शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए भले ही दो साल हो गए हों पर इसके क्रियान्वयन को लेकर अस्पष्टता कभी कम नहीं हुई। अब जबकि इस कानून पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आया है, सरकार के लिए अपनी कार्यनीति तय करने में बड़ी मदद मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय में इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने फैसला सुनाया है कि देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में 25 फीसद गरीब बच्चों के दाखिले के प्रावधान में कहीं कोई विसंगति नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण के इस दायरे से सिर्फ सरकारी सहायता न पाने वाले अल्पसंख्यक संस्थानों को बाहर रखा है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए यह भी साफ किया कि यह फैसला गुरुवार यानी 12 अप्रैल से ही लागू होगा। लिहाजा इससे कानून के पास हो जाने के बाद हुए दाखिले प्रभावित नहीं होंगे। जाहिर है, न्यायालय इस महत्वपूर्ण कानून को भविष्य में कारगर रूप में देखना चाहता है। इसलिए अपने फैसले में भी उसने इस नजरिए को व्यापक तरजीह दी और गत वर्ष तीन अगस्त को सुरक्षित रखे फैसले को अंतिम रूप से सुनाने में इतना समय लिया। यह अलग बात है कि यह फैसला सर्वसम्मति से आने के बजाय बहुमत से आया। तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ में शामिल मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडिया और न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार ने जहां आरक्षण की हिमायत की, वहीं तीसरे न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन की राय में सरकारी सहायता न पाने वाले निजी और अल्पसंख्यक स्कूलों पर 25 फीसद आरक्षण की बाध्यता लागू नहीं होनी चाहिए। बहरहाल, अब जबकि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर लंबे समय से चली आ रही कई तरह की गलतफहमियों को दूर कर दिया है, गेंद एक बार फिर से सरकार के पाले में है। 2010 में जब यह कानून लागू हुआ था, तभी से यह सवाल केंद्र और राज्य सरकारों के सामने है कि वे प्राथमिक स्तर के शैक्षणिक ढांचे को कैसे चुस्त-दुरुस्त करें! पिछले दो सालों में पुराने स्कूलों में सुधार, नए स्कूल खोलने से लेकर शिक्षकों की बहाली तक के मुद्दों पर या तो पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया या फिर कुछेक कदम उठे भी तो वे भारी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। ऐसे में उम्मीद बांधना कि रातों रात सब कुछ ठीक हो जाएगा, कुछ ज्यादा ही उत्साह से भर जाना है। हाल में देश में प्राथमिक शिक्षा की सालाना ‘असर’ रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिससे सरजीमीनी हकीकत समझने में मदद मिलती है। रिपोर्ट के मुताबिक कई तरह के प्रोत्साहन कार्यक्रमों और सरकारी दबाव में ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में दाखिले का आंकड़ा तो 96.7 फीसद तक पहुंच गया पर उपस्थिति के मामले में यह बढ़त नजर नहीं आती। आलम यह है कि 2007 की स्थिति से तुलना करें तो 2011 में उपस्थिति का आंकड़ा 73.4 से खिसककर 70.9 पर आ गया। यही नहीं, इस चर्चित रिपोर्ट में स्कूलों में दी जा रही शिक्षा की स्तरीयता पर भी कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यह जरूर होगा कि अब सरकारी के साथ निजी विद्यालय भी सर्वशिक्षा का लक्ष्य पाने में जुटेंगे। पर यह महज इतनी अनुकूलता से पूरा होने से रहा। सरकार को चाहिए कि वह अपने अधीन आने वाले शैक्षणिक संस्थाओं को ढांचागत रूप से संपन्न करने के साथ शिक्षा की स्तरीयता बहाल करने के लिए कड़ी निगरानी व्यवस्था भी विकसित करे।
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Monday, April 16, 2012
निजी स्कूलों को पढ़ाने होंगे 25 फीसदी गरीब
सुप्रीमकोर्ट ने 6 से 14 साल के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा के मौलिक अधिकार पर अपनी मुहर लगा दी है। अब गरीब बच्चों का हाईफाई निजी स्कूलों में पढ़ाई का सपना पूरा होगा। देश भर में सरकारी व गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होंगी। शीर्ष अदालत ने शिक्षा के कानून को संविधान सम्मत ठहराते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा, शिक्षा का कानून 2009 संविधान सम्मत है। मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने शिक्षा के कानून अधिकार को चुनौती देने वाली निजी स्कूलों की याचिका पर फैसले में कहा कि यह कानून सरकारी व सरकार द्वारा नियंत्रित संस्थाओं के स्कूलों, गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों और सरकारी सहायता या अनुदान प्राप्त करने वाले अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू होगा। गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों पर यह लागू नहीं होगा। कोर्ट ने कहा, कानून की धारा 12(1)(सी) और 18(3) संविधान के अनुच्छेद 30 (1) के तहत अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मिले अधिकार का उल्लंघन करती है। हालांकि न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन ने अलग से फैसला सुनाते हुए कहा है गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों पर भी 25 फीसदी गरीब बच्चों को मुफ्त में प्रवेश देने का कानून लागू नहीं होगा। न्यायमूर्ति राधाकृष्णन का फैसला अल्पमत का है, अत: यह प्रभावी नहीं होगा। दो न्यायाधीशों के बहुमत काफैसला ही प्रभावी होगा। यह फैसला आज से यानि 12 अप्रैल से लागू होगा। जो बच्चे पहले ही गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक स्कूलों में प्रवेश ले चुके हैं, उनके प्रवेश के मामलों में कोई रुकावट नही आएगी। मालूम हो कि सरकार ने संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 21 ए जोड़ा था जो कि 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है। अधिकार को लागू करने के लिए सरकार मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 लेकर आई। यह एक अप्रैल 2010 से लागू हो गया। इसमें कहा गया है कि प्रत्येक स्कूल को पड़ोस में रहने वाले बच्चों को अपने यहां प्रवेश देना होगा। और प्रत्येक स्कूल 25 फीसदी सीटें गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करेगा। इन्हें मुफ्त में शिक्षा दी जाएगी और उनसे किसी तरह की फीस नहीं ली जाएगी। निजी स्कूलों ने इस कानून को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी। सोसाइटी फार अनएडेड स्कूल आफ राजस्थान आदि की ओर से दाखिल याचिकाओं का निपटारा करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। निजी स्कूलों की दलील थी कि उन्हें संविधान में रोजगार का मौलिक अधिकार प्राप्त है और सरकार उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यह भी दलील थी कि वे जब सरकार से कोई सहायता नहीं लेते तो फिर सरकार उन पर मुफ्त शिक्षा देने का दबाव कैसे डाल सकती है। सुप्रीमकोर्ट ने दलीलें खारिज करते हुए कहा कि यह सही है कि संविधान में सभी को मनपसंद रोजगार या व्यवसाय करने और उसके प्रबंधन का मौलिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन सरकार कानून बना कर इस अधिकार पर कुछ नियंत्रण लगा सकती है। इसलिए शिक्षा का अधिकार कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने कहा है कि शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में आने वाली बाधाएं दूर करने के उद्देश्य से लाया गया है।
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