Showing posts with label पृ.सं.१०. Show all posts
Showing posts with label पृ.सं.१०. Show all posts

Thursday, March 24, 2011

अब पीछे नहीं रहेगा बिहार


शिक्षा, सेहत व अन्य सुविधाओं में जब पिछड़े राज्यों की बात चलती है तब सबसे पहले बिहार का नाम लेने में कोई भी पीछे नहीं रहता। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, क्योंकि यदि हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट की मानें तो बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जहां के 70,000 सरकारी प्राथमिक एवं उच्च विद्यालयों के बारे में तमाम जानकारियां ऑनलाइन कर दी गई हैं। यह काम नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजूकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिशट्रेशन ऑन एलिमेंट्री एजूकेशन (एन.यू.ई.पी.ए.ई.ई.) के तहत चलाई गई परियोजना की सहायता से पूरा हुआ है। बिहार के तमाम गांव, जिलों आदि में चल रहे विभिन्न सरकारी स्कूलों के बारे में बुनियादी जानकारियां 'स्कूल रिपोर्ट कॉर्ड्स' नाम की वेबसाइट में देखी जा सकती हैं। इस साइट पर स्कूल से जुड़ी हर तरह की सूचना मिलेगी। मसलन कितने स्कूलों में बच्चों के लिए शौचालय, ब्लैक बोर्ड, अध्यापक, भवन आदि हैं। राज्य सरकार की इस कोशिश एवं प्रयत्न से अन्य राज्य सरकारों को सीख लेनी चाहिए कि वे भी अपने राज्यों में किस तरह से शिक्षा के अधिकार कानून को अमली जामा पहनाने में मदद कर सकते हैं। राज्य सरकार द्वारा संचालित 70,000 प्राथमिक एवं उच्च विद्यालयों के बारे में एक स्थान पर तमाम सूचनाएं उपलब्ध कराना कोई आसान काम नहीं है। उस पर भी वहां जहां पिछले कई सालों से शिक्षा दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होती मानी जा रही थी लेकिन यह वही राज्य है जिसने साबित कर दिया कि यदि जज्बा हो तो पुरानी इमारत को दुरुस्त किया जा सकता है। लेकिन शर्त यह है कि हमें इसके लिए प्रतिबद्ध होना होगा वरना शिक्षा में न केवल बिहार, बल्कि अमूमन देश के अन्य राज्यों में भी गिरावट साफ देखी जा सकती है। गौरतलब है कि बिहार में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय कभी विश्व प्रसिद्ध ज्ञान केंद्रों में गिना जाता था। लेकिन समय के साथ यह विश्वविद्यालय अपनी चमक खोता चला गया। अब, नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन एवं राज्य व केंद्र सरकारों के अथक प्रयासों के चलते एक बार फिर नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित किया जा रहा है। इस काम में नेशनल नॉलेज कमीशन की भी भूमिका सराहनीय मानी जा सकती है। शिक्षा की दशा-दिशा किसी भी समाज, राज्य व देश की प्रगति को टटोलने में खासा मदद करती है। जिस भी समाज में लोग अधिक से अधिक शिक्षित होंगे वहां की जनचेतना उतनी ही विकसित और सृजनात्मक होगी। यह स्थापित बात है कि जनता शिक्षित हो तो वह अपने एवं समाज के विकास में बेहतर योगादान कर सकती है। कभी समय था जब बिहार शिक्षा के लिए जाना जाता था। लेकिन '80 के दशक से इसमें धीरे-धीरे गिरावट दर्ज की जाने लगी। शिक्षा की गिरती साख को बचाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति भी कमजोर पड़ती चली गई। हालांकि यदि सरकार चाहे तो किसी भी सूरत में शिक्षा ही नहीं, कानून-व्यवस्था तक को सुचारु रूप से चला सकती है लेकिन जब किसी राज्य की राजनीतिक इच्छाशक्ति सम्बंधित व्यक्ति की महज हैसियत बढ़ाने और समाज को विभिन्न मुद्दों पर बरगलाने में लगी हो तो ऐसी सरकार से किस तरह की प्रगति की उम्मीद की जा सकती है। बिहार में जगन्नाथ मिश्र, सत्येंद्र प्रसाद और भगवत झा आजाद के मुख्यमंत्रित्वकाल में शिक्षा की उतनी दयनीय स्थिति नहीं थी जितनी लालू प्रसाद व राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्वकाल में हुई। '90 के दशक में बिहार का भाग्य नए ढंग से लिखा जाने लगा। इस काल में महज लूटपाट, चोरी-चमारी, घोटालों एवं रिश्वतखोरी को खूब हवा मिली। इन सरकारों का लक्ष्य केवल स्व उन्नति एवं स्वहित साधन तक ही केंद्रित था। इसके चलते समाज एवं वहां की जनता की बुनियादी जरूरतों को दरकिनार किया गया। बिहार में शिक्षा का मतलब 'नकल से उपजी प्रतिभा' जैसा कलंक हो गया और लोगों के माथे पर लगने लगा। उस दौर में यदि किसी ने 80 फीसद अंक प्राप्त किया तो उसे संदेह एवं शंका की नजर से देखा जाना बेहद ही आम बात थी। इससे चाहे बोलचाल में हो, या कार्यालयी स्तर पर, हर जगह बिहार से पढ़कर आने वाले छात्रों को भेदपूर्ण नजर का सामना करना पड़ता था। लेकिन पिछले पांच सालों में नीतीश सरकार की नजर शिक्षा को दुरुस्त करने पर गई और समय के साथ इस सरकार की कोशिश एवं प्रयासों के परिणाम सामने आने लगे। स्कूलों में बच्चियों को साइकिल बांटा जाना एक तरह से शिक्षा व स्कूल को घर के दरवाजे पर ला खड़ा करना ही था। गांव, कस्बे व छोटे शहरों में स्कूल जाने में लड़कियों को किस तरह की नजरों, अवरोधों का सामना करना पड़ता है।

Friday, February 25, 2011

शिक्षा को बड़ी उम्मीद है बजट से


बजट के पहले आशाओं तथा आशंकाओं पर र्चचा स्वाभाविक ही नहीं, कई मायनों में आवश्यक भी है। शिक्षा के क्षेत्र में तो समाज के हर वर्ग की रुचि होती है और इसमें अपेक्षाएं भी सदा बढ़ती रहती हैं। बजट से घोषित नीतियों तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में गतिशीलता तथा गुणवत्तापरक सुधार की आशा की जाती है। शिक्षा के मामले में सबसे पहले सबसे महत्वपूर्ण परियोजना लेंिशक्षा के मूल अधिकार विधेयक का एक अप्रैल 2010 से लागू होना। इसके लिए सबसे बड़ी परियोजना है सर्वशिक्षा अभियान यानी एसएसए। इसके अन्तर्गत प्रारंभिक शिक्षा के लिए पिछले चार वर्षो में 54371 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके सामने अनेक समस्याएं हैं। अध्यापकों की भारी कमी है, स्वीकृत पदों में 20 प्रतिशत से अधिक भरे नहीं गये हैं। स्वीकृत 10.8 लाख और भरे गये 8.8 लाख। यदि नये अधिनियम के अनुसार हर बच्चे को स्कूल लाना तथा वहां रखना है तो इससे कहीं अधिक अध्यापकों की जरूरत है। शिक्षा के जिला सूचना संकलन द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 29 प्रतिशत स्कूलों के पास 2009-10 में पक्के भवन नहीं थे। अत: बजट से सबसे महत्वपूर्ण अपेक्षा यही है सभी राज्यों को इतने संसाधन उपलब्ध कराये जाएं कि सभी बच्चों को सही मायने में शिक्षा का मूल अधिकार कौशल प्रशिक्षण के साथ मिल सके। स्कूल पूर्व की शिक्षा व्यवस्था सरकारी स्कूलों में उपलब्ध कराने की व्यवस्था जरूरी है। इसके प्रावधान न होने के कारण सरकारी स्कूल के बच्चे कक्षा एक में आने के पहले ही पब्लिक स्कूलोंके बच्चों से काफी पीछे रह जाते हैं। इस असमानता को दूर करने के लिए आवश्यक संसाधनों का आवंटन राष्ट्र के कर्त्तव्य के रूप में लिया जाना चाहिए। पिछले वर्ष स्कूल ही नहीं विश्वविद्यालयों तथा अन्य उच्च संस्थाओं में गुणवत्ता की कमी पर र्चचा होती रही। अध्यापकों के प्रशिक्षण तथा पुनर्परीक्षण के लिए वर्तमान व्यवस्थाएं नाकाफी हैं। वर्तमान व्यवस्थाएं अपर्याप्त हैं, इसका सटीक प्रमाण है पिछले चार वर्षो में प्रशिक्षण के लिए आवंटित 4000 करोड़ रुपये की धनराशि में केवल 1444 करोड़ यानी 36 प्रतिशत ही खर्च किया जाना। जिस प्रकार जीने के अधिकार में शिक्षा का अधिकार सन्निहित माना गया, उसी तरह शिक्षा पाने के अधिकार में साधन सम्पन्न स्कूल में प्रशिक्षित योग्य शिक्षकों से शिक्षा पाना भी शामिल है। अध्यापकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था के पुनरावलोकन तथा राज्यों में नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावशाली बनाने के लिए भी संसाधनों का आवंटन आवश्यक है। गांवों में ही नहीं, दिल्ली जैसे शहर तक में सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी पाई जाती है। इसे दूर करने के उपाय तथा समानुपातिक संसाधन भविष्य में आशाजनक परिणाम देंगे। नये स्कूल खुलने जरूरी हैं मगर जो चल रहे हैं उनके सुधार व सही स्वरूप में चलते रहने की व्यवस्था जरूरी है। प्राथमिक शालाओं में सरकारी स्कूलों में समाज के वंचित, दलित तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग से ही अधिकांश बच्चे आते हैं। इन्हें बराबरी के आधार पर खड़ा करने के लिए संसाधन कम नहीं पड़ने चाहिए। शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत आवंटन का वादा हर सरकार करती है मगर उसे क्रियान्वित कोई नहीं करता है। राज्य तथा केन्द्र सरकार का शिक्षा पर मिलाजुला खर्च/आवंटन 2000-01 में 82879.2 करोड़ था जो जीडीपी का 3.94 प्रतिशत तथा कुल खर्च का 12.3 प्रतिशत था। 2008-09 में यह 198324.7 करोड़ था जो जीडीपी का 3.40 प्रतिशत तथा कुछ खर्च का 11.6 प्रतिशत था। शिक्षा के मूल अधिकार के क्रियान्वयन के लिए ताकि हर 6-14 वर्ष का बालक- बालिका स्कूल जा सके, एक अनुमान के अनुसार 1.82 लाख करोड़ रुपयों की आवश्यकता होगी। क्या नया बजट इसे ध्यान में रखेगा और जीडीपी के छ: प्रतिशत का लंबित वादा पूरा करने का साहस करेगा? यदि ऐसा नहीं होगा तो भारत के 70-80 प्रतिशत बच्चों को गुणवत्तापरक प्रारंभिक शिक्षा नहीं मिल पायेगी और जब शिक्षा की नींव कमजोर होगी तो समाज में अनेक विषमताएं उभरेंगी। प्रश्न है कि केन्द्रीय विद्यालयों/नवोदय विद्यालयों के संसाधन मानक देश के सभी सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं लागू होने चाहिए। कभी न कभी यह समकक्षता लानी ही होगी। उच्च शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में अनेक दबाव बढ़ रहे हैं। इस स्तर पर युवाओं के लिए सीमित अवसर है अत: विदेश जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो अनेक प्रकार की समस्याओं तथा शोषण का आधार बनती है। नये संस्थान सरकार को स्वयं भी खोलने होंगे। इस स्तर पर कौशलों के उच्चस्तरीय प्रशिक्षण नये विभाग तथा गतिशील व्यवस्था पर खर्च करना आवश्यक है। शोध का स्तर चिन्ताजनक है, इस पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है। उच्च शिक्षा में नामांकन अगले वर्ष में 14-15 प्रतिशत बढ़ाना ही चाहिए तथा अगली योजना में उसे 25 प्रतिशत तक ले जाने की आधारभूत व्यवस्था प्रारंभ हो जानी चाहिये। शिक्षा व्यवस्था में निर्मलता, कर्त्तव्यनिष्ठा, मूल्यबद्धता जैसे कारक हर तरफ हर व्यक्ति में दिखने चाहिए। मूल्यों की शिक्षा, नैतिकता के अध्ययन केन्द्र तथा आध्यात्मिक विश्वविद्यालय खोलने जैसे नवाचारों के लिये वित्तमंत्री आवश्यक आवंटन कर सकें तो यह सराहनीय कदम होगा।



Friday, February 4, 2011

दलितों के दायरे में लाएं स्कूल


आज भी भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार पर निगरानी करने के लिए एक मुकम्मल प्राधिकार की कमी है जो समावेशी और समानता आधारित शिक्षा के प्रोत्साहन में बड़ी बाधा है। लिहाजा, एक्ट के रूप में वैधानिक ढांचा तैयार कर उसे लागू किया जाए ताकि भेदभाव की समस्या उठाई जा सके। साथ ही शिक्षा-पण्राली के अंतर्गत शिकायत निबटारे के लिए एक तंत्र सुनिश्चित किया जाए जिससे दलित बच्चे और अभिभावक किसी भी प्रकार के बदले या प्रतिशोध के भय के अपने मसले उठा सकें
दलितों में बढ़ती साक्षरता दर से जाहिर होता है कि इस समुदाय ने शिक्षा को विकास, सम्मान तथा सामाजिक-आर्थिक बढ़ोतरी का महत्वपूर्ण हथियार माना है। हालांकि इसके लिए उन्हें कड़े संघर्षों से गुजरना पड़ा है। लिहाजा, शिक्षा को गैर-बराबरी मिटाने और मानव संसाधन विकास के प्रोत्साहन के महत्वपूर्ण औजार के रूप में देखा जाना चाहिए। ग्यारहवीं योजना में सच ही चिह्नित है कि शिक्षा और स्वास्थ्य का बेहतर स्तर दीर्घकालीन विकास की पूर्वपीठिका है। स्कूलों में दाखिले की दर में बढ़ोतरी हो रही है लेकिन यह भी सच है कि स्कूल छोड़ने की दर, विशेषकर युवाओं में लगातार उठान पर है। जाहिर है, इसके चलते उनकी भागीदारी, कौशल- संवर्धन और रोजगार में अवरोध पैदा होता है। उच्च शिक्षा में सकल दाखिला दर 72.8 प्रतिशत थी जबकि अनुसूचित जाति के मामले में यह महज 0.5 प्रतिशत है। इसकी कई वजहें हैं, जिनमें मैला ढोने समेत देवदासी, बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी जैसी प्रथाओं के कारण दलित बच्चों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। उन्हें मजबूरन स्कूल छोड़ श्रम बाजार और सड़कों पर उतरना पड़ता है। इतना ही नहीं, स्कूल पूर्व शिक्षा से लेकर उत्कृष्ट संस्थानों तक में जाति और जेंडर आधारित भेदभाव व्याप्त है। दलित समुदाय के छात्र, जो इन संस्थानों में बराबरी और समानता के व्यवहार की उम्मीद करते हैं, को अकसर भारी कीमत चुकानी पड़ती है। कई बार तो जान तक गंवा देनी पड़ती है। स्कूलों तथा प्रोफेशनल कॉलेजों से इससे मुताल्लिक खबरें आती रही हैं। कुछ ही महीने पहले दिल्ली विवि के सत्यवती (सांध्य) कॉलेज में ऐसा ही एक हादसा हुआ था। प्रावधानों और हकदारी का अपर्याप्त और संवेदनहीन कार्यान्वयन कई दलित बच्चों और युवाओं के सम्मान को आघात पहुंचाता है और उनके व्यक्तित्व विकास पर नकारात्मक असर डालता है। दलित हलकों में खराब इंफ्रास्ट्रक्चर तथा सुविधाओं के मामले में राज्य के असमान प्रावधान के चलते दलित बच्चों और युवाओं के लिए स्कूल पूर्व से लेकर उच्च शिक्षा तक अवरोध पैदा होते हैं। उपलब्ध संसाधनों के बारे में सूचना, मार्गदर्शन तथा सहयोग की कमी के चलते भी इनके लिए अवसर और पसंद सीमित हो जाते हैं। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के घटते अवसर और निजी क्षेत्र में उनके लिए रोजगार को प्रोत्साहन न मिलने तथा उद्यमशीलता के अभाव के चलते इन परिवारों का उच्च शिक्षा के प्रति रुझान नहीं बन पाता है। बारहवीं योजना के तहत सरकार को चाहिए कि दलित शिक्षा संबंधी उक्त समस्याओं केंद्र में रखे। यानी स्कूल पूर्व से लेकर उच्च शिक्षा तक एक समेकित शिक्षा पण्राली हो बजाय इसके कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर अलग-अलग ध्यान दिया जाए। स्कूल पूर्व से लेकर स्कूल, तकनीकी तथा उच्च शिक्षा पर दलितों की समान और न्यायसंगत पहुंच होनी चाहिए। दलित बच्चों की शिक्षा के रास्ते में जाति और जेंडर आधारित भेदभाव बड़ी रुकावट है। हालांकि बहुत सारी नीतियां अस्पृश्यता और जाति आधरित भेदभाव के उन्मूलन की बात कहती है, फिर भी शिक्षकों, शैक्षणिक प्रशासकों तथा वृहत्तर नागर समाज में आज भी पारंपरिक जातिवादी मानसिकता व्याप्त है। भारत ने भी संयुक्तराष्ट्र के शुरुआती कंवेन्शनों में से एक यूएन कंवेन्शन अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन इन एजुकेशन पर दस्तखत किये हैं। लिहाजा भेदभाव हीनता को शिक्षा के सभी स्तरों पर वस्तुनिष्ठ तथा निगरानी योग्य सूचक के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। इसके कार्यान्वयन के सूचकों तथा मानकों को स्कूल रिपरेटिंग के स्वरूप में शामिल किया जाना चाहिए। हर स्तर पर शिक्षकों तथा प्रबंधनों को जागरूक बनाया जाना चाहिए कि वे भेदभावहीनता की कसौटियों तथा स्तरों को जानें, संवेदनशील बनें। आज भी भेदभाव, सामाजिक वहिष्कार पर निगरानी के लिए एक मुकम्मल प्राधिकार की कमी है जो समावेशी और समानता आधरित शिक्षा के प्रोत्साहन में बड़ी बाधा है। लिहाजा एक्ट के रूप में वैधानिक ढांचा तैयार कर उसे लागू किया जाए ताकि शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव की समस्या उठाई जा सके। साथ ही शिक्षा-पण्राली के अंतर्गत शिकायत निबटारे के लिए एक तंत्र सुनिश्चित किया जाए ताकि दलित बच्चे और अभिभावक किसी भी प्रकार के बदले या प्रतिशोध के भय के अपने मसले उठा सकें। दलित छात्र बहुत से प्रावधानों के हकदार हैं- मसलन, पूर्व और उत्तर मैट्रिक छात्रवृत्ति, छात्रावास, मुफ्त किताबें, अतिरिक्त ट्यूशन वगैरह जबकि इनका कार्यान्वयन अपर्याप्त और हतोत्साही है। योजना को चाहिए कि वह इनकी पहुंच, कीमत, समतुल्यता, सामयिकता, गुणवत्ता, तथा छात्रों के सम्मान के प्रति इनकी संवेदनशीलता, इत्यादि की दृष्टि से इन प्रावधानों की समीक्षा करे। दूर-दराज में सूचनाओं से बेखबर दलित अभिभावक शिक्षा के बेहतरीन स्वरूपों तथा हकदारी के बारे में नहीं जानते हैं। उनके आजू-बाजू ब्लॉक स्तर पर उत्कृष्ट संस्थानों, स्कूल-पूर्व तथा स्कूली शिक्षा की शुरुआत की जाए तथा इन केंद्रों से उनका परिचय कराया जाए ताकि वे उन केंद्रों और स्कूलों में प्रदान की जाने वाली सुविधाओं और उनके स्तर की निगरानी कर सकें जिनमें उनके बच्चे जाते हैं। दलित प्रतिनिधियों के लिए भी ऐसे अवसर सृजित हों, उन्हें स्कूल कमेटियों में स्थान मिले ताकि निगरानी के साथ बेहतर स्तर तय कर सकें। दलित समुदायों के अंदर भी कुछ तबकों को अपने पेशों या अन्य पारंपरिक कामों के कारण अतिरिक्त भेदभाव झेलना पड़ता है। मैला ढोने का काम करने वाले, देवदासी तथा बंधुआ मजदूरों के बच्चे इसी श्रेणी में आते हैं। कुछ समुदाय राज्य या इलाके के परिप्रेक्ष्य में विशेष रूप से वंचित हैं। लिहाजा बारहवीं योजना के अंतर्गत शिक्षा पण्राली में ऐसा कोई तरीका विकसित होना चाहिए जो ऐसे बच्चों को खास तौर से चिह्नित करे और सुनिश्चित करे कि उन्हें शिक्षा का न्यायसंगत अवसर और लाभ मिले। दलितों को भारत में आबादी के लाभांश के वृहत्तर तबके के तौर पर मान्यता मिलनी चाहिए। यह उच्च शिक्षा और कौशल विकास की दृष्टि से दलित युवकों में समुचित निवेश के मार्फत मुमकिन हो सकता है। आज जहां निजी शिक्षा की भूमिका बढ़ रही है, तकनीकी और प्रोफेशनल शिक्षा के मामले में दलित युवाओं की और अधिक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। और इसके लिए ऐसी शिक्षा में आरक्षण का प्रावधान जरूरी होगा। शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट-पब्लिक-कम्युनिटि-पार्टनरशीप (पीपीसीपी) मॉडल के रूप में दलितों के प्रति निष्पक्षता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि योग्यताधारी दलित शिक्षा-प्रदाता बन सकें। दलितों की शिक्षा और उनके विकास की राह में कार्यान्वयन में कोताही बड़ी समस्या है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय में उच्चस्थ स्तर पर निगरानी की एक पद्धति शुरू की जानी चाहिए। दलित समुदाय को समुदाय स्तर से लेकर राज्य और देश तक सभी स्तरों पर तमाम निगरानी पण्राली एवं प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए। असली मसलों के प्रतिनिधित्व को लेकर बहुत सारे अवरोध हैं, लिहाजा उच्चस्थ स्तर पर निगरानी पण्राली के अंतर्गत खास तौर से अवसर और मंच सृजित किए जाने चाहिए ताकि समस्याओं और अवरोधों के बारे में र्चचा की जा सके। इन प्रयासों के बिना दलितों को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल कर पाने का सपना पूरा नहीं हो सकेगा।



Friday, January 21, 2011

नींव से शिखर तक मजबूत हो कार्य-संस्कृति


स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक जिस प्रश्न का उत्तर पाने का प्रयास नहीं किया जाता है वह है पारदर्शिता की कमी तथा कार्य संस्कृति की शिथिलता। जब तक इन्हें सुधारने का प्रयास नहीं होगा, कोई बड़ा गुणात्मक परिवर्तन लगभग असंभव है। कमजोर कार्य संस्कृति तथा मूलभूत आवश्यकताओं की अनापूर्ति शिक्षा क्षेत्र की बड़ी चुनौतियां हैं। मूल्य-आधारित व्यवस्था की स्थापना के लिए इनका समाधान सघन प्रयासों द्वारा ही हो सकता है
गुणवत्तापरक शिक्षा का प्रारंभ परिवार के बाद स्कूल में प्रथम दिवस से प्रारंभ होना चहिए। दूसरी ओर विश्वविद्यालयों में उन्हीं प्राध्यापकों की नियुक्ति होनी चाहिए जिनकी अध्यापन तथा शोध में अभिरुचि सवरेपरि हो। उच्चतम स्तर की शिक्षा प्राप्त कर आगे अपने चयनित क्षेत्र में श्रेष्ठता तथा उत्कृष्टता प्राप्त करने की ललक हो। आज पूरा विश्व भारत के युवाओं की उत्कृष्टता तथा प्रवीणता को सराहता है। अमेरिका में नासा तथा सिलिकान वैली में उन्होंने भारत के ज्ञान-विज्ञान में किसी से पीछे होने का झंडा गाड़ा है। यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष उन युवाओं का है जो अपने आपको विश्वविद्यालयों में स्थापित करना चाहते हैं मगर जोर-जोर से सारे विश्व को बता रहे हैं कि वह योग्य नहीं हैं। वे नेट परीक्षा पास नहीं कर सकते हैं। योग्यता के मापदंड घटाए जाएं और उन्हें नियुक्त किया जाए। वे इसके लिए भी तैयार नहीं हैं कि दोतीन वर्ष के भीतर नेट पास कर लेंगे। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पिछले लगभग दो दशकों से पीएचडी तथा नेट को लेकर एक अनिश्चय सा बना रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कई बार इस संबंध में परिवर्तन किए हैं। नेट की अर्हता के बाद राज्य स्तरीय परीक्षाओं को उसे स्वीकार करना पड़ा। विश्व शक्ति बनने की राह पर चल रहा देश यह कैसे स्वीकार कर सका कि कुछ राज्यों के योग्यता प्राप्त परास्नातक नेट परीक्षा को कठिन पाते हैं अत: उन्हें राज्य स्तर पर परीक्षा पास करने दी जाए। इसके बाद यूजीसी पर नेट के स्थान पर पीएचडी को स्वीकार करने के दबाव बनते रहे। अब फिर एक बार इसे स्वीकार कर लिया गया है। क्या हमने मान लिया है कि नेट परीक्षा पास करना उनके लिए कठिन या असंभव है जो पीएचडी कर लेते हैं। विश्वविद्यालय या उसके महाविद्यालयों में प्रवक्ता बनकर प्राध्यापक बनने वाले व्यक्ति की गरिमा कैसे बनेगी या बढ़ेगी जो नेट की परीक्षा पास करने से प्रारंभ में बचना चाहता है? डॉक्टरेट की उपाधि का महत्व है परंतु उसकी जो स्थिति आज है उससे कोई नावाकिफ नहीं है। होना तो यह चाहिए कि केवल उन्हें ही शोध करने की अनुमति मिले जो पहले नेट परीक्षा उत्तीर्ण कर अपनी प्रवीणता, योग्यता तथा रुचि का प्रदर्शन कर लें। गुणवत्ता के हृास की कहानी किसी एक स्तर पर विद्यमान नहीं है। जिस देश में केवल 12-15 प्रतिशत बच्चों को साधन संपन्न स्कूलों में शिक्षा मिलती हो तथा बाकी खस्ताहाल सरकारी स्कूलों के भरोसे हों, वहां वह विश्वविद्यालय स्तर इसके प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता है। प्रतिवर्ष विशेषकर बड़े शहरों में नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश के लिए पब्लिक स्कूलों के दरवाजों पर जो भीड़ जुड़ती है, वह लगातार बढ़ती जा रही है। ये स्कूल तथा राज्य सरकार मिलकर कई खेल खेलते हैं। दिल्ली के नर्सरी स्कूलों में प्रवेश की र्चचा सारे देश में फैलती है। सरकार नीतियों में बातें तो आम आदमी तथा आर्थिक रूप से वंचित तथा पिछड़े वर्ग की करती है मगर इस बात का भी ध्यान रखती है कि विशिष्ट वर्ग की प्राथमिकता बनी रहे। 1950-60 के वर्षो में क्या यह कल्पना भी की जा सकती थी कि किसी स्कूल में प्रवेश के लिए उन्हीं बच्चों को लिया जाएगा जिनके माता-पिता ऊंची से शिक्षा प्राप्त कर चुके हों, आर्थिक रूप से संपन्न हों तथा स्कूल द्वारा लिए गए इंटरव्यू, जो अब सामान्य परिचय भेंट इत्यादि के नाम से जाना जाता है, में उत्तीर्ण हों? वही बच्चे प्रवेश पाएंगे जिनके माताप्िाता स्कूल प्रबंधन को यह आश्वासन दे सकें कि हम आपकी हर फीस देने को तैयार हैं तथा जो बढ़ोत्तरी होगी, उसे भी पूरा करेंगे। 2010 में शिक्षा के मौलिक अधिकार विधेयक को लागू किया गया। इसके अंतर्गत 25 प्रतिशत स्थानों पर पब्लिक सहित हर स्कूल में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य किया गया। पब्लिक स्कूलों में इनकी फीस सरकार स्वयं देने को तैयार है मगर स्कूल प्रबंधन इसे मानने को तैयार नहीं है। फीस की भरपाई से इन स्कूलों की अघोषित फीस का क्या होगा। सरकार तथा प्रबंधन के बीच इस प्रकार के प्रश्नों के समाधान सदा ही इस ढंग से निकाले जाते हैं कि प्रबंधन अपने ढंग सेस्कूल के उद्देश्य के अनुसार प्रवेश देता रहे और सरकार सामान्य व्यक्ति को अपने द्वारा निर्धारित नीतियों के परिपत्र दिखाती रहे। पब्लिक स्कूलों में प्रवेश के लिए जो दौड़-धूप प्रतिवर्ष होती हैउसमें उनका अनुग्रह पाने की कतार में राजनेता, अधिकारी, उद्योगपति, व्यापारी, मंत्री, सांसद कौन नहीं होता है? जो भी आर्थिक रूप से इन स्कूलों की मांगें पूरी कर सकता है, इन्हीं में अपने बच्चों को भेजता है और उसके लिए हर प्रकार का प्रयत्न करता है। यह स्कूल बच्चों को भी इंटरव्यू जैसे चक्र से नहीं बख्शते हैं। यद्यपि हाई कोर्ट ने उस पर रोक लगायी है। पब्लिक स्कूलों में नर्सरी प्रवेश प्रक्रिया प्रतिवर्ष लगभग सारे स्कूल शिक्षा क्षेत्र को आच्छादित कर देती है कि व्यवस्था तंत्र तथा मीडिया उन 85-90 प्रतिशत बच्चों की समस्याओं को लगभग नगण्य मान लेता है जो सरकारी या सामान्य स्कूलों में पढ़ते हैं। उनके स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय, अध्यापक, पुस्तकें, मध्याह्न भोजन जैसे पक्ष औसत से कमजोर ही पाए जाते हैं। दिल्ली में जब कॉमनवेल्थ खेलों में हजारों करोड़ के खेल अलग से खेले जा रहे थे, हर तरफनिर्माणहो रहा था तब उसी दिल्ली में साठ सरकारी स्कूल तंबुओं में चल रहे थे। वे आज भी उसी हालात में हैं। नर्सरी प्रवेश की प्रक्रिया पर केंद्रित व्यवस्था जिस प्रकार सामान्य स्कूलों की नजर अंदाज करती है वही आगे चलकर महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में स्तरिभन्नता को बढ़ाती है। पिछले 20 महीनों में शिक्षा के क्षेत्रा में बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुई। कक्षा दस की बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक घोषित हुई। केवल सीबीएसई ही क्रियान्वयन करना प्रारंभ कर रहा है। 44 डीम्ड विश्वविद्यालयों की मान्यता समाप्त घोषित की गई तथा उतने ही अन्य को नोटिस दिया गया कि मान्यता समाप्त क्यों कर दी जाए। सभी आराम से अपना कार्य कर रहे हैं। विद्यार्थी अवश्य असमंजस में हैं, अनिश्चितता में हैं। उच्च स्तर पर नियामक संस्थाएं अपनी असफलता झेल रही हैं मगर उनकी कार्य पण्राली में परिवर्तन केवल कागजों पर आया है। बड़ी तेजी से कहा गया था कि यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई इत्यादि को मिलाकर एक समग्र अधिकार संपन्न नियामक तथा शोध संस्थान बनेगा। पर अभी प्रतीक्षा कीजिए अगली सूचना की। स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक जिस प्रश्न का उत्तर पाने का प्रयास नहीं किया जाता है वह है पारदर्शिता की कमी तथा कार्य संस्कृति की शिथिलता। जब तक इन्हें सुधारने का प्रयास नहीं होगा, कोई बड़ा गुणात्मक परिवर्तन लगभग असंभव है। दिल्ली विश्वविद्यालय में दो-ढाई महीने हड़ताल रहती है दूर-दराज के स्कूलों में अध्यापक महीनों नहीं जाते हैं। कमजोर कार्य संस्कृति तथा मूलभूत आवश्यकताओं की अनापूर्ति शिक्षा क्षेत्र की बड़ी चुनौतियां हैं। मूल्य-आधारित व्यवस्था की स्थापना के लिए इनका समाधान सघन प्रयासों द्वारा ही हो सकता है। शिक्षा का वर्णपट केवल साक्षरता नहीं बढ़ाता है वह भविष्य बनाता है देश का और उसकी प्रगति तथा विकास का स्तर निर्धारित करता है। वही देश की साख बनाता है।