शिक्षा अर्जन का काम चल रहा है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान भी मेधावी छात्रों के लिए बस अच्छी नौकरी पाने का जरिया बन गए हैं। हमारे यहां जो मुट्ठी भर छात्र रिसर्च कायरे में लगे हैं, वे भी मौका मिलते ही विदेश चले जाते हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय हमारे शिक्षण संस्थानों की बेहतरी के लिए जो कुछ कर रहा है उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। 11वीं पंचवर्षीय योजना में केंद्र सरकार ने 30 नए केंद्रीय विविद्यालय, आठ नए आईआईटी, सात नए आईआईएम, 37 अन्य तकनीकी संस्थान और जिला स्तर पर 373 नए कॉलेज स्थापित करने के लिए करीब 80,000 करोड़ रुपये का आबंटन किया था। औपचारिक रूप से शुरू की गई इनमें से ज्यादातर संस्थान विस्तरीय नहीं कहे जा सकते और न ही यहां हमारी जमीनी जरूरतों का लेकर कोई शोध ही किया जा रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय कितना ध्यान शोध पर दे रहा वह कुछ ही महीने पहले जारी इस फरमान से स्पष्ट हो जाता है कि जिसमें उसने शैक्षणिक संस्थानों को रिसर्च से जुड़े उपकरणों और रसायन आदि की खरीद की जिम्मेदारी लेने और विदेशों में रिसर्च पेपर पढ़ने के लिए स्पांसरशिप भी खुद ढूंढ़ने को कहा है। मंत्रालय संस्थानों को स्वाबलंबी बनाने के तर्क दे यह भूल रहा है कि टॉप 200 शिक्षण संस्थानों में अधिकांश सरकारी पैसे से चलते हैं। हां, यह जरूर है कि कई देशों में ऐसा ढ़ांचा विकसित किया गया है कि निजी कंपनियां भी बगैर किसी तरह के हस्तक्षेप के शिक्षण संस्थानों को पैसे डोनेट करती हैं। मंत्रालय इस तरह का ढ़ांचा विकसित करने में नहीं बल्कि सरकारी संस्थानों को कमजोर और निजी संस्थानों को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विदेशी संस्थानों के भारत आने का भी रास्ता खोला जा रहा है लेकिन सवाल है कि ये विदेशी संस्थान या निजी संस्थान रिसर्च जैसे क्षेत्र में क्यों पैसा लगाना चाहेंगी? वे तो सीधे-सीधे लाभ के लिए काम करेंगी और सभी को मालूम है कि रिसर्च जैसे कार्य में पैसा लगाना उनके लिए लाभप्रद सौदा किसी कीमत पर नहीं हो सकता। सरकार की तरफ से शोधपरक कायरें के लिए पैसे की कमी नहीं होनी चाहिए। प्राइवेट सेक्टर से ठीक वैसी ही मदद ली जानी चाहिए जैसे विदेशों में ली जाती है। उन्हें शिक्षण संस्थाओं को गोद लेने को कहा जा सकता है या फिर जो प्राइवेट कंपनी शिक्षण संस्थाओं को आर्थिक मदद प्रदान करे उन्हें टैक्स में राहत दी जा सकती है। दरअसल सरकार के पास उच्च शिक्षा के लिये पैसा लाने के लिए विकल्पों की कमी नहीं है लेकिन सवाल है कि आप चाहते क्या हैं? हमें अगले 20 सालों में कम से कम 50 विस्तरीय संस्थान खड़ा करने के लक्ष्य पर काम करना चाहिए।
Tuesday, October 11, 2011
अभी बेरंग ही है मुफ्त शिक्षा की मुहिम
हाल में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून से संबंधित विशेषज्ञों की एक टीम ने कानून पर प्रभावी रूप से अमल करने के लिए सुझाव दिया है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक गवर्निंग बॉडी बनाई जानी चाहिए। भारत में 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून का मुद्दा आजादी से पहले भी रहा है। शिक्षा में एक वर्ग विशेष के स्वघोषित एकाधिकार को तोड़ने के लिए, 24 जनवरी 1917 को छत्रपति शाहू जी महाराज ने अपने शासन क्षेत्र में 6-14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून लागू किया था। संविधान का प्रारूप तैयार करते समय डॉ. भीमराव अम्बेडकर भी चाहते थे कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के विषय को मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल किया जाए। लेकिन अनेक नेताओं के विरोध के कारण उक्त अधिकार को नीति निर्देशक सिद्धान्तों में डालना पड़ा, जिसमें निर्देशित है कि राज्य 1960 तक उक्त कानून बनाएगा। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते 50 वर्षो के बाद एक अप्रैल 2010 को बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार मिल पाया है। जो हाल-फिलहाल बेरंग ही नजर आ रहा है। उक्त कानून पर अमल करने में कई समस्याएं सामने आ रही हैं। पहली बड़ी समस्या है कि तमाम प्रचार अभियानों के बावजूद करीब 20 प्रतिशत लोगों को ही इस कानून की जानकारी है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2011 तक 15 राज्यों ने ही उक्त कानून को लागू करने की अधिसूचना जारी की है। गत जुलाई में उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अधिसूचना जारी कर दी है। राज्यों में उक्त कानून के अमलीकरण की जिम्मेदारी बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सौंपी गयी है। लेकिन अब तक करीब 15 राज्यों द्वारा ही बाल अधिकार संरक्षण आयोग गठित किए गए हैं। देश में 6-14 वर्ष की आयु के लगभग 22 करोड़ बच्चे हैं। जिनमें से करीब 19 करोड़ स्कूलों में दाखिल हैं, शेष 3 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल नहीं जाते। इनमें करीब सवा करोड़ बच्चे बाल श्रमिक हैं। इस हिसाब से शेष पौने दो करोड़ बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित होने चाहिए। पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार करीब 81 लाख 50 हजार बच्चे ही स्कूलों से वंचित हैं। सवाल है कि ऐसे 93 लाख 50 हजार बच्चे कहां हैं और क्या कर रहे हैं जो न तो स्कूल जाते हैं और न ही बाल श्रमिक हैं। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन (न्यूपा) की रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने के बजाय घट रही है। वर्ष 2008-09 के दौरान देश में पहली से पांचवी कक्षा में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या 13 करोड़ 43 लाख थी, जो वर्ष 2009- 10 में घटकर 13 करोड़ 34 लाख रह गयी। बच्चों में मिडडे-मील योजना का आकषर्ण कम होने लगा है। दोपहर का भोजन खाते ही अधिकांश बच्चे स्कूलों की दीवार फांदकर भाग जाते हैं। बड़ा सवाल है कि मुफ्त में वर्दी, किताबें, खाना और अनेक योजनाओं का पैसा मिलने के बावजूद बच्चे शिक्षा से दूर क्यों भाग रहे हैं ? अब 6-14 वर्ष की आयु का कोई भी बच्चा वर्ष में कभी भी नजदीक के सरकारी स्कूल में दाखिला ले सकेगा। अब किसी बच्चे का स्कूल से नाम भी नहीं कट सकेगा। बच्चों को पास- फेल होने के झंझटों से भी छुटकारा मिल गया है। आठवीं तक के सभी बच्चों का अगली कक्षा के लिए प्रोन्नत होना सुनिश्चित कर दिया गया है। देश में करीब 40 फीसद शिक्षक ठेके पर काम कर रहे हैं, फिर भी आठवीं तक के स्कूलों में शिक्षकों के करीब सात लाख पद खाली पड़े हैं। उक्त कानून को लागू करने के लिए करीब पांच लाख शिक्षकों की और जरूरत पड़ेगी। इसके अलावा करीब 14 लाख कक्षाओं का निर्माण करना होगा। एक शिक्षक पर छात्रों का राष्ट्रीय अनुपात 32 है। लेकिन करीब 15 राज्यों में शिक्षक-छात्र अनुपात राष्ट्रीय अनुपात से अधिक है। देश की राजधानी दिल्ली के स्कूलों में सैकड़ों कक्षाएं ऐसी हैं, जिनमें 70 से 90 बच्चे हैं। अनुपात के मामले में पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति बेहतर है। आरटीई एक्ट में कहा गया है कि देश में प्रति एक वर्ग किमी के दायरे में एक विद्यालय होना चाहिये पर देश में प्रति पांच किमी के दायरे में एक स्कूल है। एक्ट के तहत प्रत्येक स्कूल के पास एक खेल का मैदान होना चाहिए पर देश के करीब 45 फीसद स्कूलों में खेल के मैदान नहीं हैं। खेल का मैदान कितना बड़ा हो, यह तय करने की जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ दी गयी है। मसलन, दिल्ली में खेल के मैदान के लिए 900 वर्ग गज का दायरा तय किया गया है। दूसरी तरफ दिल्ली में ही शिक्षा की दुकानों के रूप में चल रहे सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं, जिनके पास खेल का मैदान तो क्या, ढंग के शौचालय तक नहीं हैं। ‘न्यूपा’ की वर्ष 2009-10 की रिपोर्ट के अनुसार प्रति दस वर्ग किमी के दायरे में दिल्ली में 29, पुडुचेरी में 12, चंडीगढ़ में 12, पश्चिम बंगाल में 9, बिहार में 7, उत्तर प्रदेश में 6 और झारखंड में 5 स्कूल हैं। देश में वर्ष 2008- 2009 में आठवीं तक के स्कूलों की संख्या 13 लाख थी। वर्ष 2009-10 के दौरान करीब एक लाख 91 हजार नए स्कूल खोले गये। जिनमें से सबसे ज्यादा करीब 43 हजार स्कूल उत्तर प्रदेश में खोले गये। हाल ही में यूपी में 11 हजार 418 नए स्कूल खोलने की मंजूरी मिल गयी है। इस अवधि में बिहार में करीब 16 हजार पांच सौ स्कूल, झारखंड में 18 हजार और उत्तराखंड में करीब 2 हजार 800 स्कूल खोले गये। आमतौर पर शिक्षा के मामले में शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों को अधिक पिछड़ा माना जाता है। पर जनगणना 2011 के आंकड़े कुछ और ही बयां कर रहे हैं। पिछले एक दशक में देश की साक्षरता दर में 9.2 फीसद की वृद्धि हुई है। इस दौरान शहरी क्षेत्रों में साक्षरता दर में मात्र 5.05 फीसद की वृद्धि हुई जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धि दर दो गुनी से भी अधिक यानी 10.18 फीसद दर्ज की गयी। ग्रामीण क्षेत्रों में पब्लिक स्कूलों में प्रवेश का रुझान भी बढ़ रहा है। आरटीई एक्ट सामाजिक कल्याण के साथ- साथ राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। देश का भविष्य माने जाने वाले बच्चे राष्ट्र निर्माण की अहम कड़ी हैं। गरीबों के लिए सरकारी और अमीरों के लिए पब्लिक स्कूल की दोहरी शिक्षा नीति से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया कमजोर हो रही है। देश के अधिकांश सरकारी स्कूल राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं और पब्लिक स्कूलों का प्रबंधन इस उधेड़बुन में लगा रहता है, कि शिक्षा को ऊंची कीमत पर कैसे बेचा जाय। जिस शिक्षा का उद्देश्य कभी समाज सेवा होता था, आज वही शिक्षा बाजार का रूप ले चुकी है। शिक्षा को बाजार से मुक्त कराने के लिए जरूरी है कि सरकारी स्कूलों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराते हुए देश में समान शिक्षा नीति लागू की जाए।
Monday, April 18, 2011
हकीकत बनेगा वर्चुअल विश्वविद्यालय
मोबाइल पर दोस्तों से बात करते, फेसबुक, ट्विटर पर चैटिंग करते लोग अक्सर ऐसी दुनिया में चले जाते हैं जहां दूर रहते हुए भी एक दूसरे का हालचाल जाना सकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), आईआईएससी ऐसे ही एक आभासी संसार का सृजन कर रहा है जिसके माध्यम से छात्र, प्रोफेसर एवं अन्य लोग पठन- पाठन का काम कर सकते हैं। वर्चुअल विश्वविद्यालय स्थापित करने से जुड़े विभिन्न आयामों की रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी आईआईटी कानपुर के निदेशक एसजी धांडे को सौंपी गई है। समिति अगले महीने मानव संसाधन मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इस परियोजना को 2012 तक अमलीजामा पहनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस परियोजना के बारे में धांडे ने बताला, 'वर्चुअल विश्वविद्यालय को अमलीजामा पहनाने के प्रस्ताव को अंतिम रूप दे दिया गया है। इस विषय पर एक रिपोर्ट तैयार की गई है जो अगले महीने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपी जाएगी।'
व्ा च्ा र्ु अ ल्ा विश्वविद्यालय एक अनोखी पहल है जिसे कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के माध्यम से अमल में लाया जाएगा। इसके तहत उपकरणों समेत वीडियो, ऑडियो सामग्रियों से परिपूर्ण वर्चुअल लैब को एकीकृत कमान के तहत जोड़ा जाएगा। छात्र इस प्रयोगशाला में प्रयोग कर सकते हैं या पाठ्यसामग्री को निर्देशानुसार पढ़ सकते हैं। अगर किसी छात्र को वर्चुअल लैब के माध्यम से सर्किट तैयार करना हो तो इस विषय में सभी उपकरण उपलब्ध है और उपयुक्त मात्रक वाले प्रतिरोध का उल्लेख कर छात्र सर्किट बना सकते हैं और वास्तविक आंकड़ा प्राप्त कर सकते हैं। प्रयोग करते समय किसी तरह की गलती में सुधार के बारे में भी व्यवस्था की गई है। छात्रों का मार्गदर्शन करने के लिए प्राध्यापक उपलब्ध रहेंगे। इससे समय और खर्च बचाया जा सकेगा। केवल उपकरणों आदि के स्पर्श का अनुभव लेने के लिए छात्रों को भौतिक प्रयोगशाला में जाने की जरूरत होगी। वर्चुअल विश्वविद्यालय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसे सूचना संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा मिशन (एनएमईआईसीटी) के तहत मंजूरी दी गई थी। इसे तैयार करने की दिशा में 150 वर्चुअल लैब का नेटवर्क तैयार किया गया है और प्रत्येक लैब में 10 प्रयोग किए जा सकते हैं। इस पर 80 करोड़ रुपए का खर्च आया है। बाद में इसका विस्तार किए जाने की योजना है जिसपर 200 करोड़ रुपए खर्च हो सकते हैं। परियोजना को 2012 तक अमलीजामा पहनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जिसपर Rs 4,600 करोड़ खर्च का अनुमान है। इस विश्वविद्यालय के माध्यम से 1,000 पाठ्यक्र म पेश किए जाने की योजना है। इस संबंध में 260 कोर्स तैयार किये गए हैं जिसमें 135 वीडियो एवं 125 वेब कोर्स से जुड़ी सामग्री है। गौरतलब है कि वर्चुअल विश्वविद्यालय की अवधारणा सबसे पहले प्रो. पी रामा राव ने तैयार की थी और आभाषी तकनीकी विश्वविद्यालय स्थापित करने की वकालत की थी।
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