कार्तिकेय दिल्ली के एक नामी-गिरामी स्कूल में ग्यारहवीं में पढ़ते हैं। मैंने 15 जून, 2011 को उनके चेहरे पर तनाव तथा निराशा के भाव देखे। पूछने पर पता चला कि जबसे उन्होंने दिल्ली के एक कॉलेज में प्रवेश के लिए कट-ऑफ लिस्ट देखी है तभी से चिंतित हैं। दिल्ली के श्रीराम कॉलेज आफ कॉमर्स (एसआरसी) ने विज्ञान के विद्यार्थियों के प्रवेश की अर्हता कक्षा 12 में चार विषयों में शत-प्रतिशत अंकों की रखी है। इस संवेदनहीन घोषणा ने सारे देश में विद्यार्थियों तथा उनके माता-पिता के होश उड़ा दिए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने अवश्य इस प्रकार के निर्णय की अव्यावहारिकता तथा अस्वीकार्यता को पहचाना और उससे अपनी असहमति व्यक्त की। ग्रेडिंग लागू कर बच्चों को तनाव से मुक्त करने का जो प्रयास किया जा रहा है एसआरसी के इस निर्णय ने उस पर पानी फेर दिया है। मेरा विश्वास है कि इस प्रकार के निर्णय संस्था के सभी अध्यापकों को एक साथ मिल बैठकर करने चाहिए। उसके सभी संभावित पक्षों पर खुली चर्चा होनी चाहिए। कुछ कॉलेज अपनी श्रेष्ठता के लिए जाने जाते हैं। कुछ शायद अपने को इसीलिए श्रेष्ठ मान लेते हैं क्योंकि वहां प्रवेश पाने वालों का प्रतिशत प्रति वर्ष ऊंचा उठता जाता है। आजकल मीडिया, विशेषकर कुछ पाक्षिक तथा साप्ताहिक प्रकाशन कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों की श्रेष्ठता सूचियां बनाने लगे हैं। युवाओं पर इनका प्रभाव पड़ता है। यह अलग तथ्य है कि इन श्रेष्ठता सूचियों के पीछे कुछ और कारण भी होते हैं। जो विद्यार्थी स्नातक स्तर पर कॉमर्स पढ़ना चाहते हैं परंतु बारहवीं तक अन्य विषय पढ़कर आए हैं वे इस शत-प्रतिशत अर्हता के शिकार हुए हैं। इन दोनों वगरें के विद्यार्थी जब साथ-साथ पढ़ते हैं तब उनकी शैक्षिक उपलब्धियों में क्या कोई अंतर आता है? कोई भी श्रेष्ठ संस्थान अपने शोध तथा अध्ययन से इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर खोज सकता है और तदनुसार अगले वर्षो में प्रवेश के नियामक तय कर सकता है। यह भी ध्यान रखना होगा कि प्रवेश प्रणाली ऐसी न बन जाए कि विज्ञान के विद्यार्थी प्रवेश पा ही न सकें? दिल्ली में जब इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं तब सीबीएसई को आधारबिंदु मान लिया जाता है। अकसर भुला दिया जाता है कि देश में चालीस से अधिक स्कूल बोर्ड हैं। सबके अंक निर्धारण अलग-अलग स्तर पर होते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के लगभग सीधे नियंत्रण में कार्यरत सीबीएसई लगातार अधिक से अधिक अंक प्रदान करने के लिए कुछ वषरें से विशेष रूप से प्रयत्नशील रहा है। आज से 15-20 वर्ष पहले अस्सी प्रतिशत अंक पाने वाला विद्यार्थी श्रेष्ठता की सर्वोच्च श्रेणी में माना जाता था। आज यह सम्मान 95-96 प्रतिशत पाने पर भी नहीं मिलता है। संभव है कि दिल्ली के एक कॉलेज ने अनजाने ही ऐसे अनेक पक्षों पर गहन चर्चा तथा गंभीर निर्णय लेने की आवश्यकता को उजागर कर दिया हो। सबसे पहले यह प्रश्न उठता है कि क्या केवल अधिक अंक ही प्रतिभा की श्रेष्ठता के द्योतक हैं या कुछ और पहलु भी व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक हैं? क्या निर्णय लेने की क्षमता, सर्जनात्मकता, कलाओं में अभिरुचि, खेलों में भागीदारी जैसे अन्य पक्ष शिक्षा के आवश्यक अंग नहीं हैं? अंकों का आधार प्रवेश प्रक्रिया को सरल बना देता है मगर उच्च शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करता। हर श्रेष्ठ कॉलेज का कर्तव्य है कि वह 4-5 अन्य कॉलेजों से कार्यकारी संबंध स्थापित करे, उनकी श्रेष्ठता में वृद्धि करने का बीड़ा उठाए तथा गुणवत्ता को बढ़ावा दे। यदि दो देशों के बीच की दो संस्थाओं में इंस्टीट्यूशनल नेटवर्किंग हो सकती है तो दिल्ली विश्वविद्यालय के 4-5 कॉलेजों के बीच क्यों नहीं हो सकती? विश्वविद्यालय को विभिन्न विकल्पों पर विचार करना होगा ताकि एक ही कॉलेज पर अनावश्यक दबाव न पड़े तथा केवल अंक ही मानक बनकर न रह जाएं। यदि अंकों पर जोर बढ़ता गया तो हमें न तो नए तेंदुलकर मिलेंगे और न धौनी। अंकों के आधार पर तो महात्मा गांधी और आइंस्टीन कभी आगे की शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। साइना नेहवाल तथा सानिया मिर्जा जैसी प्रतिभा वाली कितनी ही बालिकाओं की प्रतिभा कोचिंग तथा ट्यूशन केंद्रों पर मिट्टी में मिल जाती। आज देश के पास अपना छह दशकों का शैक्षिक अनुभव है। राष्ट्रीय स्तर पर अनेक संस्थाएं शोध तथा अध्ययन के कार्य कर रही हैं। केंद्र सरकार अपने विशेषज्ञों को ट्रेनिंग के लिए अमेरिका तथा यूरोप भेजती रहती हैं। कक्षा दस में लागू की गई ग्रेडिंग प्रणाली से बच्चों को कुछ तनाव मुक्ति तथा राहत मिली है। यदि कक्षा बारह तथा प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं में नवाचार नहीं किए गए तो तनाव से बचाने के सारे प्रयास व्यर्थ हो जाएंगे। विश्वविद्यालयों तथा स्कूल बोर्ड के बीच लगातार जीवंत संवाद बनाए रखने की कोई कारगर व्यवस्था बनानी होगी, तभी इस प्रकार की समस्याओं का समाधान संभव होगा। इसके साथ-साथ सरकार को भी नए कॉलेज खोलने होंगे। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)
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Wednesday, June 29, 2011
Wednesday, June 15, 2011
रोजगारपरक शिक्षा की दरकार
केंद्र सरकार द्वारा आठवीं तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का दायरा बढ़ाकर हाईस्कूल तक किया जाना एक अनावश्यक और गैर जरूरी कदम है। जब देश में पहले से ही राइट टू एजूकेशन कानून लागू है तो इस नए पहल की आवश्यकता ही क्या थी? शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार तो बना दिया गया, लेकिन बच्चों को किस तरह गुणवत्ता और उपयोगी मिले ताकि वे निजी स्कूलों से पढ़कर निकलने वाले बच्चों के बराबर न सही, लेकिन कुछ तो समान हो सकें। इसके लिए जिस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकार के सहयोग की जरूरत थी वैसी फिलहाल तो नहीं ही मिल पा रही है। यही कारण है कि इस योजना के लागू हुए काफी समय बीत जाने के बावजूद परिणाम कोई संतोषजनक नहीं है। बेहतर हो कि हम इस कानून को सफल बनाने के लिए कर्मठता और ईमानदारी से कुछ प्रयास करें ताकि देश में गरीब और गांवों में रहने वाले बच्चों को आगे बढ़ने का मौका मिल सके। यदि आंकड़ों के तौर पर गिनाने के लिए ही सरकार प्रयास करना चाहती है तो इससे न तो शिक्षा का विकास होगा और न ही इसका विस्तार। यही तमाम कारण हैं कि सरकारी स्कूलों के प्रति थोड़े बहुत भी शिक्षित और समर्थ लोगों का रुझान घट रहा है। कपिल सिब्बल द्वारा मुफ्त शिक्षा का दायरा बढ़ाने की जो नीति बनाई गई है उसका अमलीकरण वर्ष 2013 से पहले शुरू नहीं हो सकता है। हमारे देश में अगला लोकसभा चुनाव वर्ष 2014 में होने हैं। इस तरह साफ है कि योजना का उद्देश्य गरीब बच्चों को शिक्षा देने की बजाय चुनावों में लाभ हासिल करने की तैयारी है। कुल मिलाकर यह एक चुनावी अभियान का हिस्सा है, जिसके भरोसे शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने और सभी को इसके लाभ से फलीभूत कराने की बात एक शिगूफा से ज्यादा कुछ नहीं है। आज हमारे देश में 10-12 लाख शिक्षकों की कमी है। इसके लिए शिक्षकों के पदस्थापन की प्रक्रिया शुरू करने की बजाय नित नई योजनाओं को शुरू करने मात्र से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। आज निजी स्कूलों की संख्या देश में तेजी से बढ़ रही है, जहां बच्चों से फीस के तौर पर मोटा पैसा उगाहा जाता है। आज यह एक बिजनेस का रूप ले लिया है, लेकिन हमारी सरकार इन स्कूलों को टैक्स से मुक्त रखी है। यह गलत है। सरकार अभी भी मानती है कि यह स्कूल गैर लाभकारी और सामाजिक संस्थाएं हैं जिस कारण इनसे टैक्स की वसूली नहीं की जानी चाहिए। यदि दिल्ली सरकार की ही बात करें तो यहां पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत स्कूलों में 25 प्रतिशत बच्चों को प्रवेश देने की नीति है, लेकिन इसका व्यावहारिक क्रियान्वयन शायद ही किसी स्कूल में हो पाता है। इसके लिए इन स्कूलों के पास बहानों की भी कोई कमी नहीं होती। कई स्कूल तो ऐसे बच्चों के लिए अलग कक्षाएं संचालित करवाते हैं जिसमें न तो अच्छे शिक्षक होते हैं और न ही शिक्षा का कोई स्तर होता है। साफ है कि यह सब खानापूर्ति के लिए ही किया जाता है। यदि सरकार चाहे और दृढ़ता दिखाए तो इस स्थिति में बदलाव आ सकता है और ऐसे बच्चों के लिए अलग से कक्षाएं चलाए जाने की बजाय सामान्य कक्षाओं में बैठने की व्यवस्था कराई जा सकती है। शिक्षा के मामले में देश में जिस तरह की स्थिति है उसे देखते हुए हम यह नहीं कह सकते कि सरकार इसके प्रति तनिक भी प्रतिबद्ध है। शिक्षा का व्यवसायीकरण और माफियाकरण हो गया है। इसके लिए बाकायदा लॉबिइंग की जाती है और अधिक से अधिक लाभ पाने और कमाने के लिए हरसंभव उपाय अपनाए जाते हैं। बेहतर तो यह होगा कि नई योजनाओं को लागू करने से पहले पुरानी योजनाओं के क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाए और उन्हें ही बेहतर व सशक्त बनाया जाए। शिक्षा में आज अधिक पारदर्शिता की जरूरत है। इसके लिए न केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है बल्कि इसे अधिक पेशेवर ढंग से और जवाबदेही से चलाने के लिए ईमानदारी की भी आवश्यकता है। ऐसा लगता है कि हर कोई अपनी जिम्मेवारी की खानापूर्ति करने की जल्दी में है। शिक्षा के प्रति हमारी प्राथमिकता में आज बदलाव की आवश्यकता है। आज हमें रोजगारपरक, गुणवत्तापूर्ण और बेहतर शिक्षा की जरूरत है। इसके लिए दूरदर्शी नीतियों के निर्माण व क्रियान्वयन की आवश्यकता है। सिर्फ नई नीतियों अथवा योजनाओं को बना देने भर से कुछ खास नहीं हासिल होने वाला है। (लेखक एनसीआरटी के पूर्व निदेशक हैं)
Friday, February 25, 2011
शिक्षा को बड़ी उम्मीद है बजट से
बजट के पहले आशाओं तथा आशंकाओं पर र्चचा स्वाभाविक ही नहीं, कई मायनों में आवश्यक भी है। शिक्षा के क्षेत्र में तो समाज के हर वर्ग की रुचि होती है और इसमें अपेक्षाएं भी सदा बढ़ती रहती हैं। बजट से घोषित नीतियों तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में गतिशीलता तथा गुणवत्तापरक सुधार की आशा की जाती है। शिक्षा के मामले में सबसे पहले सबसे महत्वपूर्ण परियोजना लेंिशक्षा के मूल अधिकार विधेयक का एक अप्रैल 2010 से लागू होना। इसके लिए सबसे बड़ी परियोजना है सर्वशिक्षा अभियान यानी एसएसए। इसके अन्तर्गत प्रारंभिक शिक्षा के लिए पिछले चार वर्षो में 54371 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके सामने अनेक समस्याएं हैं। अध्यापकों की भारी कमी है, स्वीकृत पदों में 20 प्रतिशत से अधिक भरे नहीं गये हैं। स्वीकृत 10.8 लाख और भरे गये 8.8 लाख। यदि नये अधिनियम के अनुसार हर बच्चे को स्कूल लाना तथा वहां रखना है तो इससे कहीं अधिक अध्यापकों की जरूरत है। शिक्षा के जिला सूचना संकलन द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 29 प्रतिशत स्कूलों के पास 2009-10 में पक्के भवन नहीं थे। अत: बजट से सबसे महत्वपूर्ण अपेक्षा यही है सभी राज्यों को इतने संसाधन उपलब्ध कराये जाएं कि सभी बच्चों को सही मायने में शिक्षा का मूल अधिकार कौशल प्रशिक्षण के साथ मिल सके। स्कूल पूर्व की शिक्षा व्यवस्था सरकारी स्कूलों में उपलब्ध कराने की व्यवस्था जरूरी है। इसके प्रावधान न होने के कारण सरकारी स्कूल के बच्चे कक्षा एक में आने के पहले ही ‘पब्लिक स्कूलों’ के बच्चों से काफी पीछे रह जाते हैं। इस असमानता को दूर करने के लिए आवश्यक संसाधनों का आवंटन राष्ट्र के कर्त्तव्य के रूप में लिया जाना चाहिए। पिछले वर्ष स्कूल ही नहीं विश्वविद्यालयों तथा अन्य उच्च संस्थाओं में गुणवत्ता की कमी पर र्चचा होती रही। अध्यापकों के प्रशिक्षण तथा पुनर्परीक्षण के लिए वर्तमान व्यवस्थाएं नाकाफी हैं। वर्तमान व्यवस्थाएं अपर्याप्त हैं, इसका सटीक प्रमाण है पिछले चार वर्षो में प्रशिक्षण के लिए आवंटित 4000 करोड़ रुपये की धनराशि में केवल 1444 करोड़ यानी 36 प्रतिशत ही खर्च किया जाना। जिस प्रकार जीने के अधिकार में शिक्षा का अधिकार सन्निहित माना गया, उसी तरह शिक्षा पाने के अधिकार में साधन सम्पन्न स्कूल में प्रशिक्षित योग्य शिक्षकों से शिक्षा पाना भी शामिल है। अध्यापकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था के पुनरावलोकन तथा राज्यों में नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावशाली बनाने के लिए भी संसाधनों का आवंटन आवश्यक है। गांवों में ही नहीं, दिल्ली जैसे शहर तक में सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी पाई जाती है। इसे दूर करने के उपाय तथा समानुपातिक संसाधन भविष्य में आशाजनक परिणाम देंगे। नये स्कूल खुलने जरूरी हैं मगर जो चल रहे हैं उनके सुधार व सही स्वरूप में चलते रहने की व्यवस्था जरूरी है। प्राथमिक शालाओं में सरकारी स्कूलों में समाज के वंचित, दलित तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग से ही अधिकांश बच्चे आते हैं। इन्हें बराबरी के आधार पर खड़ा करने के लिए संसाधन कम नहीं पड़ने चाहिए। शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत आवंटन का वादा हर सरकार करती है मगर उसे क्रियान्वित कोई नहीं करता है। राज्य तथा केन्द्र सरकार का शिक्षा पर मिलाजुला खर्च/आवंटन 2000-01 में 82879.2 करोड़ था जो जीडीपी का 3.94 प्रतिशत तथा कुल खर्च का 12.3 प्रतिशत था। 2008-09 में यह 198324.7 करोड़ था जो जीडीपी का 3.40 प्रतिशत तथा कुछ खर्च का 11.6 प्रतिशत था। शिक्षा के मूल अधिकार के क्रियान्वयन के लिए ताकि हर 6-14 वर्ष का बालक- बालिका स्कूल जा सके, एक अनुमान के अनुसार 1.82 लाख करोड़ रुपयों की आवश्यकता होगी। क्या नया बजट इसे ध्यान में रखेगा और जीडीपी के छ: प्रतिशत का लंबित वादा पूरा करने का साहस करेगा? यदि ऐसा नहीं होगा तो भारत के 70-80 प्रतिशत बच्चों को गुणवत्तापरक प्रारंभिक शिक्षा नहीं मिल पायेगी और जब शिक्षा की नींव कमजोर होगी तो समाज में अनेक विषमताएं उभरेंगी। प्रश्न है कि केन्द्रीय विद्यालयों/नवोदय विद्यालयों के संसाधन मानक देश के सभी सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं लागू होने चाहिए। कभी न कभी यह समकक्षता लानी ही होगी। उच्च शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में अनेक दबाव बढ़ रहे हैं। इस स्तर पर युवाओं के लिए सीमित अवसर है अत: विदेश जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो अनेक प्रकार की समस्याओं तथा शोषण का आधार बनती है। नये संस्थान सरकार को स्वयं भी खोलने होंगे। इस स्तर पर कौशलों के उच्चस्तरीय प्रशिक्षण नये विभाग तथा गतिशील व्यवस्था पर खर्च करना आवश्यक है। शोध का स्तर चिन्ताजनक है, इस पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है। उच्च शिक्षा में नामांकन अगले वर्ष में 14-15 प्रतिशत बढ़ाना ही चाहिए तथा अगली योजना में उसे 25 प्रतिशत तक ले जाने की आधारभूत व्यवस्था प्रारंभ हो जानी चाहिये। शिक्षा व्यवस्था में निर्मलता, कर्त्तव्यनिष्ठा, मूल्यबद्धता जैसे कारक हर तरफ हर व्यक्ति में दिखने चाहिए। मूल्यों की शिक्षा, नैतिकता के अध्ययन केन्द्र तथा आध्यात्मिक विश्वविद्यालय खोलने जैसे नवाचारों के लिये वित्तमंत्री आवश्यक आवंटन कर सकें तो यह सराहनीय कदम होगा।
Friday, January 21, 2011
नींव से शिखर तक मजबूत हो कार्य-संस्कृति
स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक जिस प्रश्न का उत्तर पाने का प्रयास नहीं किया जाता है वह है पारदर्शिता की कमी तथा कार्य संस्कृति की शिथिलता। जब तक इन्हें सुधारने का प्रयास नहीं होगा, कोई बड़ा गुणात्मक परिवर्तन लगभग असंभव है। कमजोर कार्य संस्कृति तथा मूलभूत आवश्यकताओं की अनापूर्ति शिक्षा क्षेत्र की बड़ी चुनौतियां हैं। मूल्य-आधारित व्यवस्था की स्थापना के लिए इनका समाधान सघन प्रयासों द्वारा ही हो सकता है
गुणवत्तापरक शिक्षा का प्रारंभ परिवार के बाद स्कूल में प्रथम दिवस से प्रारंभ होना चहिए। दूसरी ओर विश्वविद्यालयों में उन्हीं प्राध्यापकों की नियुक्ति होनी चाहिए जिनकी अध्यापन तथा शोध में अभिरुचि सवरेपरि हो। उच्चतम स्तर की शिक्षा प्राप्त कर आगे अपने चयनित क्षेत्र में श्रेष्ठता तथा उत्कृष्टता प्राप्त करने की ललक हो। आज पूरा विश्व भारत के युवाओं की उत्कृष्टता तथा प्रवीणता को सराहता है। अमेरिका में नासा तथा सिलिकान वैली में उन्होंने भारत के ज्ञान-विज्ञान में किसी से पीछे न होने का झंडा गाड़ा है। यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष उन युवाओं का है जो अपने आपको विश्वविद्यालयों में स्थापित करना चाहते हैं मगर जोर-जोर से सारे विश्व को बता रहे हैं कि वह योग्य नहीं हैं। वे नेट परीक्षा पास नहीं कर सकते हैं। योग्यता के मापदंड घटाए जाएं और उन्हें नियुक्त किया जाए। वे इसके लिए भी तैयार नहीं हैं कि दोतीन वर्ष के भीतर नेट पास कर लेंगे। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पिछले लगभग दो दशकों से पीएचडी तथा नेट को लेकर एक अनिश्चय सा बना रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कई बार इस संबंध में परिवर्तन किए हैं। नेट की अर्हता के बाद राज्य स्तरीय परीक्षाओं को उसे स्वीकार करना पड़ा। विश्व शक्ति बनने की राह पर चल रहा देश यह कैसे स्वीकार कर सका कि कुछ राज्यों के योग्यता प्राप्त परास्नातक नेट परीक्षा को कठिन पाते हैं अत: उन्हें राज्य स्तर पर परीक्षा पास करने दी जाए। इसके बाद यूजीसी पर नेट के स्थान पर पीएचडी को स्वीकार करने के दबाव बनते रहे। अब फिर एक बार इसे स्वीकार कर लिया गया है। क्या हमने मान लिया है कि नेट परीक्षा पास करना उनके लिए कठिन या असंभव है जो पीएचडी कर लेते हैं। विश्वविद्यालय या उसके महाविद्यालयों में प्रवक्ता बनकर प्राध्यापक बनने वाले व्यक्ति की गरिमा कैसे बनेगी या बढ़ेगी जो नेट की परीक्षा पास करने से प्रारंभ में बचना चाहता है? डॉक्टरेट की उपाधि का महत्व है परंतु उसकी जो स्थिति आज है उससे कोई नावाकिफ नहीं है। होना तो यह चाहिए कि केवल उन्हें ही शोध करने की अनुमति मिले जो पहले नेट परीक्षा उत्तीर्ण कर अपनी प्रवीणता, योग्यता तथा रुचि का प्रदर्शन कर लें। गुणवत्ता के हृास की कहानी किसी एक स्तर पर विद्यमान नहीं है। जिस देश में केवल 12-15 प्रतिशत बच्चों को साधन संपन्न स्कूलों में शिक्षा मिलती हो तथा बाकी खस्ताहाल सरकारी स्कूलों के भरोसे हों, वहां वह विश्वविद्यालय स्तर इसके प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता है। प्रतिवर्ष विशेषकर बड़े शहरों में नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश के लिए पब्लिक स्कूलों के दरवाजों पर जो भीड़ जुड़ती है, वह लगातार बढ़ती जा रही है। ये स्कूल तथा राज्य सरकार मिलकर कई खेल खेलते हैं। दिल्ली के नर्सरी स्कूलों में प्रवेश की र्चचा सारे देश में फैलती है। सरकार नीतियों में बातें तो आम आदमी तथा आर्थिक रूप से वंचित तथा पिछड़े वर्ग की करती है मगर इस बात का भी ध्यान रखती है कि विशिष्ट वर्ग की प्राथमिकता बनी रहे। 1950-60 के वर्षो में क्या यह कल्पना भी की जा सकती थी कि किसी स्कूल में प्रवेश के लिए उन्हीं बच्चों को लिया जाएगा जिनके माता-पिता ऊंची से शिक्षा प्राप्त कर चुके हों, आर्थिक रूप से संपन्न हों तथा स्कूल द्वारा लिए गए इंटरव्यू, जो अब सामान्य परिचय भेंट इत्यादि के नाम से जाना जाता है, में उत्तीर्ण हों? वही बच्चे प्रवेश पाएंगे जिनके माताप्िाता स्कूल प्रबंधन को यह आश्वासन दे सकें कि हम आपकी हर फीस देने को तैयार हैं तथा जो बढ़ोत्तरी होगी, उसे भी पूरा करेंगे। 2010 में शिक्षा के मौलिक अधिकार विधेयक को लागू किया गया। इसके अंतर्गत 25 प्रतिशत स्थानों पर पब्लिक सहित हर स्कूल में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य किया गया। पब्लिक स्कूलों में इनकी फीस सरकार स्वयं देने को तैयार है मगर स्कूल प्रबंधन इसे मानने को तैयार नहीं है। फीस की भरपाई से इन स्कूलों की अघोषित फीस का क्या होगा। सरकार तथा प्रबंधन के बीच इस प्रकार के प्रश्नों के समाधान सदा ही इस ढंग से निकाले जाते हैं कि प्रबंधन अपने ढंग से ‘स्कूल के उद्देश्य के अनुसार प्रवेश देता रहे और सरकार सामान्य व्यक्ति को अपने द्वारा निर्धारित नीतियों के परिपत्र दिखाती रहे। पब्लिक स्कूलों में प्रवेश के लिए जो दौड़-धूप प्रतिवर्ष होती हैउसमें उनका अनुग्रह पाने की कतार में राजनेता, अधिकारी, उद्योगपति, व्यापारी, मंत्री, सांसद कौन नहीं होता है? जो भी आर्थिक रूप से इन स्कूलों की मांगें पूरी कर सकता है, इन्हीं में अपने बच्चों को भेजता है और उसके लिए हर प्रकार का प्रयत्न करता है। यह स्कूल बच्चों को भी इंटरव्यू जैसे चक्र से नहीं बख्शते हैं। यद्यपि हाई कोर्ट ने उस पर रोक लगायी है। पब्लिक स्कूलों में नर्सरी प्रवेश प्रक्रिया प्रतिवर्ष लगभग सारे स्कूल शिक्षा क्षेत्र को आच्छादित कर देती है कि व्यवस्था तंत्र तथा मीडिया उन 85-90 प्रतिशत बच्चों की समस्याओं को लगभग नगण्य मान लेता है जो सरकारी या सामान्य स्कूलों में पढ़ते हैं। उनके स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय, अध्यापक, पुस्तकें, मध्याह्न भोजन जैसे पक्ष औसत से कमजोर ही पाए जाते हैं। दिल्ली में जब कॉमनवेल्थ खेलों में हजारों करोड़ के खेल अलग से खेले जा रहे थे, हर तरफ ‘निर्माण’ हो रहा था तब उसी दिल्ली में साठ सरकारी स्कूल तंबुओं में चल रहे थे। वे आज भी उसी हालात में हैं। नर्सरी प्रवेश की प्रक्रिया पर केंद्रित व्यवस्था जिस प्रकार सामान्य स्कूलों की नजर अंदाज करती है वही आगे चलकर महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में स्तरिभन्नता को बढ़ाती है। पिछले 20 महीनों में शिक्षा के क्षेत्रा में बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुई। कक्षा दस की बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक घोषित हुई। केवल सीबीएसई ही क्रियान्वयन करना प्रारंभ कर रहा है। 44 डीम्ड विश्वविद्यालयों की मान्यता समाप्त घोषित की गई तथा उतने ही अन्य को नोटिस दिया गया कि मान्यता समाप्त क्यों न कर दी जाए। सभी आराम से अपना कार्य कर रहे हैं। विद्यार्थी अवश्य असमंजस में हैं, अनिश्चितता में हैं। उच्च स्तर पर नियामक संस्थाएं अपनी असफलता झेल रही हैं मगर उनकी कार्य पण्राली में परिवर्तन केवल कागजों पर आया है। बड़ी तेजी से कहा गया था कि यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई इत्यादि को मिलाकर एक समग्र अधिकार संपन्न नियामक तथा शोध संस्थान बनेगा। पर अभी प्रतीक्षा कीजिए अगली सूचना की। स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक जिस प्रश्न का उत्तर पाने का प्रयास नहीं किया जाता है वह है पारदर्शिता की कमी तथा कार्य संस्कृति की शिथिलता। जब तक इन्हें सुधारने का प्रयास नहीं होगा, कोई बड़ा गुणात्मक परिवर्तन लगभग असंभव है। दिल्ली विश्वविद्यालय में दो-ढाई महीने हड़ताल रहती है दूर-दराज के स्कूलों में अध्यापक महीनों नहीं जाते हैं। कमजोर कार्य संस्कृति तथा मूलभूत आवश्यकताओं की अनापूर्ति शिक्षा क्षेत्र की बड़ी चुनौतियां हैं। मूल्य-आधारित व्यवस्था की स्थापना के लिए इनका समाधान सघन प्रयासों द्वारा ही हो सकता है। शिक्षा का वर्णपट केवल साक्षरता नहीं बढ़ाता है वह भविष्य बनाता है देश का और उसकी प्रगति तथा विकास का स्तर निर्धारित करता है। वही देश की साख बनाता है।
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