लखनऊ प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों में अध्यापकों की भर्ती के लिए प्रदेश में अनिवार्य की गई शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में अब बीए, बीएससी व बीकॉम के अलावा स्नातक स्तर पर विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रम उत्तीर्ण कर एक वर्षीय बीएड पास करने वाले अभ्यर्थी भी शामिल हो सकेंगे। टीईटी के लिए स्नातक में न्यूनतम 50 फीसदी अंक की अनिवार्यता को 45 फीसदी कर दिया गया है। डीएड (विशेष शिक्षा) और बीएड (विशेष शिक्षा) उत्तीर्ण अभ्यर्थी भी टीईटी में शामिल हो सकेंगे। अनुसूचित जाति/जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, विकलांग श्रेणियों के अभ्यर्थियों को अर्हक अंकों में 5 प्रतिशत की छूट दी जाएगी। टीईटी के बारे में 7 सितंबर को जारी शासनादेश में बदलाव करते हुए शासन ने संशोधित आदेश जारी कर दिया है। शिक्षा के अधिकार के तहत राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने 23 अगस्त 2010 को अधिसूचना जारी कर प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट के तौर पर टीईटी को अनिवार्य कर दिया था। उस अधिसूचना में ही एनसीटीई ने शिक्षकों की भर्ती के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता भी तय कर दी थी। एनसीटीई की उस अधिसूचना के आधार पर ही राज्य सरकार ने बीती 7 सितंबर को प्रदेश में टीईटी के आयोजन के बारे में शासनादेश जारी किया था। शासनादेश में कहा गया था कि टीईटी में वह सभी परीक्षार्थी शामिल हो सकेंगे, जिन्होंने न्यूनतम 50 फीसदी अंकों के साथ बीए/बीएससी/बीकॉम किया हो तथा एनसीटीई से मान्यता प्राप्त व उप्र सरकार से संबद्धताप्राप्त संस्था से एक वर्षीय बीएड किया हो। इस बीच एनसीटीई ने 29 जुलाई को नई अधिसूचना जारी कर शिक्षकों की भर्ती के लिए पूर्व में निर्धारित की गई शैक्षिक योग्यता में संशोधन कर दिया। नई अधिसूचना के मुताबिक ऐसे सभी अभ्यर्थी, जिन्होंने न्यूनतम 50 प्रतिशत अंकों के स्नातक और बीएड अर्हता या राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (मान्यता, मानदंड और क्रियाविधि) विनियमों के अनुसार न्यूनतम 45 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातक तथा शिक्षा में एक वर्षीय स्नातक (बीएड) उत्तीर्ण किया हो, जनवरी 2012 तक कक्षा एक से पांच तक के लिए शिक्षक नियुक्त किये जाने के लिए पात्र होंगे
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Monday, September 19, 2011
Saturday, September 17, 2011
प्ले स्कूलों के लिए निगम व सरकार के पास नहीं कानून
नई दिल्ली राजधानी में कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे प्ले स्कूलों पर न तो दिल्ली नगर निगम की लगाम है और न ही इन्हें रोक पाने के लिए दिल्ली सरकार के पास कोई नियम-कानून है। इसका खुलासा सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगे गए सवालों के जवाब से हुआ है। दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार ने तो यहां तक कह दिया कि उनके पास न तो प्ले स्कूल खोलने और न ही खुले स्कूलों पर कार्रवाई करने का कोई प्रावधान है। बड़ा सवाल यह है कि अगर राजधानी के प्ले स्कूलों में कोई हादसा हो जाता है तो कौन जिम्मेदार होगा? राजधानी में करीब डेढ़ हजार प्ले स्कूल चल रहे हैं जहां सवा दो साल से साढ़े तीन साल के बच्चे पढ़ रहे हैं। सूचना के अधिकार कानून के तहत अजय कुमार शर्मा ने दिल्ली सरकार और नगर निगम से जानकारी मांगी थी कि राजधानी में प्ले स्कूल खोलने के लिए क्या-क्या नियम और कायदे-कानून हैं। अगर कोई बिना नियम और कायदे-कानून के प्ले स्कूल खोलता है तो उस पर कार्रवाई के लिए क्या नियम हैं? इन सवालों पर दिल्ली नगर के उप निदेशक (मुख्यालय) की ओर से जवाब आया कि शिक्षा विभाग, दिल्ली नगर निगम में राजधानी में प्ले स्कूल खोलने के संबंध में कोई नियम नहीं है। मतलब साफ है कि प्ले स्कूल खोलना निगम के अनुसार गैर कानूनी है। इतना ही नहीं निगम से यह भी कहा कि जब खोलने के नियम नहीं हैं तो फिर कार्रवाई कैसे होगी? यह तो रहे नगर निगम के जबाव अब आपको बताते हैं दिल्ली सरकार के जवाब। दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय के सहायक निदेशक एम. इक्का ने जवाब में कहा है कि राजधानी में प्ले स्कूल खोलने के लिए कोई नियम नहीं बना है। प्ले स्कूलों पर कार्रवाई के लिए कोई कानून भी सरकार के पास नहीं है। इसका मतलब साफ है कि एक कमरे और दो कमरे में प्ले स्कूल खोलकर दुकानदारी पर लगाम लगने वाली नहीं है
Saturday, July 16, 2011
दाखिलों में नहीं बढ़ेगा सांसदों का कोटा
स्कूलों में दाखिलों की दिक्कत से जूझ रहे माता-पिता को उनके सांसद भी ज्यादा राहत नहीं दिला पाएंगे। कानून मंत्रालय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उस प्रस्ताव को हरी झंडी देने से इंकार कर दिया है जिसमें केंद्रीय विद्यालयों के दाखिलों में सांसदों का कोटा दो से बढ़ाकर पांच करने की बात कही गई थी। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की पहल पर उनके मंत्रालय ने केंद्रीय विद्यालयों के दाखिले में सांसदों के कोटे को बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था। मंत्रालय ने कानूनी बाध्यताओं के तहत प्रस्ताव पर कानून मंत्रालय की मंजूरी मांगी थी। बताते हैं कि कानून मंत्रालय ने सुप्रीमकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए विवेकाधीन कोटे के मामले को जन नीति के दायरे में आने की बात कही है। साथ ही विवेकाधीन कोटे के मनमाने उपयोग की गुंजाइश से बचने की भी पैरवी की। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कोटे को बढ़ाने के पीछे केंद्रीय विद्यालयों की संख्या 871 से बढ़कर 1085 हो जाने का तर्क दिया था। कानून मंत्रालय ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया है कि जिस लिहाज से सांसदों के कोटे की सीटें बढ़ाने की मांग की गई है, उस हिसाब से केंद्रीय विद्यालयों की संख्या नहीं बढ़ी है। वैसे भी यह मामला कानूनी नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रकृति का है। लिहाजा मंत्रालय को इस बारे में अपने स्तर पर ही फैसला लेना चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कहना था कि मानव संसाधन विकास मंत्री के कोटे की हर साल 1200 सीटों पर दाखिले का प्रावधान 2010 से ही खत्म किया जा चुका है। सांसदों के कोटे को दो से पांच करने पर हर शैक्षिक सत्र में सिर्फ 2400 अतिरिक्त दाखिले ही करने होंगे। सांसद अपने कोटे के हर साल पांच दाखिलों में से तीन को अपने संसदीय क्षेत्र में और दो को अपने क्षेत्र के ही लोगों के बच्चों के लिए दिल्ली में उपयोग कर सकेंगे। राज्यसभा सांसद अपने प्रदेश व दिल्ली में अपने कोटे का इस्तेमाल कर सकते थे। दूसरी बात यह कि इससे शिक्षा का अधिकार कानून के तहत वर्ग विशेष के लिए 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों पर भी कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। जिन सांसदों के क्षेत्र में केंद्रीय विद्यालय नहीं हैं, वे अपने बगल के संसदीय क्षेत्र में कोटे का इस्तेमाल कर सकते थे।
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