Monday, September 24, 2012

प्री प्राइमरी शिक्षा की राह में धन का रोड़ा




ठ्ठराजकेश्वर सिंह, नई दिल्ली तमाम कोशिशों के बाद स्कूली पढ़ाई तो काफी हद तक पटरी पर आ गई है, लेकिन गुणवत्ता का सवाल अब भी सब पर भारी है। ऐसे में सरकार शुरुआती पढ़ाई से ही अच्छी बुनियाद के मद्देनजर प्री प्राइमरी शिक्षा का भी इंतजाम अपने हाथों में रखने की कवायद कर रही है। मसौदा भी तैयार है, लेकिन संकेत हैं कि इसमें धन की कमी आड़े आ सकती है। सरकार ने अगले पांच साल के लिए शिक्षा की जो कार्ययोजना तैयार की है, प्री प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई भी उसका हिस्सा है। लेकिन, धन का फैसला अभी तक नहीं हो पाया है। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय के स्कूली शिक्षा विभाग का आकलन है कि इस पर अमल हुआ तो अगले पांच साल में 65 हजार करोड़ रुपये का खर्च आएगा। योजना आयोग और वित्त मंत्रालय ने अभी इस पर रजामंदी नहीं दी है। सूत्रों का कहना है कि अगली पंचवर्षीय योजना के लिए उच्च और स्कूली शिक्षा के प्रस्तावित खर्च में जिस तरह कमी की गई है, उससे प्री प्राइमरी के लिए पर्याप्त धन मिलने के संकेत फिलहाल नहीं हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस अहम बिंदु को संबंधित पक्षकारों के सामने उठा चुका है, लेकिन अभी तक सकारात्मक संकेत नहीं मिले हैं। उल्लेखनीय है कि अभी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय समेकित बाल विकास योजना (आइसीडीएस) के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिये छह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्री प्राइमरी शिक्षा की योजना चला रहा है, लेकिन वह कारगर नहीं साबित हो रही है। सरकार ने 11वीं योजना (2007-2012) में भी प्री प्राइमरी शिक्षा को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बजाय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत संचालित करने का प्रयास किया था। लेकिन, तब बाल विकास मंत्रालय उसे छोड़ने और मानव संसाधन विकास मंत्रालय अपनाने को राजी नहीं था। इस बार फिर यह प्रयास हो रहा है, लेकिन उसके लिए पर्याप्त बजट का सवाल अब भी बना हुआ है। बिना बजट तमाम लक्ष्य लटक सकते हैं।
दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण, पेज 3 , 25-09-2012 f’k{kk

Saturday, September 22, 2012

गरीब बच्चों को देनी ही होंगी एक चौथाई सीटें




नई दिल्ली, प्रेट्र : निजी स्कूलों को अपने यहां एक चौथाई सीटें गरीब बच्चों को आवंटित करनी होंगी। सुप्रीम कोर्ट ने निजी स्कूलों की उस याचिका को स्वीकारने से इन्कार कर दिया है, जिसमें इस बाबत शीर्ष अदालत के फैसले की समीक्षा करने की गुहार लगाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम की संवैधानिक वैधता बरकरार रखते हुए निजी स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए 25 फीसद कोटा निर्धारित किया था। मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या, जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की पीठ ने इस संबंध में दाखिल पुनर्विचार याचिकाएं बुधवार को खारिज कर दीं। पीठ ने कहा, कोर्ट गत 12 अप्रैल के अपने उस आदेश को बरकरार रखता है, जिसमें सभी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों से अपनी सीटों का 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करने को कहा गया था। इनमें सरकारी सहायता पाने वाले अल्पसंख्यक संस्थान भी शामिल हैं। जस्टिस राधाकृष्णन ने हालांकि अलग फैसले में कहा, बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा से जुड़े आरटीई अधिनियम के तहत सीटों का आरक्षण संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है। किसी भी गैर सहायता प्राप्त स्कूल पर 25 प्रतिशत सीटें कमजोर वर्ग को आरक्षित करने का दबाव नहीं डाला जा सकता है। लेकिन, तीनों जजों ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है।
दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण पेज -1,20-9-2012 f’k{kk)

डीयू शिक्षकों को कालेजों में दर्ज करानी होगी उपस्थिति




ठ्ठजागरण संवाददाता, नई दिल्ली दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष डीयू ने शपथपत्र दाखिल करते हुए कहा कि वह जल्द ही डीयू के कॉलेजों में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिये बायोमीट्रिक प्रणाली शुरू कर देंगे। उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एके सिकरी व जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ की खंडपीठ ने उस याचिका का निपटारा कर दिया, जिसमें डीयू के शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने के लिए बायोमीट्रिक सिस्टम से उनकी उपस्थिति दर्ज कराने की मांग की गई थी। इंडियन काउंसिल ऑफ लीगल ऐड एंड एडवाइस नामक संस्था की तरफ से याचिका दायर की गई थी। इसमें बताया गया था कि यूजीसी द्वारा तय नियमों के अनुसार प्रत्येक शिक्षक को कालेज में 30 सप्ताह पढ़ाना अनिवार्य है। मानकों के अनुसार शिक्षक को सप्ताह में छह दिन और इनमें कम से कम 40 घंटे पढ़ाना चाहिए। डीयू में ऐसा नहीं हो रहा। डीयू के शिक्षक सप्ताह में मात्र पांच से छह घंटे ही छात्रों को पढ़ाने के लिए समय देते हैं।


दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण पेज -2,20-9-2012 f’k{kk)

डीयू शिक्षकों को कालेजों में दर्ज करानी होगी उपस्थिति




ठ्ठजागरण संवाददाता, नई दिल्ली दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष डीयू ने शपथपत्र दाखिल करते हुए कहा कि वह जल्द ही डीयू के कॉलेजों में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिये बायोमीट्रिक प्रणाली शुरू कर देंगे। उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एके सिकरी व जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ की खंडपीठ ने उस याचिका का निपटारा कर दिया, जिसमें डीयू के शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने के लिए बायोमीट्रिक सिस्टम से उनकी उपस्थिति दर्ज कराने की मांग की गई थी। इंडियन काउंसिल ऑफ लीगल ऐड एंड एडवाइस नामक संस्था की तरफ से याचिका दायर की गई थी। इसमें बताया गया था कि यूजीसी द्वारा तय नियमों के अनुसार प्रत्येक शिक्षक को कालेज में 30 सप्ताह पढ़ाना अनिवार्य है। मानकों के अनुसार शिक्षक को सप्ताह में छह दिन और इनमें कम से कम 40 घंटे पढ़ाना चाहिए। डीयू में ऐसा नहीं हो रहा। डीयू के शिक्षक सप्ताह में मात्र पांच से छह घंटे ही छात्रों को पढ़ाने के लिए समय देते हैं।


दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण पेज -2,20-9-2012 f’k{kk)