शिक्षा में सुधार एजेंडे को लेकर कपिल सिब्बल ने भले ही बहुत शोर मचाया हो, लेकिन अब उस पर ब्रेक भी लग सकता है। बड़ी चुनौती स्कूली शिक्षा, खास तौर से शिक्षा का अधिकार कानून के अमल व सर्वशिक्षा अभियान में आ सकती है। वजह यह है कि जितने धन की जरूरत है, उतना दे पाने में योजना आयोग ने हाथ खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय को उच्च शिक्षा में विस्तार और स्कूली शिक्षा की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए जितने धन की दरकार है, योजना आयोग देने को तैयार नहीं है। बताते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सिर्फ स्कूली शिक्षा में आगामी वित्त वर्ष (2011-12) में 60 हजार करोड़ रुपये की दरकार है, जबकि योजना आयोग 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा देने को तैयार नहीं है। बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के मद्देनजर अकेले सर्वशिक्षा अभियान के मद में लगभग 35 हजार करोड़ की जरूरत है, जबकि 20 हजार करोड़ से ज्यादा मिलने की उम्मीद नहीं है, जो चालू वित्तीय वर्ष के 19 हजार करोड़ रुपये से महज एक हजार करोड़ ही ज्यादा है। मंत्रालय के उच्चपदस्थ सूत्रों की मानें तो उसके सामने शिक्षा का अधिकार कानून पर प्रभावी अमल, साक्षरता, खास तौर से महिला साक्षरता के लिए साक्षर भारत जैसी योजना, व्यावसायिक स्कूली शिक्षा की चुनौतियां सामने हैं। मिड-डे-मील (मध्यान्ह भोजन) को 6वीं कक्षा से बढ़ाकर जूनियर हाईस्कूल तक कर दिए जाने की चुनौती और बढ़ गई है। जबकि सर्वशिक्षा अभियान की सफलता के बाद आए दबाव से निपटने के लिए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान को भी ज्यादा तवज्जो दिए जाने की जरूरत है। इसके अलावा नवोदय विद्यालयों व केंद्रीय विद्यालयों के खर्च व विस्तार की योजनाएं हैं। इसी तरह उच्च शिक्षा में नए आइआइटी, नए आइआइएम, नए विश्वविद्यालयों, इनोवेटिव विश्वविद्यालयों के अलावा नए उच्च शिक्षण संस्थानों के भवनों, बुनियादी सुविधाओं व अन्य संसाधनों को उपलब्ध कराना जरूरी है। सूत्र बताते हैं कि इस सबके लिए मंत्रालय को आगामी बजट में कम से कम 20 हजार करोड़ रुपये चाहिए, लेकिन उसमें भी 13,500 करोड़ से ज्यादा मिलने के आसार नहीं हैं। गौरतलब है कि चालू वित्तीय वर्ष में उच्च शिक्षा में लगभग 11 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। कपिल सिब्बल ने बुधवार को ही शिक्षा के बजट के मसले पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से बातचीत की थी।
Friday, February 4, 2011
दलितों के दायरे में लाएं स्कूल
आज भी भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार पर निगरानी करने के लिए एक मुकम्मल प्राधिकार की कमी है जो समावेशी और समानता आधारित शिक्षा के प्रोत्साहन में बड़ी बाधा है। लिहाजा, एक्ट के रूप में वैधानिक ढांचा तैयार कर उसे लागू किया जाए ताकि भेदभाव की समस्या उठाई जा सके। साथ ही शिक्षा-पण्राली के अंतर्गत शिकायत निबटारे के लिए एक तंत्र सुनिश्चित किया जाए जिससे दलित बच्चे और अभिभावक किसी भी प्रकार के बदले या प्रतिशोध के भय के अपने मसले उठा सकें
दलितों में बढ़ती साक्षरता दर से जाहिर होता है कि इस समुदाय ने शिक्षा को विकास, सम्मान तथा सामाजिक-आर्थिक बढ़ोतरी का महत्वपूर्ण हथियार माना है। हालांकि इसके लिए उन्हें कड़े संघर्षों से गुजरना पड़ा है। लिहाजा, शिक्षा को गैर-बराबरी मिटाने और मानव संसाधन विकास के प्रोत्साहन के महत्वपूर्ण औजार के रूप में देखा जाना चाहिए। ग्यारहवीं योजना में सच ही चिह्नित है कि शिक्षा और स्वास्थ्य का बेहतर स्तर दीर्घकालीन विकास की पूर्वपीठिका है। स्कूलों में दाखिले की दर में बढ़ोतरी हो रही है लेकिन यह भी सच है कि स्कूल छोड़ने की दर, विशेषकर युवाओं में लगातार उठान पर है। जाहिर है, इसके चलते उनकी भागीदारी, कौशल- संवर्धन और रोजगार में अवरोध पैदा होता है। उच्च शिक्षा में सकल दाखिला दर 72.8 प्रतिशत थी जबकि अनुसूचित जाति के मामले में यह महज 0.5 प्रतिशत है। इसकी कई वजहें हैं, जिनमें मैला ढोने समेत देवदासी, बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी जैसी प्रथाओं के कारण दलित बच्चों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। उन्हें मजबूरन स्कूल छोड़ श्रम बाजार और सड़कों पर उतरना पड़ता है। इतना ही नहीं, स्कूल पूर्व शिक्षा से लेकर उत्कृष्ट संस्थानों तक में जाति और जेंडर आधारित भेदभाव व्याप्त है। दलित समुदाय के छात्र, जो इन संस्थानों में बराबरी और समानता के व्यवहार की उम्मीद करते हैं, को अकसर भारी कीमत चुकानी पड़ती है। कई बार तो जान तक गंवा देनी पड़ती है। स्कूलों तथा प्रोफेशनल कॉलेजों से इससे मुताल्लिक खबरें आती रही हैं। कुछ ही महीने पहले दिल्ली विवि के सत्यवती (सांध्य) कॉलेज में ऐसा ही एक हादसा हुआ था। प्रावधानों और हकदारी का अपर्याप्त और संवेदनहीन कार्यान्वयन कई दलित बच्चों और युवाओं के सम्मान को आघात पहुंचाता है और उनके व्यक्तित्व विकास पर नकारात्मक असर डालता है। दलित हलकों में खराब इंफ्रास्ट्रक्चर तथा सुविधाओं के मामले में राज्य के असमान प्रावधान के चलते दलित बच्चों और युवाओं के लिए स्कूल पूर्व से लेकर उच्च शिक्षा तक अवरोध पैदा होते हैं। उपलब्ध संसाधनों के बारे में सूचना, मार्गदर्शन तथा सहयोग की कमी के चलते भी इनके लिए अवसर और पसंद सीमित हो जाते हैं। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के घटते अवसर और निजी क्षेत्र में उनके लिए रोजगार को प्रोत्साहन न मिलने तथा उद्यमशीलता के अभाव के चलते इन परिवारों का उच्च शिक्षा के प्रति रुझान नहीं बन पाता है। बारहवीं योजना के तहत सरकार को चाहिए कि दलित शिक्षा संबंधी उक्त समस्याओं केंद्र में रखे। यानी स्कूल पूर्व से लेकर उच्च शिक्षा तक एक समेकित शिक्षा पण्राली हो बजाय इसके कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर अलग-अलग ध्यान दिया जाए। स्कूल पूर्व से लेकर स्कूल, तकनीकी तथा उच्च शिक्षा पर दलितों की समान और न्यायसंगत पहुंच होनी चाहिए। दलित बच्चों की शिक्षा के रास्ते में जाति और जेंडर आधारित भेदभाव बड़ी रुकावट है। हालांकि बहुत सारी नीतियां अस्पृश्यता और जाति आधरित भेदभाव के उन्मूलन की बात कहती है, फिर भी शिक्षकों, शैक्षणिक प्रशासकों तथा वृहत्तर नागर समाज में आज भी पारंपरिक जातिवादी मानसिकता व्याप्त है। भारत ने भी संयुक्तराष्ट्र के शुरुआती कंवेन्शनों में से एक यूएन कंवेन्शन अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन इन एजुकेशन पर दस्तखत किये हैं। लिहाजा भेदभाव हीनता को शिक्षा के सभी स्तरों पर वस्तुनिष्ठ तथा निगरानी योग्य सूचक के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। इसके कार्यान्वयन के सूचकों तथा मानकों को स्कूल रिपरेटिंग के स्वरूप में शामिल किया जाना चाहिए। हर स्तर पर शिक्षकों तथा प्रबंधनों को जागरूक बनाया जाना चाहिए कि वे भेदभावहीनता की कसौटियों तथा स्तरों को जानें, संवेदनशील बनें। आज भी भेदभाव, सामाजिक वहिष्कार पर निगरानी के लिए एक मुकम्मल प्राधिकार की कमी है जो समावेशी और समानता आधरित शिक्षा के प्रोत्साहन में बड़ी बाधा है। लिहाजा एक्ट के रूप में वैधानिक ढांचा तैयार कर उसे लागू किया जाए ताकि शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव की समस्या उठाई जा सके। साथ ही शिक्षा-पण्राली के अंतर्गत शिकायत निबटारे के लिए एक तंत्र सुनिश्चित किया जाए ताकि दलित बच्चे और अभिभावक किसी भी प्रकार के बदले या प्रतिशोध के भय के अपने मसले उठा सकें। दलित छात्र बहुत से प्रावधानों के हकदार हैं- मसलन, पूर्व और उत्तर मैट्रिक छात्रवृत्ति, छात्रावास, मुफ्त किताबें, अतिरिक्त ट्यूशन वगैरह जबकि इनका कार्यान्वयन अपर्याप्त और हतोत्साही है। योजना को चाहिए कि वह इनकी पहुंच, कीमत, समतुल्यता, सामयिकता, गुणवत्ता, तथा छात्रों के सम्मान के प्रति इनकी संवेदनशीलता, इत्यादि की दृष्टि से इन प्रावधानों की समीक्षा करे। दूर-दराज में सूचनाओं से बेखबर दलित अभिभावक शिक्षा के बेहतरीन स्वरूपों तथा हकदारी के बारे में नहीं जानते हैं। उनके आजू-बाजू ब्लॉक स्तर पर उत्कृष्ट संस्थानों, स्कूल-पूर्व तथा स्कूली शिक्षा की शुरुआत की जाए तथा इन केंद्रों से उनका परिचय कराया जाए ताकि वे उन केंद्रों और स्कूलों में प्रदान की जाने वाली सुविधाओं और उनके स्तर की निगरानी कर सकें जिनमें उनके बच्चे जाते हैं। दलित प्रतिनिधियों के लिए भी ऐसे अवसर सृजित हों, उन्हें स्कूल कमेटियों में स्थान मिले ताकि निगरानी के साथ बेहतर स्तर तय कर सकें। दलित समुदायों के अंदर भी कुछ तबकों को अपने पेशों या अन्य पारंपरिक कामों के कारण अतिरिक्त भेदभाव झेलना पड़ता है। मैला ढोने का काम करने वाले, देवदासी तथा बंधुआ मजदूरों के बच्चे इसी श्रेणी में आते हैं। कुछ समुदाय राज्य या इलाके के परिप्रेक्ष्य में विशेष रूप से वंचित हैं। लिहाजा बारहवीं योजना के अंतर्गत शिक्षा पण्राली में ऐसा कोई तरीका विकसित होना चाहिए जो ऐसे बच्चों को खास तौर से चिह्नित करे और सुनिश्चित करे कि उन्हें शिक्षा का न्यायसंगत अवसर और लाभ मिले। दलितों को भारत में आबादी के लाभांश के वृहत्तर तबके के तौर पर मान्यता मिलनी चाहिए। यह उच्च शिक्षा और कौशल विकास की दृष्टि से दलित युवकों में समुचित निवेश के मार्फत मुमकिन हो सकता है। आज जहां निजी शिक्षा की भूमिका बढ़ रही है, तकनीकी और प्रोफेशनल शिक्षा के मामले में दलित युवाओं की और अधिक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। और इसके लिए ऐसी शिक्षा में आरक्षण का प्रावधान जरूरी होगा। शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट-पब्लिक-कम्युनिटि-पार्टनरशीप (पीपीसीपी) मॉडल के रूप में दलितों के प्रति निष्पक्षता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि योग्यताधारी दलित शिक्षा-प्रदाता बन सकें। दलितों की शिक्षा और उनके विकास की राह में कार्यान्वयन में कोताही बड़ी समस्या है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय में उच्चस्थ स्तर पर निगरानी की एक पद्धति शुरू की जानी चाहिए। दलित समुदाय को समुदाय स्तर से लेकर राज्य और देश तक सभी स्तरों पर तमाम निगरानी पण्राली एवं प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए। असली मसलों के प्रतिनिधित्व को लेकर बहुत सारे अवरोध हैं, लिहाजा उच्चस्थ स्तर पर निगरानी पण्राली के अंतर्गत खास तौर से अवसर और मंच सृजित किए जाने चाहिए ताकि समस्याओं और अवरोधों के बारे में र्चचा की जा सके। इन प्रयासों के बिना दलितों को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल कर पाने का सपना पूरा नहीं हो सकेगा।
Thursday, February 3, 2011
रेडियो टैग पहनाने वालों को क्यों मिले विवि खोलने की अनुमति
सरकार विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश के दरवाजे खोलने को भले ही आतुर हों, लेकिन उसकी यह कोशिश संसदीय समिति के गले के नीचे नहीं उतर रही है। समिति के कई सदस्यों ने विदेशी शिक्षण संस्थान (प्रवेश नियमन एवं संचालन) विधेयक लाने पर ही सवाल उठा दिया है, जबकि कई सदस्यों ने उसके प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। यहां तक कि कुछ सदस्यों ने अमेरिका में भारतीय छात्रों को रेडियो टैग बांधने का मुद्दा उठाकर भी विदेशी विवि के प्रवेश का विरोध किया। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की सोमवार को हुई बैठक में विदेशी शिक्षण संस्थान (प्रवेश नियमन एवं संचालन) विधेयक-2010 पर कई सदस्यों ने आपत्ति जताई। बताते हैं कि एक सदस्य ने कहा कि अमेरिका में भारतीय छात्रों की टांगों में रेडियो टैग बांधे गए हैं, फिर भी सरकार उनके लिए दरवाजे खोलने जा रही है। आखिर इसका औचित्य क्या है? कुछ सदस्यों ने यह कहकर विधेयक का विरोध किया कि हार्वर्ड व आक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय तो भारत में आने को तैयार नहीं हैं, बाकी जो आएंगे, क्या गारंटी है कि वे फर्जी न हों। उनका मकसद यहां आकर सिर्फ कमाई करना होगा। लिहाजा उनको यहां आने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। सदस्यों ने यह भी सवाल उठाया कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, जबकि सरकार ने विधेयक में राज्यों से समुचित मशविरा नहीं किया है। एक सदस्य ने कहा कि विधेयक हड़बड़ी में बनाया गया है और उसमें कई खामियां हैं। बैठक में मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल व कांग्रेस सांसद राहुल गांधी समेत संसदीय समिति के दूसरे सदस्य भी मौजूद थे।
मुस्लिम बच्चों ने किया स्कूलों की ओर रुख
मुसलमानों की शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर जस्टिस सच्चर की रिपोर्ट के खुलासे के बाद समुदाय के लोगों का कुछ खास फायदा हुआ या न हुआ हो, लेकिन पढ़ाई का मतलब उनकी समझ में जरूर आ गया है। शायद यही वजह है कि मुस्लिम बच्चों ने तेजी से स्कूल का रुख कर लिया है। खास बात यह है कि स्कूलों में मुस्लिम बच्चों की तादाद साल दर साल बढ़ रही है। सूत्रों के मुताबिक तीन साल पहले देश में कुल मुस्लिम बच्चों में से साढ़े दस प्रतिशत ही प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे थे। 2008-09 में इसमें थोड़ा और सुधार हुआ, लेकिन 2009-10 में यह लगभग साढ़े तेरह प्रतिशत तक पहंुच गई। इस समुदाय के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में राष्ट्रीय स्तर पर इस रुझान की एक बड़ी वजह यह भी है कि ज्यादा बड़ी मुस्लिम आबादी वाले उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों के मुस्लिम बच्चों के दाखिले में खासी वृद्धि हुई है। बीते तीन वर्षो में पश्चिम बंगाल में प्राइमरी स्कूलों में मुस्लिम बच्चों का दाखिला दर 28 प्रतिशत से 32.50 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 9.34 प्रतिशत से बढ़कर 10.31 प्रतिशत और बिहार में 11.27 से बढ़कर 13.83 प्रतिशत तक पहंुच गई। झारखंड में भी बीते तीन वर्षों में इस दाखिले में तीन प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दाखिले में वृद्धि की लगभग ऐसी ही रफ्तार अपर प्राइमरी स्कूलों में भी देखने को मिल रही है। अहम बात यह है कि मुस्लिम समुदाय की लड़कियों ने भी पढ़ने में रुचि लेना शुरू कर दिया है। गौरतलब है कि जस्टिस सच्चर ने अपनी रिपोर्ट में मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई की सबसे बदतर स्थिति को सुधारने पर खास जोर देने की पैरवी की थी। सूत्र बताते हैं स्कूली पढ़ाई में पिछड़े वर्ग के बच्चों के दाखिले में अलग-अलग राज्यों में बढ़ने-घटने के भी संकेत हैं। मसलन राष्ट्रीय स्तर पर तो इसमें बीते वर्षो में हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में पिछड़े वर्ग के बच्चों के दाखिले में वृद्धि हुई है।
व्यावसायिक शिक्षा पर अलग बोर्ड के गठन पर विचार
बच्चों की रचनात्मक क्षमता के विकास और रोजगार के नए अवसर सृजित करने के उद्देश्य से सरकार व्यावसायिक शिक्षा पर अलग बोर्ड गठित करने पर विचार कर रही है। मानव संसाधान विकास मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि व्यावसायिक शिक्षा की ढांचागत विकास योजना के तहत अलग बोर्ड बनाने पर विचार किया जा रहा है। हालांकि इस विचार को राज्यों के साथ विचार विमर्श के बाद ही अंतिम रूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत पाठ्यक्रम विकास एवं मूल्यांकन में व्यावसायिक क्षेत्र दक्षता परिषद (वोकेशनल सेक्टर स्किल काउंसिल) सहयोग करेंगे। अधिकारी ने बताया कि व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों के प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया जाएगा और व्यावहारिक प्रशिक्षण को खासी तवज्जो दी जाएगी। उन्होंने कहा कि ऐसा देखा गया है कि पिछले कई वर्षो में विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रमों में कोई बदलाव नहीं किए गए हैं जिसके कारण बदलते समय में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। इसे ध्यान में रखते हुए व्यावसायिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में तीन वर्षो में कम से कम एक बार बदलाव एवं समीक्षा करने का प्रस्ताव किया गया है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने व्यावसायिक शिक्षा पर जोर देते हुए दक्षता विकास मिशन (स्किल डवलपमेंट मिशन) के गठन की घोषणा की है। अधिकारी ने कहा कि वर्तमान समय में देश में व्यावसायिक शिक्षा एवं दक्षता उन्नयन से जुड़े संस्थाओं में 31 लाख लोगों प्रशिक्षित करने की क्षमता है जिसे बढ़कर एक करोड़ करने की योजना है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में शिक्षा के वर्तमान स्वरूप के तहत छात्र 18 वर्ष की उम्र से व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करते हैं जबकि दुनिया के कई देशों में कम उम्र से ही व्यावसायिक शिक्षा प्रदान की जाती है। मसलन, ब्रिटेन में व्यावसायिक शिक्षा के लिए बच्चों की उम्र 14 वर्ष, चीन में 12 वर्ष, फ्रांस में 11 वर्ष और ब्राजील में 16 वर्ष है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मानना है कि छोटे देश अधिक उम्र में बच्चों को व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करना वहन कर सकते हैं लेकिन भारत जैसे बड़े एवं घनी आबादी वाले देश में यह माध्यमिक स्तर से ही शुरू होनी चाहिए। आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में 15 से 29 आयु वर्ग के 2 प्रतिशत लोग ही औपचारिक तौर पर दक्षता हासिल किए हुए हैं। जबकि जर्मनी में यह संख्या 65 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत और जापान में 40 प्रतिशत है। व्यावसायिक शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने अगले कुछ वर्षो में 50 हजार दक्षता उन्नयन केंद्र और।,600 आईटीआई स्थापित करने की योजना बनाई है।
सिर्फ तीन साल में यूपी के स्कूलों में घट गए 12 लाख बच्चे
चुनावी जंग में नारों पर भारी पड़ रहे मुद्दों के बीच बिहार में नीतीश कुमार ने स्कूली शिक्षा को भुना तो लिया, लेकिन क्या उत्तर प्रदेश में भी यह संभव हो पाएगा? क्योंकि स्कूली पढ़ाई-लिखाई के मामले में दोनों ही राज्य देश की तस्वीर बदरंग किए हुए हैं। आलम यह है कि उत्तर प्रदेश में तो महज तीन साल में सिर्फ प्राइमरी में लगभग 12 लाख बच्चे स्कूल से नदारद हो गए। जबकि बिहार में भी कई मामलों में स्कूली पढ़ाई का ढांचा चरमराया हुआ है। सरकारी तथ्यों पर गौर करें तो तीन साल पहले उत्तर प्रदेश के प्राइमरी स्कूलों में दो करोड़ 51 लाख बच्चे पढ़ रहे थे। 2008-09 में वह घटकर दो करोड़ 49 लाख पर आ गए। जबकि 2009-10 में यह संख्या और घटकर दो करोड़ 39 लाख पर आ गयी। सूत्रों के मुताबिक इस स्थिति का खुलासा राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय (न्यूपा) की एक ताजा रिपोर्ट से हुआ है। बताते हैं कि महज तीन साल के भीतर उत्तर प्रदेश के प्राइमरी स्कूलों से लगभग 12 लाख बच्चों का नदारद होना एक खतरनाक संकेत है। सवाल यह है कि आखिर दाखिलों में लाखों बच्चों की कमी की असल वजह क्या है? छह से चौदह साल तक के बच्चों को अनिवार्य व मुफ्त शिक्षा के कानून में एक शिक्षक पर 30 बच्चों को पढ़ाने का प्रावधान है। सूत्रों की मानें तो न्यूपा की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश और बिहार की अलग ही कहानी बयां करती है। बिहार के 45 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के 25 प्रतिशत से अधिक स्कूलों (प्राइमरी व अपर प्राइमरी) में अब भी एक शिक्षक पर 60 बच्चों से अधिक को पढ़ाने का दबाव है। झारखंड में लगभग 19 प्रतिशत स्कूल इसी श्रेणी में हैं। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ 12 प्रतिशत स्कूल इस श्रेणी में हैं। इतना ही नहीं, एक क्लासरूम में छात्रों के बैठने का राष्ट्रीय औसत 32 का है, जबकि बिहार में अब भी एक कक्षा में औसतन 89 छात्र और उत्तर प्रदेश में 36 छात्र बैठते हैं। झारखंड की स्थिति उत्तर प्रदेश से भी खराब है, वहां एक क्लासरूम में औसतन 47 छात्र बैठते हैं। सूत्रों का कहना है कि बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों के लिए यह और चिंताजनक है कि वहां महज एक शिक्षक के भरोसे चलने वाले स्कूलों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। मसलन बिहार में 2008-09 में 4.93 प्रतिशत एकल शिक्षक स्कूल थे, जो 2009-10 में बढ़कर 5.44 प्रतिशत हो गए। इसी अवधि में उत्तर प्रदेश में भी एकल शिक्षक स्कूल 7.49 से बढ़कर 7.87 प्रतिशत और झारखंड में 7.41 प्रतिशत से बढ़कर 8.02 प्रतिशत तक पहंुच गये। गौरतलब है कि बिहार विधानसभा के चुनाव में नीतीश कुमार की भारी जीत के पीछे स्कूली शिक्षा में सुधार को भी एक वजह बतायी जा रही है।
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