स्कूलों में दाखिलों की दिक्कत से जूझ रहे माता-पिता को उनके सांसद भी ज्यादा राहत नहीं दिला पाएंगे। कानून मंत्रालय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उस प्रस्ताव को हरी झंडी देने से इंकार कर दिया है जिसमें केंद्रीय विद्यालयों के दाखिलों में सांसदों का कोटा दो से बढ़ाकर पांच करने की बात कही गई थी। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की पहल पर उनके मंत्रालय ने केंद्रीय विद्यालयों के दाखिले में सांसदों के कोटे को बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था। मंत्रालय ने कानूनी बाध्यताओं के तहत प्रस्ताव पर कानून मंत्रालय की मंजूरी मांगी थी। बताते हैं कि कानून मंत्रालय ने सुप्रीमकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए विवेकाधीन कोटे के मामले को जन नीति के दायरे में आने की बात कही है। साथ ही विवेकाधीन कोटे के मनमाने उपयोग की गुंजाइश से बचने की भी पैरवी की। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कोटे को बढ़ाने के पीछे केंद्रीय विद्यालयों की संख्या 871 से बढ़कर 1085 हो जाने का तर्क दिया था। कानून मंत्रालय ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया है कि जिस लिहाज से सांसदों के कोटे की सीटें बढ़ाने की मांग की गई है, उस हिसाब से केंद्रीय विद्यालयों की संख्या नहीं बढ़ी है। वैसे भी यह मामला कानूनी नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रकृति का है। लिहाजा मंत्रालय को इस बारे में अपने स्तर पर ही फैसला लेना चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कहना था कि मानव संसाधन विकास मंत्री के कोटे की हर साल 1200 सीटों पर दाखिले का प्रावधान 2010 से ही खत्म किया जा चुका है। सांसदों के कोटे को दो से पांच करने पर हर शैक्षिक सत्र में सिर्फ 2400 अतिरिक्त दाखिले ही करने होंगे। सांसद अपने कोटे के हर साल पांच दाखिलों में से तीन को अपने संसदीय क्षेत्र में और दो को अपने क्षेत्र के ही लोगों के बच्चों के लिए दिल्ली में उपयोग कर सकेंगे। राज्यसभा सांसद अपने प्रदेश व दिल्ली में अपने कोटे का इस्तेमाल कर सकते थे। दूसरी बात यह कि इससे शिक्षा का अधिकार कानून के तहत वर्ग विशेष के लिए 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों पर भी कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। जिन सांसदों के क्षेत्र में केंद्रीय विद्यालय नहीं हैं, वे अपने बगल के संसदीय क्षेत्र में कोटे का इस्तेमाल कर सकते थे।
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Saturday, July 16, 2011
Wednesday, June 15, 2011
छात्रों के लिए आया 2200 का लैपटॉप
विद्यार्थियों के लिए सबसे सस्ते लैपटॉप का इंतजार खत्म। लगभग ढाई साल की सरकारी कोशिशों के बाद उसकी पहली खेप इसी महीने आने जा रही है। अभी कीमत होगी महज 2200 रुपये। आगे चलकर और भी कम हो जाएगी। सरकार इसे उच्च शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव के रूप में देख रही है। उच्च शिक्षा के छात्रों की पढ़ाई-लिखाई के लिए अपने तरीके के इस बिल्कुल अलग लैपटॉप को अपने देश के इंजीनियरों के डिजाइन पर कनाडा से बनवाया गया है। बाद में यह देश में ही बनेगा। फिलहाल एक लाख लैपटॉप के ऑर्डर दिए जा चुके हैं। उसका पूरा भुगतान मानव संसाधन विकास मंत्रालय करेगा। तीन-चार महीने के भीतर ये लैपटॉप आ जाएंगे। फील्ड ट्रायल के लिए हर राज्य सरकार को 3000 लैपटॉप मुफ्त में दिए जाएंगे। राज्यों के जरिए ही यह उच्च शिक्षा के छात्रों तक प्रायोगिक तौर पर पहंुचेंगे। राज्य सरकार इन्हें किन छात्रों के हाथ पहंुचाती है, यह अधिकार उसका होगा। लैपटॉप में छात्रों को कोई खामी दिखती है, तो उसे दूर किया जाएगा। लैपटॉप की पहली खेप में आइआइटी राजस्थान के पास इसी महीने पहंुच रही है। उसके लिए दस हजार लैपटॉप के ऑर्डर दिए गए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उसके लिए धन भी मुहैया करा दिया है। चूंकि अभी सिर्फ एक लाख लैपटॉप के आर्डर दिए गए हैं। एक लैपटॉप की कीमत 2200 रुपये आ रही है। ऑर्डर बढ़ने पर यह लगभग 1500 रुपये तक आ सकती है। सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी मिशन के जरिए उच्च शिक्षा में प्रौद्योगिकी के अधिकतम इस्तेमाल पर जोर दिया है। उसी क्रम में यह सबसे सस्ता लैपटॉप छात्रों के लिए तैयार कराया गया है। इस पर बीते ढाई साल से काम चल रहा था। बताते हैं कि आगे चलकर छात्रों के लिए लैपटॉप खरीदने में केंद्र व राज्य के बीच खर्च में 50:50 का बंटवारा हो सकता है। फिलहाल एक बार एक लाख लैपटॉप के उपयोग में आने के बाद बाकी औपचारिकताओं को पूरा किया जाएगा।
Wednesday, June 1, 2011
24 साल बाद नई शिक्षा नीति पर जागी सरकार
चौबीस साल बाद सरकार को फिर नई शिक्षा नीति की जरूरत महसूस हुई है। वजह यह है कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल 1986 में बनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति मौजूदा वैश्विक चुनौतियों व इस समय रोजगार की जरूरतों पर खरी नहीं उतर रही है। लिहाजा सरकार नई शिक्षा नीति बनाने के मामले में अब और देरी नहीं चाहती। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अब अपने जरूरी एजेंडे में शामिल कर लिया है। बताते हैं कि खुद सरकार का भी मानना है कि 1986 में बनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति मौजूदा शैक्षिक परिदृश्य व रोजगार की जरूरतों के लिहाज से लगभग अप्रासंगिक हो गई है। क्योंकि बीते लगभग दो दशक में वैश्विक स्तर पर शिक्षा की दुनिया बहुत शिक्षा नीति में 1992 में मामूली बदलाव किया गया था, फिर भी उससे आज की चुनौतियों से नहीं निपटा जा सकता। ऐसे में हमें एक ऐसी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की दरकार है, जो न सिर्फ हमारी जरूरतों को पूरा कर सके, बल्कि वैश्विक शैक्षिक चुनौतियों से भी निपटने में सक्षम हो। यूजीसी ने मार्च में केंद्रीय व राज्यस्तरीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को सम्मेलन कराया था। उस सम्मेलन में कुलपतियों ने भी यथाशीघ्र नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाने का सुझाव दिया था। सूत्रों का कहना है कि सरकार अब इस पर गंभीर है, इसीलिए इसे केब के एजेंडे में शामिल किया गया है। हालांकि वह कुलपतियों के सम्मेलन के दूसरी सिफारिशों के अमल पर भी विचार-विमर्श करेगी। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीते दिनों आइआइटी और आइआइएम जैसे देश के हाइप्रोफाइल संस्थानों की गुणवत्ता, उसकी फैकल्टी और वहां हो रहे शोध पर सवाल उठाए थे। वैसे भी शोध के मामले में भारत अमेरिका, जापान और यहां तक कि पड़ोसी चीन के भी सामने कहीं नहीं ठहरता।
Sunday, May 1, 2011
आधा दर्जन राज्यों में स्कूली शिक्षा खतरे में
देश में स्कूली पढ़ाई का एजेंडा विद्यालय भवनों व छात्रों की कमी से नहीं, बल्कि शिक्षकों की कमी के कारण पटरी से उतरने वाला है। एक तरफ शिक्षा का अधिकार कानून के अमल के लिए पांच लाख से अधिक नए शिक्षकों की दरकार है तो दूसरी तरफ पूरे देश में पहले से ही नौ लाख शिक्षक कम हैं। इस मामले में सबसे बदतर स्थिति उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, राजस्थान और उड़ीसा की है। जहां लाखों शिक्षकों के पद अर्से से खाली पड़े हैं। उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार है। मायावती मुख्यमंत्री हैं। पार्टी शुरू से गरीबों, वंचितों, दबे-कुचलों की हिमायती रही है। अब भी इन्हीं तबकों की पढ़ाई की राह मुश्किल है, लेकिन उत्तर प्रदेश में ही सबसे ज्यादा (एक लाख 88 हजार) शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। उसमें भी एक लाख 38 हजार के लिए सीधे राज्य सरकार जिम्मेदार है। बिहार के लिए चर्चा आम है कि वहां नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य में विकास की रफ्तार तेज हुई है। इसीलिए उनकी फिर से सत्ता में वापसी हुई है। शिक्षा की स्थिति भी सुधरी है। इस सुधार के बावजूद वहां डेढ़ लाख से अधिक शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। पश्चिम बंगाल में 34 साल से वाममोर्चा की सरकार है। वाममोर्चा सर्वहारा वर्ग की लड़ाई लड़ने की बात करता रहा है, लेकिन बुनियादी पढ़ाई की राह आसान करने के लिए शिक्षकों के खाली पद भरना उसकी प्राथमिकता में नहीं रहा। इसी तरह झारखंड की भाजपा गठबंधन सरकार और हरियाणा व राजस्थान की कांग्रेसी सरकारें भी शिक्षकों के खाली पड़े पदों को भरने में उतनी ही उदासीन हैं, जैसे दूसरे राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारें। राज्य छोटा भले सही, लेकिन केरल में स्कूली शिक्षकों के सिर्फ 12 पद रिक्त हैं। जबकि उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में पांच हजार से अधिक, पंजाब में 14 हजार और दिल्ली में लगभग आठ हजार स्कूली शिक्षकों के पद नहीं भरे जा सके हैं। उधर, केंद्र सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करती है। शिक्षा का अधिकार कानून में उसका प्रावधान भी कर दिया गया है। फिर भी जल्द कुछ बदलने के आसार नहीं हैं। वजह यह कि केंद्र व राज्य सरकारें अपने ही ढर्रे पर हैं। नतीजा यह है कि देश में स्कूली शिक्षकों के 47 लाख स्वीकृत पदों में से नौ लाख पद खाली पड़े हैं। उसमें छह लाख पद तो राज्य सरकारों के कोटे के हैं। तीन लाख पद सर्वशिक्षा अभियान के तहत भरे जाने हैं। अभियान में केंद्र व राज्यों के बीच खर्च का बंटवारा 65:35 के अनुपात का है।
Friday, February 4, 2011
शिक्षा सुधार एजेंडे पर योजना आयोग का ब्रेक
शिक्षा में सुधार एजेंडे को लेकर कपिल सिब्बल ने भले ही बहुत शोर मचाया हो, लेकिन अब उस पर ब्रेक भी लग सकता है। बड़ी चुनौती स्कूली शिक्षा, खास तौर से शिक्षा का अधिकार कानून के अमल व सर्वशिक्षा अभियान में आ सकती है। वजह यह है कि जितने धन की जरूरत है, उतना दे पाने में योजना आयोग ने हाथ खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय को उच्च शिक्षा में विस्तार और स्कूली शिक्षा की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए जितने धन की दरकार है, योजना आयोग देने को तैयार नहीं है। बताते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सिर्फ स्कूली शिक्षा में आगामी वित्त वर्ष (2011-12) में 60 हजार करोड़ रुपये की दरकार है, जबकि योजना आयोग 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा देने को तैयार नहीं है। बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के मद्देनजर अकेले सर्वशिक्षा अभियान के मद में लगभग 35 हजार करोड़ की जरूरत है, जबकि 20 हजार करोड़ से ज्यादा मिलने की उम्मीद नहीं है, जो चालू वित्तीय वर्ष के 19 हजार करोड़ रुपये से महज एक हजार करोड़ ही ज्यादा है। मंत्रालय के उच्चपदस्थ सूत्रों की मानें तो उसके सामने शिक्षा का अधिकार कानून पर प्रभावी अमल, साक्षरता, खास तौर से महिला साक्षरता के लिए साक्षर भारत जैसी योजना, व्यावसायिक स्कूली शिक्षा की चुनौतियां सामने हैं। मिड-डे-मील (मध्यान्ह भोजन) को 6वीं कक्षा से बढ़ाकर जूनियर हाईस्कूल तक कर दिए जाने की चुनौती और बढ़ गई है। जबकि सर्वशिक्षा अभियान की सफलता के बाद आए दबाव से निपटने के लिए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान को भी ज्यादा तवज्जो दिए जाने की जरूरत है। इसके अलावा नवोदय विद्यालयों व केंद्रीय विद्यालयों के खर्च व विस्तार की योजनाएं हैं। इसी तरह उच्च शिक्षा में नए आइआइटी, नए आइआइएम, नए विश्वविद्यालयों, इनोवेटिव विश्वविद्यालयों के अलावा नए उच्च शिक्षण संस्थानों के भवनों, बुनियादी सुविधाओं व अन्य संसाधनों को उपलब्ध कराना जरूरी है। सूत्र बताते हैं कि इस सबके लिए मंत्रालय को आगामी बजट में कम से कम 20 हजार करोड़ रुपये चाहिए, लेकिन उसमें भी 13,500 करोड़ से ज्यादा मिलने के आसार नहीं हैं। गौरतलब है कि चालू वित्तीय वर्ष में उच्च शिक्षा में लगभग 11 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। कपिल सिब्बल ने बुधवार को ही शिक्षा के बजट के मसले पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से बातचीत की थी।
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