Monday, April 9, 2012

यूपी में फेल हुई रेलवे की जमीन पर स्कूल बनाने की मुहिम


सरकार कुछ भी कहे, लेकिन शिक्षा के मामले में सुनहरे सपने बेचने में उसका कोई सानी नहीं है। खासकर, बुनियादी शिक्षा के मामले में। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बात छोडि़ए, रेल मंत्रालय तो उससे भी दो कदम आगे निकल गया है। वह भी उत्तर प्रदेश में, जहां से खुद संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी चुनकर आते हैं। प्रदेश में रेलवे की जमीन पर दर्जन भर से अधिक केंद्रीय विद्यालय खुलने थे। दो साल पुराने इस फैसले को भी अफसरों ने ठेंगा दिया। संप्रग-दो में ही जनवरी, 2010 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय और रेल मंत्रालय ने देश भर में रेलवे की जमीन पर 50 केंद्रीय विद्यालयों को खोलने के लिए एक सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे। इन विद्यालयों में से 13 अकेले उत्तर प्रदेश में खुलने थे, जिसमें सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली स्थित कोच फैक्ट्री भी शामिल है। सुलतानपुर, प्रतापगढ़, टूंडला (फिरोजाबाद) और झांसी भी इन चयनित स्थानों में शामिल है, जहां से कांग्रेस के ही सांसद हैं। इसके अलावा लखनऊ, आगरा, सीतापुर, मऊ, वाराणसी सूबेदारगंज (इलाहाबाद), मैलानी और फतेहगढ़ में भी केंद्रीय विद्यालय खुलने थे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत केंद्रीय विद्यालय संगठन की तरफ से खुलने वाले इन 13 विद्यालयों में से 11 के लिए संबंधित मंडलों के रेल प्रबंधकों या फिर दूसरे जिम्मेदार अधिकारियों ने प्रस्ताव ही नहीं भेजा। अलबत्ता, मऊ व वाराणसी में खुलने वाले केंद्रीय विद्यालयों के लिए वाराणसी रेल मंडल से प्रस्ताव मिले हैं। उसमें भी मऊ के प्रस्ताव में खामियां हैं, जबकि वाराणसी के लिए मिला प्रस्ताव विचाराधीन है। बिहार में दानापुर रेल मंडल में झाझा और समस्तीपुर रेल मंडल में नरकटियागंज में भी केंद्रीय विद्यालय खुलने थे। यहां से प्रस्ताव तो मिला है, लेकिन उसमें कई कमियां हैं। मालूम हो कि एमओयू के मुताबिक जमीन रेलवे को मुहैया करानी थी, जबकि विद्यालय खोलने व संचालित करने का जिम्मा केंद्रीय विद्यालय संगठन का था। इतना ही नहीं, एमओयू के तहत रेलवे को कुल 50 केंद्रीय विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध करानी थी। दो साल बाद भी वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सिर्फ 43 स्थानों को ही चिह्नित करने की जानकारी दे पाया है। उनमें भी जम्मू-कश्मीर में जम्मू तवी, महाराष्ट्र में बल्लारशाह, भुसावल, दौड़, राजस्थान में जोधपुर व बीजीकेटी डीजल शेड समेत बेंगलूर और चेन्नई क्षेत्र से आधा दर्जन से अधिक चिह्नित स्थानों पर केंद्रीय विद्यालय खोलने के लिए अब तक प्रस्ताव नहीं मिले हैं। इसलिए यह मामला अभी तक अटका हुआ है। दोनों संबंधित मंत्रालयों में छाई सुस्ती के कारण यह परियोजना अब दम तोड़ती नजर आ रही है। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में सरकार क्या कदम उठाती है।

Tuesday, April 3, 2012

अनिवार्य शिक्षा का हश्र

शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए दो साल हो गए। यहां से पलटकर देखने पर रास्ता भले बहुत लंबा न दिखे पर अब तक के अनुभव कई बातें जरूर साफ करते हैं। मनरेगा जैसा ही हश्र इस कानून का भी होता दिख रहा है। प्रथम संस्था द्वारा तैयार की गई प्राथमिक शिक्षा की सालाना स्थिति पर तैयार ‘असर’ रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में नामांकन दर तो 96.7 फीसद तक पहुंच गई है पर उपस्थिति के मामले में यह बढ़त नहीं दिखती है। 2007 की स्थिति से तुलना करें तो स्कूलों में पढ़ने पहुंचने वाले बच्चों का फीसद 2011 में 73.4 से खिसक कर 70.9 पर आ गया है। यही नहीं, मुफ्त खाने का पल्रोभन परोसकर प्राथमिक शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा करने वाली सरकारी समझ का नतीजा यह है कि न तो बच्चों को ढंग से भोजन मिल रहा है और न ही अच्छी शिक्षा। ग्रामीण इलाकों में हालत यह है कि तीसरी जमात में पढ़ने वाले हर दस में से बमुश्किल एक या दो बच्चे ही ऐसे हैं, जो अक्षर पहचान सकते हैं। 27 फीसद ऐसे हैं जो ढंग से गिनती नहीं जानते हैं। 60 फीसद को अंकों का तो कुछ ज्ञान जरूर है पर जोड़-घटाव में उनके हाथ तंग हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों में खासतौर पर इस तरह की शिकायतें दर्ज की गई और बताया गया कि कागजी खानापूर्ति के दबाव में बच्चों को कक्षाएं फलांगने की छूट जरूर दे दी जा रही है पर तमाम ऐसे बच्चे हैं जो पांचवीं जमात में पहुंचकर भी कक्षा दो की किताबें ढंग से नहीं पढ़ पाते। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल लगातार शिक्षा के विस्तार और तरीके में सुधार के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। धरातल पर जो सचाई है, उसका भी पता मंत्री महोदय को है पर इस नाकामी के कारणों में जाने के बजाय वे आगे की योजनाओं की गिनती बढ़ाने में व्यस्त हैं। अब जब वह यह कहते हैं कि उनका सारा जोर रटंत तालीम की जगह रचनात्मक दक्षता उन्नयन पर है तो यह समझना मुश्किल है कि वे इस लक्ष्य को आखिर हासिल कैसे करेंगे? आंकड़े यह भी बताते हैं कि ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों का नेटवर्क ठप पड़ता जा रहा है। देश के 25 फीसद बच्चे आज प्राइवेट स्कूलों का रुख कर चुके हैं, आगे यह प्रवृत्ति और बढ़ेगी ही। केरल और मणिपुर में यह आंकड़ा साठ फीसद के ऊपर पहुंच चुका है। लिहाजा सरकारी स्तर पर यह योजनागत सफाई जरूरी है कि वह सर्व शिक्षा का लक्ष्य अपने भरोसे पूरा करना चाहते हैं या निजी स्कूलों के। क्योंकि यह एक और खतरनाक स्थिति गांव से लेकर बड़े शहरों तक पिछले कुछ सालों में बनी है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मानक ही प्राइवेट स्कूल हो गए हैं जबकि सचाई यह है कि यह सिर्फ प्रचारात्मक तथ्य है। अगर दसवीं और बारहवीं के सीबीएसई नतीजे को एक पैमाना मानें तो साफ दिखेगा कि सरकारी स्कूल ही अब भी तालीम के मामले में असरकारी हैं। लिहाजा, सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार के बगैर देश में शिक्षा का कोई बड़ा लक्ष्य हासिल कर पाना नामुमकिन है।

शिक्षा के अधिकार कानून पर जवाबदेही जरूरी : बाल आयोग


राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सरकार के ‘शिक्षा का हक अभियान’ की सराहना करते हुए कहा है कि शिक्षा का अधिकार कानून पर स्कूलों से लेकर केंद्र के स्तर तक जवाबदेही तय होनी चाहिए। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून-2009 को लेकर निगरानी की जिम्मेदारी बाल आयोग की है। इस जिम्मेदारी को मिले दो साल पूरा होने के मौके पर आयोग ने इस संदर्भ में किए गए अब तक के कायरें के साथ ही भविष्य की योजनाओं का खाका पेश किया। बाल आयोग की अध्यक्ष शांता सिन्हा ने एक बयान में कहा, ‘शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर अब भी कई चुनौतियां हैं, जिन पर आगे काम किया जाएगा। इनमें शिकायत निवारण पण्राली स्थापित करने के साथ ही स्कूल से लेकर राज्य एवं केंद्र सरकार के स्तर तक जवाबदेही जरूरी है।’ उन्होंने कहा, ‘बाल श्रम विरोधी कानून एवं राष्ट्रीय बाल श्रम कार्यक्र म को शिक्षा के अधिकार कानून के अनुरूप बनाना भी जरूरी है। स्कूलों एवं शिक्षण संस्थानों में शारीरिक दंड देने पर भी पांबदी लगानी होगी। इस तरह के प्रावधान किए जाने चाहिए जिससे बेहसारा बच्चों और बाल श्रमिकों को शिक्षा के अधिकार के तहत सीधा फायदा मिल सके।’
शांता सिन्हा ने कहा, ‘हम मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से शुरू किए गए शिक्षा का हक अभियान की सराहना करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि यह ऐसा माहौल तैयार करेगा जिसमें शिक्षा को लेकर खड़ी हुई सभी चुनौतियों से निपटा जा सकेगा।’ ‘शिक्षा का हक अभियान’ की शुरुआत लोगों, विशेषत: युवाओं के बीच शिक्षा को लेकर जागरूकता फैलाने के मकसद से की गई है। इस अभियान का एक लक्ष्य शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर लोगों के बीच जागरूकता का प्रसार करना भी है। शिक्षा का अधिकार कानून 2010 में अमल में आया था। आयोग का कहना है कि अपनी ‘सोशल ऑडिट’ की प्रक्रि या के तहत उसने बीते दो वर्षों में 12 राज्यों के 439 वार्ड और 700 से अधिक स्कूलों को कवर किया। बाल आयोग ने कहा, ‘बीते दो वर्षों में शिक्षा के अधिकार को लेकर 11 राज्यों में जन सुनवाई हुई। इस दौरान लगभग 2,500 मामलों की सुनवाई की गई। मामलों के पंजीकरण और इसे आयोग के संज्ञान में लाने में 100 से अधिक गैर सरकारी संगठनों ने मदद की।’ आयोग ने कहा कि ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों को भी शिक्षा के अधिकार कानून के क्रि यान्वयन की जिम्मेदारी से जोड़ना होगा, जिससे यह कानून व्यापक रूप से प्रभावी हो सकेगा। 

Thursday, March 29, 2012

महाराष्ट्र के सरकारी स्कूलों से हिंदी को खत्म करने की तैयारी


महाराष्ट्र में हिंदी विरोधी मानसिकता का ठीकरा भले ही शिवसेना और मनसे जैसे दलों के सिर फोड़ा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेसनीत सरकार हिंदी को प्राथमिक स्तर की शिक्षा से बाहर करना चाहती है। महाराष्ट्र राज्य शिक्षण मंडल ने हिंदी को 5वीं कक्षा से अनिवार्य 3 भाषाओं की सूची से निकालने की भूमिका तैयार कर ली है। राज्य के सरकारी स्कूलों में पांचवी कक्षा से हिंदी, अंग्रेजी व मराठी अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। राज्य शिक्षण मंडल हिंदी को अनिवार्य भाषा की सूची से बाहर करना चाहता है। बुधवार को विधान परिषद में इसका खुलासा हुआ। विधान परिषद सदस्य एवं लोकभारती नामक राजनीतिक दल के अध्यक्ष कपिल पाटिल ने शिक्षण मंडल की योजना पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, इस प्रकार के कदम से राज्य के 60 हजार शिक्षक बेकार हो जाएंगे। उन्होंने सवाल किया कि जब राज्य सरकार ने भाषा नीति में परिवर्तन नहीं किया है तो शिक्षण मंडल को ऐसा फैसला लेने की जरूरत क्यों पड़ रही है? हिंदी विरोध के लिए बदनाम शिवसेना ने इस मुद्दे पर पाटिल का समर्थन किया। हंगामे और शोरगुल के बीच विधान परिषद सभापति शिवाजीराव देशमुख ने इस विषय पर अगले सप्ताह चर्चा कराने का आश्वासन दिया है।

Wednesday, March 14, 2012

महिला विश्वविद्यालय का औचित्य


महिलाओं में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अब आने वाले पांच सालों के भीतर 20 महिला विश्वविद्यालय अलग से खोले जाएंगे। यहां सिर्फ लड़कियों को उच्च शिक्षा मुहैया कराई जाएगी। साथ ही गरीब छात्राओं के लिए अलग से स्कॉलरशिप की व्यवस्था होगी। यह एक सुखद और खुशी की बात है कि सरकारी स्तर पर तथा सरकारी संस्थानों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की कम उपस्थिति से पार पाने का किसी रूप में प्रयास किया जा रहा है। भारत में महिला शिक्षा का मुददा 19वीं सदी के राष्ट्रीय सुधार आंदोलनों में एक प्रमुख मुद्दा रहा है और फिर बाद में राष्ट्रीय आंदोलन में भी वह उपस्थित रहा। आजादी के बाद महिला आंदोलनों में शिक्षा में महिलाओं को बराबर का अवसर मिले, यह मसला एजेंडा पर रहा। हालांकि पहले वाले दौर में स्त्री शिक्षा के प्रति सिर्फ शिक्षित होने जैसी समझ थी, जिसका उद्देश्य था परिवार में शिक्षा का स्तर बढ़े। कहा जाता था कि एक औरत के शिक्षित होने का मतलब है कि घर के बच्चों में भी शिक्षा का संस्कार शुरू से मिलेगा यानी औरत का हक केंद्र में नहीं था, बल्कि पूरा परिवार और समाज केंद्र में था। लेकिन इस एप्रोच के तहत भी औरत की पढ़ाई पर जोर रहा। बाद के दौर में महिला मुद्दों के प्रति समझ जैसे-जैसे बढ़ती गई, महिलाओं की व्यक्तिगत और नागरिक अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी। इसके तहत अब हर क्षेत्र में उनकी उपस्थिति तथा बराबर की भागीदारी का मुद्दा मापदंड बना। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में महिलाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अलग से महिला विद्यालय तथा महाविद्यालयों की स्थापना की गई। इन प्रयासों का असर भी पड़ा और शिक्षा में उनकी भागीदारी का प्रतिशत बढ़ा। अब यह बात तो सही है कि हमारा देश इस क्षेत्र में लक्ष्य हासिल करने में अभी काफी पीछे है। महिला साक्षरता दर में तो पिछले दस सालों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन उच्च शिक्षा में अब भी उदासीन स्थिति है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपनी 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत महिलाओं की उच्च शिक्षा तथा प्रबंधन में उच्च पदों पर निर्णयकारी भूमिकाओं में उनकी संख्या कम होने को चिंता का विषय माना। जेंडर बराबरी के मुद्दे पर फोकस करने के लिए अलग से बजटीय प्रावधान किया तथा देश भर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को सर्कुलर जारी कर ऐसे प्रशिक्षण आयोजित करने की बात कही है। वर्ष 2003 से ऐसे प्रशिक्षणों का आयोजन भी किया जा रहा है। अब मुद्दा यह है कि 21वीं सदी में भी यदि समस्याएं बरकरार हैं तो क्या उनसे निपटने का तरीका 19वीं सदी वाला ही होगा? यह अच्छी बात है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपनी 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत भी महिलाओं में उच्च शिक्षण को बढ़ावा देने के लिए योजना बनाई और उसे लागू किया तथा 12वीं योजना के तहत उसे महिला विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव रखकर महिलाओं में उच्च शिक्षण की पहुंच को बढ़ाने का उपाय सुझाया है। आयोग के मुताबिक वर्तमान में सकल दाखिला अनुपात 14 मिलियन है, उसे बढ़ाकर उसे 22 मिलियन तक ले जाना है। स्कॉलरशिप का प्रस्ताव उत्तम है, क्योंकि परिवारों में यदि आर्थिक तंगी है तो उसकी गाज सबसे पहले लड़की के शिक्षा पर ही गिरती है। इसलिए यह व्यवस्था सहशिक्षा में उच्च शिक्षा लेने वाली लड़कियों पर भी लागू होती है। मुद्दा यह है कि क्या यूजीसी द्वारा अन्य दूसरे उपायों के जरिए इस समस्या को संबोधित किया जा सकता था? दरअसल, लड़कियों के सुरक्षित वातावरण के लिए यह बेहतर समझा गया कि उनके लिए अलग व्यवस्था हो। इस तरह से दोनों वजहों में समझदारी बढ़ती है तथा शेष में भी बदलनी चाहिए। जैसे, अभिभावकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी बेटियों पर यह बंधन नहीं लगाएं कि वे सहशिक्षण नहीं ले सकती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कितने अध्ययन ऐसे हो चुके हैं, जो सहशिक्षा को स्वस्थ विकास में सहायक मानते हैं। साथ-साथ पलना-बढ़ना, सीखना हो तो भविष्य में भी स्वाभाविक सामंजस्य की गंुजाइश अधिक होती है। दूसरी रही बात सुरक्षा की रही तो वह उपाय तो सहशिक्षा में भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ाए जाने पर बजटीय निवेश बढ़ाया जाना चाहिए तथा सुरक्षित वातावरण को नुकसान पहुंचाने वालों के लिए सख्त सबक देने का प्रावधान हो। कुल मिलाकर कहें तो अलगाव की व्यवस्था को उच्चकोटि की व्यवस्था नहीं माना जा सकता है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि लड़कियां भी सहशिक्षा को प्राथमिकता देने लगी हंै। मसलन, उत्तर प्रदेश में 150 महिला इंजीनियरिंग कॉलेज खोले गए थे, जिनमें से अधिकतर को बाद में बंद करना पड़ा, क्योंकि यहां दाखिला लेने वालों का संकट पड़ गया। अधिकतर कॉलेज तरह-तरह से ऑफर करते रहे, जबकि सहशिक्षा वाले इंजीनियरिंग कॉलेजों की सीट पहले दौर में ही भर जाती थी। यह स्थिति अन्य विश्वविद्यालयों से जुड़े कॉलेजों की भी है। कॉलेजों मे पढ़ाई गुणवत्ता के आधार पर हो तो कॉलेज नामधारी हो जाता है, लड़कियां भी वहीं दाखिला चाहती हैं। प्रतिष्ठित कॉलेजों में एक-दो कट ऑफ लिस्ट में ही सीटें भर जाती हैं यानी अच्छी पढ़ाई आधार बनती है, न कि लैंगिक कारण। पढ़ाई के लिए दूर नहीं भेजने का एक बड़ा कारण अलग से महिला छात्रावासों की कमी भी है। आजकल पढ़ाई के लिए अपना शहर छोड़कर बड़े शहरों में या अन्य अच्छे संस्थानों में जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, लेकिन संस्थानों ने इस जरूरत पर ठीक से ध्यान दिया ही नहीं है कि लड़कियों को रहने के लिए पर्याप्त सुरक्षित व्यवस्था हो। यूजीसी अगर महिला छात्रावासों को बनवाने का काम भी प्राथमिकता के तौर पर लेता तो उच्चशिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का उसका लक्ष्य भी पूरा हो जाता। इसलिए पहले कारण समझने का प्रयास करना चाहिए कि महिलाओं के पीछे रहने का कारण क्या सहशिक्षण है या समाज में व्याप्त घोर स्त्रीविरोधी धारणा? क्या अलग व्यवस्था बना देने के बजाय उसे दुरुस्त करने के दूसरे उपाय ज्यादा सही नहीं होंगे? यह प्रश्न किया जाना चाहिए कि यह अलग महिला विश्वविद्यालय का प्रस्ताव अस्थायी समय के लिए है और लक्ष्य हासिल हो जाने के बाद क्या वह सहशिक्षण वाले संस्थान बन जाएंगे? एक दूसरे पहलू पर भी विचार किया जा सकता है। जैसे, दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ महिला कॉलेजों की अब तक एक अलग तरह से एलिट वर्ग के संस्थान की पहचान हासिल हो गई है। वहां जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि के लोग आते हैं, उनके बीच यह कोई मुद्दा नहीं है कि वे या उनके अभिभावक लड़कों के साथ पढ़ने देना नहीं चाहते, बल्कि वह एक प्रकार के रुतबे का मामला है कि आप एलएसआर या मिरांडा में पढ़ती हंै। समाज में महिलाओं के लिए कहां-कहां अलग से दुनिया बनाई जा सकती है? इसलिए भविष्य में अधिकाधिक साथ-साथ ही और पूरी बराबरी तथा सुरक्षा के बीच महौल निर्मित हो सकें, यही समझ लेकर भविष्य की हर क्षेत्र की कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

पांच अफसरों का घर सजाने पर 70 लाख खर्च


एम्स को मरीजों की स्वास्थ्य जांच व अन्य सुविधाओं की अपेक्षा अधिकारियों की शानो शौकत ज्यादा प्यारी है। आलम यह है कि पिछले वर्ष मरीजों से यूजर्स चार्ज (सुविधा शुल्क) के नाम पर डेढ़ करोड़ रुपये वसूलने में जरा भी संकोच नहीं हुआ, लेकिन मात्र पांच अधिकारियों के घरों को सजाने संवारने में एम्स ने 70 लाख रुपये खर्च कर दिए। पैसे का ऐसा खेल देश के सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान में हो रहा है, जिससे यह साबित होता है कि यहां भी मरीजों के इलाज से कहीं ज्यादा अधिकारी अपनी रोटी सेंकने में लगे हुए हैं। आरटीआई से प्राप्त जानकारी में यह साफ हो गया है कि सुविधा के नाम पर साल भर में आने वाले लगभग 25 लाख मरीजों से जहां 1,52,73,000 रुपये वसूले गए वहीं मात्र पांच अधिकारियों के घर को सजाने संवारने पर 73, 63, 035 रुपये खर्च किए गए। एम्स के एक सीनियर डॉक्टर ने कहा कि सालाना एक हजार करोड़ रुपये का बजट एम्स का है। लेकिन मरीजों को न तो दवा मुफ्त में मिलती है, न ही जांच फ्री में की जाती है। लंबे इंतजार के लिए मरीज विवश हैं, किंतु बेडों की संख्या नहीं बढ़ाई जाती। निर्माण कार्य लगातार जारी है, क्योंकि इससे ठेकेदारों के साथ-साथ अधिकारियों के पैसे बन रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि इन दिनों निर्माण कार्य के नाम पर एम्स में पैसों का खूब खेल चल रहा है। पिछले वर्ष एम्स के इंजीनियर सेक्शन ने कार्डिए न्यूरो सेंटर के ओपीडी का निर्माण मात्र डेढ़ करोड़ रुपये में कर दिया। लेकिन हाल ही में जनरल ओपीडी के निर्माण पर लगभग 8 करोड़ रुपये खर्च किए किए, क्योंकि इसका निर्माण किसी अन्य एजेंसी से कराया गया। इससे पता चलता है कि मकसद बेहतर निर्माण कार्य का नहीं, बल्कि पैसे बनाने का है। पैसे के इस तरह दुरुपयोग पर एम्स प्रशासन चुप्पी साधे हुए है।

Monday, February 27, 2012

नए सरकारी मेडिकल कालेज खोलने में मदद करेगा केंद्र


देश में मेडिकल शिक्षा के कुछ खास इलाकों में सिमट जाने और प्राइवेट क्षेत्र पर बढ़ती निर्भरता को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय जल्दी ही अपनी नीति में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। इसका ध्यान अब नए सरकारी मेडिकल कालेज खोलने पर होगा। इसके लिए राज्यों को भारी आर्थिक मदद देने की तैयारी की जा रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अफसरों के मुताबिक कुछ राज्यों में मेडिकल कालेजों की संख्या बहुत कम है। जबकि दक्षिण के कुछ राज्यों में बड़ी तादाद में ऐसे कालेज खड़े हो चुके हैं। प्राइवेट मेडिकल कालेजों ने मेडिकल शिक्षा इतनी महंगी बना दी है कि यहां से पढ़ाई करने के बाद डॉक्टर सरकारी नौकरी की सोचते ही नहीं। उन्हें तुरंत मोटी रकम चाहिए होती है। ऐसे में सरकारी मेडिकल कालेज खोले जाने की जरूरत को देखते हुए सरकार ऐसी पहल करने जा रही है। नई योजना के तहत नए मेडिकल कालेज खोलने के लिए अगर कोई राज्य सरकार प्रस्ताव करती है तो उसे केंद्र से 80 फीसदी तक आर्थिक मदद दी जा सकती है। इसके तहत अगले पांच साल के दौरान कम से कम 50 ऐसे मेडिकल कालेज खोले जाने की योजना बनाई गई है। योजना आयोग की ओर से स्वास्थ्य ढांचे के विकास पर बनाए गए कार्यदल ने भी मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी दखल को बढ़ाने की जोरदार वकालत की है। इसने हाल ही में अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंपी है। इस समय देश में 335 मेडिकल कालेजों को मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया (एमसीआइ) की मान्यता प्राप्त है। इनमें से सिर्फ 181 ही सरकारी क्षेत्र के हैं। इसी तरह देश में लोगों की स्वास्थ्य जरूरतों को देखते हुए डाक्टरों की भी भारी कमी है।