लगभग तीन साल की कोशिशों के बाद पीपीपी (सार्वजनिक व निजी भागीदारी) मॉडल स्कूलों के खुलने की उम्मीद बनती दिख रही है। सरकार ने उसका मसौदा तैयार कर लिया है। निजी क्षेत्र को न सिर्फ जमीन का इंतजाम खुद करना होगा, बल्कि स्कूल भवनों के निर्माण व संसाधनों आदि का सारा खर्च भी उठाना होगा। उन्हें छूट यह होगी कि मैनेजमेंट कोटे की सीटों की फीस वह खुद की तय करेंगे। जबकि स्कूल के लिए जमीन खरीदने में राज्य सरकारें उनकी मदद करेंगी। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शैक्षिक रूप से पिछड़े ब्लाकों को छोड़ बाकी ब्लाकों में खुलने वाले पीपीपी मॉडल के 2500 स्कूलों के लिए सारी तैयारियां कर ली हैं। राज्य सरकारों ने भी उसके मसौदे को मंजूरी दे दी है। लिहाजा अब उसे जल्द ही कैबिनेट के पास भेजा जाना है। मसौदे के तहत इन स्कूलों के लिए सरकार व निजी क्षेत्र के बीच दस साल के लिए करार होगा। जमीन खरीदने, भवन बनाने और संसाधनों को जुटाने और उस पर खर्च की पूरी जिम्मेदारी निजी क्षेत्र की होगी। ये स्कूल सोसाइटी या ट्रस्ट के जरिए खोले जा सकेंगे। इन स्कूलों के दाखिले में राज्य सरकार के नियमों के तहत सरकारी कोटा लागू होगा, जिसमें हर श्रेणी में 33 प्रतिशत लड़कियों को मौका मिलेगा। हर कक्षा में 140 छात्र और हर स्कूल में अधिकतम 980 छात्र सरकार प्रायोजित होंगे। उन पर आने वाले फीस व अन्य खर्च का भुगतान सरकार केंद्रीय विद्यालयों में एक छात्र पर आने वाले खर्च के लिहाज से करेगी। जबकि बाकी छात्रों व मैनेजमेंट कोटे की सीटों के मामले में फीस तय करने का अधिकार निजी क्षेत्र को होगा। राज्य सरकारें निजी क्षेत्र को जमीन खरीदने में मदद करेंगी। साथ ही उनसे अपने कोटे के छात्रों को ड्रेस व किताब-कापी उपलब्ध कराने की अपेक्षा की गयी है। दस साल का करार पूरा होने से पहले आपसी सहमति से आगे के लिए नया करार हो सकेगा।
Wednesday, June 15, 2011
ऑनलाइन पूरी होगी साइंस व विज्ञान के शिक्षकों की कमी
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के शिक्षकों की भारी कमी के संकट से निपटने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने एक कदम और आगे बढ़ाया है। शिक्षकों के चयन के साथ ही शोध को बढ़ाने के मद्देनजर उसने फैकल्टी रिचार्ज कार्यक्रम की ऑनलाइन शुरुआत की है। जिसमें पूरे साल शिक्षकों के चयन की प्रक्रिया जारी रहेगी। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने गुरुवार को यहां यूजीसी के इस कार्यक्रम के लिए वेब पोर्टल की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि विज्ञान व प्रौद्योगिकी में शिक्षकों की कमी का भारी संकट है। आने वाले वर्षो में बीस हजार शिक्षकों की जरूरत होगी। आयोग की इस नई पहल से दस हजार ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति का लक्ष्य है, जो सिर्फ पढ़ाएंगे ही नहीं, बल्कि शोध भी करेंगे। योजना के तहत फिलहाल शोध पर फोकस रखने वाले 200 शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी, जिनमें असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद शामिल हैं। वैसे तो आवेदन व चयन का यह सिलसिला सालभर चलेगा, लेकिन फिर भी सालभर में कट-ऑफ की तारीख चार बार 31 मार्च, 30 जून, 30 सितंबर और 31 दिसंबर होगी। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र के इस समस्या से निपटने के लिए आइसीटी-मुंबई के पूर्व निदेशक प्रो. एमएम शर्मा की अगुवाई में एक उच्चाधिकार समिति बनी थी। उसी की सिफारिश पर यह पहल हुई है। बताते हैं कि इस योजना के तहत भारतीय मूल के वे विदेशी भी आवेदन कर सकेंगे, जिन्होंने विदेशी नागरिकता नहीं ली है। शिक्षक बनने के हर आवेदक को शोध के लिए एक प्रोजेक्ट भी दाखिल करना होगा। जिनका चयन होगा, उनके पढ़ाने के घंटे दूसरे शिक्षकों से कम होंगे। ऐसे शिक्षकों की पहचान को अलग रखने के लिए उनके पद के पहले यूजीसी शब्द जुड़ा होगा। इन शिक्षकों को अपने यहां नियुक्ति के इच्छुक विश्वविद्यालयों व प्रौद्योगिकी संस्थानों को यूजीसी के साथ एक सहमति पत्र पर दस्तखत करने होंगे। जबकि चयनित शिक्षकों को अपनी नियुक्ति के पसंदीदा स्थान व संस्थान की छूट होगी.
छात्रों के लिए आया 2200 का लैपटॉप
विद्यार्थियों के लिए सबसे सस्ते लैपटॉप का इंतजार खत्म। लगभग ढाई साल की सरकारी कोशिशों के बाद उसकी पहली खेप इसी महीने आने जा रही है। अभी कीमत होगी महज 2200 रुपये। आगे चलकर और भी कम हो जाएगी। सरकार इसे उच्च शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव के रूप में देख रही है। उच्च शिक्षा के छात्रों की पढ़ाई-लिखाई के लिए अपने तरीके के इस बिल्कुल अलग लैपटॉप को अपने देश के इंजीनियरों के डिजाइन पर कनाडा से बनवाया गया है। बाद में यह देश में ही बनेगा। फिलहाल एक लाख लैपटॉप के ऑर्डर दिए जा चुके हैं। उसका पूरा भुगतान मानव संसाधन विकास मंत्रालय करेगा। तीन-चार महीने के भीतर ये लैपटॉप आ जाएंगे। फील्ड ट्रायल के लिए हर राज्य सरकार को 3000 लैपटॉप मुफ्त में दिए जाएंगे। राज्यों के जरिए ही यह उच्च शिक्षा के छात्रों तक प्रायोगिक तौर पर पहंुचेंगे। राज्य सरकार इन्हें किन छात्रों के हाथ पहंुचाती है, यह अधिकार उसका होगा। लैपटॉप में छात्रों को कोई खामी दिखती है, तो उसे दूर किया जाएगा। लैपटॉप की पहली खेप में आइआइटी राजस्थान के पास इसी महीने पहंुच रही है। उसके लिए दस हजार लैपटॉप के ऑर्डर दिए गए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उसके लिए धन भी मुहैया करा दिया है। चूंकि अभी सिर्फ एक लाख लैपटॉप के आर्डर दिए गए हैं। एक लैपटॉप की कीमत 2200 रुपये आ रही है। ऑर्डर बढ़ने पर यह लगभग 1500 रुपये तक आ सकती है। सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी मिशन के जरिए उच्च शिक्षा में प्रौद्योगिकी के अधिकतम इस्तेमाल पर जोर दिया है। उसी क्रम में यह सबसे सस्ता लैपटॉप छात्रों के लिए तैयार कराया गया है। इस पर बीते ढाई साल से काम चल रहा था। बताते हैं कि आगे चलकर छात्रों के लिए लैपटॉप खरीदने में केंद्र व राज्य के बीच खर्च में 50:50 का बंटवारा हो सकता है। फिलहाल एक बार एक लाख लैपटॉप के उपयोग में आने के बाद बाकी औपचारिकताओं को पूरा किया जाएगा।
इंटर में हिंदी में फेल हुए 42 हजार छात्र
क ख ग सीखकर शिक्षा की शुरुआत करने वाले छात्र भविष्य बनाने की ख्वाहिश में मातृभाषा की ही उपेक्षा कर रहे हैं। इसकी हकीकत यूपी बोर्ड इंटर परीक्षा परिणाम से पता लगती है। मातृभाषा हिंदी में लगभग 42 हजार छात्र फेल हुए हैं। यूपी बोर्ड के इंटरमीडिएट पाठ्यक्रम में वाणिज्य व विज्ञान वर्ग के परीक्षार्थियों को सामान्य हिंदी व कला वर्ग के परीक्षार्थियों को साहित्यिक हिंदी पढ़ाई जाती है। दोनों पाठ्यक्रम में गद्य व पद्य की पुस्तकों के कुछ पाठों का फर्क है। साहित्यिक हिंदी में 32 हजार 794 परीक्षार्थी फेल हुए तो सामान्य हिंदी में 9202 परीक्षार्थी। फेल छात्रों में विज्ञान वर्ग के मुकाबले कला वर्ग के छात्र अधिक हैं। इसका कारण छात्रों की यह मानसिकता मानी जा रही है कि हिंदी तो उनकी मातृभाषा है। वह सब ठीक कर लेंगे। इसके मुकाबले वे अंग्रेजी को कठिन मानकर अधिक समय देते हैं। इसके अतिरिक्त हिंदी की कुछ सहायक पुस्तकें कई सालों से बाजार से नदारद हैं। उत्तर प्रदेश में अन्य भारतीय भाषाओं की पढ़ाई का भी बुरा हाल है। आंकड़े गवाह हैं कि उडि़या, कन्नड़, तमिल, तेलगू व गुजराती में बोर्ड को एक भी छात्र नहीं मिला। नेपाली व मराठी में दो-दो छात्रों ने परीक्षा दी। बंगला में 28 छात्र पंजीकृत थे, लेकिन दो ने ही परीक्षा दी। इनके मुकाबले उर्दू में 44,703 परीक्षार्थी थे।
हाईस्कूल तक मुफ्त शिक्षा पर सहमति
माध्यमिक तक मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा और स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए नए कानून की जमीन तैयार हो गई है। राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद (केब) ने केंद्र के इन दोनों प्रस्तावों को मंजूरी दे दी है। उसने नेशनल वोकेशनल एजूकेशन क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दिखा दी है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने मंगलवार को यहां हुई केब की बैठक के बाद पत्रकारों से कहा कि सारे फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। सदस्यों के सुझाव पर यह तय हो गया है कि केब की बैठक अब एक साल में दो बार हुआ करेगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून को माध्यमिक स्तर तक ले जाया जाएगा। नए कानून के शुरुआती मसौदे को तैयार करने के लिए केब के सदस्यों में से ही एक समिति बनेगी। उसमें मंत्रियों, शिक्षाविदें के अलावा सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि शामिल होंगे। वे सभी पक्षकारों से बात करके तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देंगे। उसके बाद आगे की कार्यवाही की जाएगी। हालांकि बैठक के दौरान राज्यों ने इसमें केंद्र के साथ खर्च के बंटवारे का सवाल भी उठाया था, लेकिन सिब्बल ने कहा यह तो अभी प्रस्ताव है। मसौदा बनने के बाद सारे मसलों पर चर्चा होगी। इसी तरह, स्कूलों में मनमानी फीस या फिर शिक्षकों को वेतन भुगतान में हेराफेरी समेत अन्य सभी गलत क्रियाकलापों को रोकने के लिए नए कानून के शुरुआती मसौदे के लिए भी केब प्रतिनिधियों में से ही एक अलग समिति बनेगी। वह भी तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देगी। नेशनल वोकेशनल एजूकेशन क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क के लिए राज्यों के शिक्षा मंत्रियों का एक समूह पहले से ही बना है। वह सभी राज्यों से मशविरा करके उसका मसौदा तैयार करेगा। व्यावसायिक शिक्षा का मानक राष्ट्रीय होगा, लेकिन पाठ्यक्रम राज्यों की स्थानीय जरूरतों के लिहाज से बनेगा। पूर्व में हुए कुलपतियों के सम्मेलन की सिफारिशों के तहत उच्च शिक्षा में सुधार, विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता जैसे अन्य मसलों पर भी केब ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है, लेकिन कुछ किंतु-परंतु भी हैं। लिहाजा इसके लिए भी केब सदस्यों की एक समिति बनेगी। इस बीच, राज्य सरकारें से अपने सुझाव देने की बात कही गई है।
Monday, June 13, 2011
Friday, June 10, 2011
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