शिक्षा में सुधार एजेंडे को लेकर कपिल सिब्बल ने भले ही बहुत शोर मचाया हो, लेकिन अब उस पर ब्रेक भी लग सकता है। बड़ी चुनौती स्कूली शिक्षा, खास तौर से शिक्षा का अधिकार कानून के अमल व सर्वशिक्षा अभियान में आ सकती है। वजह यह है कि जितने धन की जरूरत है, उतना दे पाने में योजना आयोग ने हाथ खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय को उच्च शिक्षा में विस्तार और स्कूली शिक्षा की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए जितने धन की दरकार है, योजना आयोग देने को तैयार नहीं है। बताते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सिर्फ स्कूली शिक्षा में आगामी वित्त वर्ष (2011-12) में 60 हजार करोड़ रुपये की दरकार है, जबकि योजना आयोग 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा देने को तैयार नहीं है। बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के मद्देनजर अकेले सर्वशिक्षा अभियान के मद में लगभग 35 हजार करोड़ की जरूरत है, जबकि 20 हजार करोड़ से ज्यादा मिलने की उम्मीद नहीं है, जो चालू वित्तीय वर्ष के 19 हजार करोड़ रुपये से महज एक हजार करोड़ ही ज्यादा है। मंत्रालय के उच्चपदस्थ सूत्रों की मानें तो उसके सामने शिक्षा का अधिकार कानून पर प्रभावी अमल, साक्षरता, खास तौर से महिला साक्षरता के लिए साक्षर भारत जैसी योजना, व्यावसायिक स्कूली शिक्षा की चुनौतियां सामने हैं। मिड-डे-मील (मध्यान्ह भोजन) को 6वीं कक्षा से बढ़ाकर जूनियर हाईस्कूल तक कर दिए जाने की चुनौती और बढ़ गई है। जबकि सर्वशिक्षा अभियान की सफलता के बाद आए दबाव से निपटने के लिए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान को भी ज्यादा तवज्जो दिए जाने की जरूरत है। इसके अलावा नवोदय विद्यालयों व केंद्रीय विद्यालयों के खर्च व विस्तार की योजनाएं हैं। इसी तरह उच्च शिक्षा में नए आइआइटी, नए आइआइएम, नए विश्वविद्यालयों, इनोवेटिव विश्वविद्यालयों के अलावा नए उच्च शिक्षण संस्थानों के भवनों, बुनियादी सुविधाओं व अन्य संसाधनों को उपलब्ध कराना जरूरी है। सूत्र बताते हैं कि इस सबके लिए मंत्रालय को आगामी बजट में कम से कम 20 हजार करोड़ रुपये चाहिए, लेकिन उसमें भी 13,500 करोड़ से ज्यादा मिलने के आसार नहीं हैं। गौरतलब है कि चालू वित्तीय वर्ष में उच्च शिक्षा में लगभग 11 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। कपिल सिब्बल ने बुधवार को ही शिक्षा के बजट के मसले पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से बातचीत की थी।
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Friday, February 4, 2011
Friday, January 7, 2011
अब गांवों से निकलेगी डॉक्टरों की फौज
डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहे गांवों को इस साल नई सौगात मिलेगी। स्वास्थ्य मंत्रालय देश के लगभग 6 सौ जिलों एक मेडिकल स्कूल खोलने की तैयारी में है। यहां गांव के ही प्रतिभाशाली छात्रों को चुन कर डॉक्टरी सिखाई जाएगी और फिर उन्हें गांवों में ही काम करने को कहा जाएगा। इससे ग्रामीणों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले झोला छाप चिकित्सकों पर अंकुश लग सकेगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के साथ मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने ग्रामीण डॉक्टरों के पाठ्यक्रम बैचलर ऑफ रूरल हेल्थ केयर (बीआरएचसी) का पाठ्यक्रम भी निर्धारित कर लिया है। सभी राज्यों और संबंधित विवि ने इसके लिए सहमति दे दी है। इसके लिए राज्यों ने अपने जिला अस्पतालों की पहचान शुरू कर दी है। एक बार ये मेडिकल स्कूल शुरू हो जाएं, तो जल्दी ही देश के गांवों में डॉक्टरों की कमी खत्म हो सकेगी। इन डॉक्टरों को पांच साल तक सिर्फ प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों और उप केंद्रों में काम करना होगा। इस समय देश के डेढ़ लाख उप केंद्रों पर एक भी डॉक्टर नहीं है। इन मेडिकल स्कूलों के जरिए हर जिले में सालाना 25 से 50 मेडिकल ग्रेजुएट तैयार होंगे। ऐसे में अगर छह सौ जिलों में 25 ग्रामीण डॉक्टर भी प्रशिक्षित होते हैं, तो देश को हर साल 15 हजार ट्रेंड डॉक्टर मिल सकेंगे। यह पाठ्यक्रम जिला अस्पतालों में शुरू किया जाना है। इसके लिए अस्पताल में कम से कम 150 बिस्तर की क्षमता होनी चाहिए। स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रत्येक पिछड़े अस्पताल को 20 करोड़ की मदद देने की सहमति दी है। इस पाठ्यक्रम में दाखिला सिर्फ ग्रामीण इलाके के छात्रों को ही मिलेगा।
ग्रामीण डॉक्टर क्यों
गांवों में डॉक्टरों का घोर अभाव।
एमबीबीएस का गांवों में जाने को तैयार न होना।
गांवों में साधारण बीमारियों की बहुतायत।
डेढ़ लाख स्वास्थ्य उप केंद्रों पर एक भी डॉक्टर नहीं।
कौन बनेगा ग्रामीण डॉक्टर
सिर्फ ग्रामीण इलाके के छात्र, जिन्होंने 12वीं में भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के साथ ही अंग्रेजी की पढ़ाई की होगी।
इन्हें शुरुआती पांच साल तक सिर्फ गांवों के प्राथमिक चिकित्सा केंद्र (पीएचसी) या उप केंद्र (एससी) में ही काम करना होगा। इसका फायदा सीधे गांव वालों को होगा।
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