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Friday, June 17, 2011

कई कांग्रेस शासित राज्यों में लागू नहीं शिक्षा का अधिकार


छह से 14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) को लागू हुए एक साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है मगर कई कांग्रेस शासित राज्यों में ही अब तक यह कानून का रूप नहीं ले सका है। 18 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों ने ही इस कानून को अधिसूचित किया है जबकि दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल, गोवा और असम जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में इस पर अभी भी कानून नहीं बनाया जा सका है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार, आंध्रप्रदेश, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, बिहार, चंडीगढ़, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, दादरा नगर हवेली, दमन दीव, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, लक्षद्वीप, मध्यप्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम ने आरटीई कानून को अधिसूचित कर दिया है। दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मेघालय, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, कर्नाटक ने अपने विधि विभाग को इस कानून का मसौदा विचार के लिए भेजा है। गुजरात, असम, केरल, मेघालय, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा ने इस कानून को मंजूरी के लिए कैबिनेट के समक्ष भेजने की बात कही है। निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून के तहत ही प्रदेशों में राज्य बाल अधिकार संरक्षण परिषद (एससीपीसीआर) गठित करने का प्रावधान किया गया है। हालांकि अब तक केवल 14 राज्यों में ही राज्य बाल अधिकार संरक्षण परिषद का गठन किया गया है। असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गोवा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम और उत्तराखंड ने एससीपीसीआर का गठन किया है। ताजा जनगणना के अनुसार पिछले 10 वर्ष में महिला साक्षरता दर 11.8 फीसदी और पुरुष साक्षरता दर 6.9 फीसदी की दर से बढ़ी है, हालांकि महत्वाकांक्षी सर्व शिक्षा अभियान के आंकड़ों पर गौर करें तो आरटीई लागू होने के एक वर्ष गुजरने के बाद देश में अभी भी 81 लाख 50 हजार 61च् बच्चे स्कूली शिक्षा के दायरे से बाहर है, 41 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है और 49 प्रतिशत स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। प्राथमिक स्कूलों में दाखिल छात्रों की संख्या 13,34,05,581 है जबच् िउच्च प्राथमिक स्कूलों में नामांकन प्राप्त 5,44,67,415 है। साल 2020 तक सकल नामांकन दर को वर्तमान 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है लेकिन सर्व शिक्षा अभियान के 2009-10 के आंकड़ों के अनुसार, बड़ी संख्या में छात्रों को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाने के लक्ष्य के बीच देश में अभी कुल 44,77,429 शिक्षक ही हैं। सर्व शिक्षा अभियान के आंकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2009-10 में प्राथमिक स्तर पर बालिका नामांकन दर 48.46 प्रतिशत और उच्च प्राथमिक स्तर पर बालिका नामांकन दर 48.12 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति वर्ग के बच्चों की नामांकन दर 19.81 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति वर्ग च्े बच्चों की नामांकन दर महज 10.93 प्रतिशत दर्ज की गई है। देश में फिलहाल छात्र शिक्षक अनुपात 32:। है। वैसे 324 ऐसे जिले भी हैं जिनमें निर्धारित मानक के अनुरूप छात्र शिक्षक अनुपात 30:। से कम है। देश में 21 प्रतिशत ऐसे शिक्षक हैं जिनके पास पेशेवर डिग्री तक नहीं है।


Thursday, June 16, 2011

कई कांग्रेस शासित राज्यों में लागू नहीं शिक्षा का अधिकार


छह से 14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) को लागू हुए एक साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है मगर कई कांग्रेस शासित राज्यों में ही अब तक यह कानून का रूप नहीं ले सका है। 18 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों ने ही इस कानून को अधिसूचित किया है जबकि दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल, गोवा और असम जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में इस पर अभी भी कानून नहीं बनाया जा सका है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार, आंध्रप्रदेश, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, बिहार, चंडीगढ़, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, दादरा नगर हवेली, दमन दीव, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, लक्षद्वीप, मध्यप्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम ने आरटीई कानून को अधिसूचित कर दिया है। दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मेघालय, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, कर्नाटक ने अपने विधि विभाग को इस कानून का मसौदा विचार के लिए भेजा है। गुजरात, असम, केरल, मेघालय, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा ने इस कानून को मंजूरी के लिए कैबिनेट के समक्ष भेजने की बात कही है। निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून के तहत ही प्रदेशों में राज्य बाल अधिकार संरक्षण परिषद (एससीपीसीआर) गठित करने का प्रावधान किया गया है। हालांकि अब तक केवल 14 राज्यों में ही राज्य बाल अधिकार संरक्षण परिषद का गठन किया गया है। असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गोवा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम और उत्तराखंड ने एससीपीसीआर का गठन किया है। ताजा जनगणना के अनुसार पिछले 10 वर्ष में महिला साक्षरता दर 11.8 फीसदी और पुरुष साक्षरता दर 6.9 फीसदी की दर से बढ़ी है, हालांकि महत्वाकांक्षी सर्व शिक्षा अभियान के आंकड़ों पर गौर करें तो आरटीई लागू होने के एक वर्ष गुजरने के बाद देश में अभी भी 81 लाख 50 हजार 61च् बच्चे स्कूली शिक्षा के दायरे से बाहर है, 41 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है और 49 प्रतिशत स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। प्राथमिक स्कूलों में दाखिल छात्रों की संख्या 13,34,05,581 है जबच् िउच्च प्राथमिक स्कूलों में नामांकन प्राप्त 5,44,67,415 है। साल 2020 तक सकल नामांकन दर को वर्तमान 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है लेकिन सर्व शिक्षा अभियान के 2009-10 के आंकड़ों के अनुसार, बड़ी संख्या में छात्रों को स्कूली शिक्षा के दायरे में लाने के लक्ष्य के बीच देश में अभी कुल 44,77,429 शिक्षक ही हैं। सर्व शिक्षा अभियान के आंकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2009-10 में प्राथमिक स्तर पर बालिका नामांकन दर 48.46 प्रतिशत और उच्च प्राथमिक स्तर पर बालिका नामांकन दर 48.12 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति वर्ग के बच्चों की नामांकन दर 19.81 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति वर्ग च्े बच्चों की नामांकन दर महज 10.93 प्रतिशत दर्ज की गई है। देश में फिलहाल छात्र शिक्षक अनुपात 32:। है। वैसे 324 ऐसे जिले भी हैं जिनमें निर्धारित मानक के अनुरूप छात्र शिक्षक अनुपात 30:। से कम है। देश में 21 प्रतिशत ऐसे शिक्षक हैं जिनके पास पेशेवर डिग्री तक नहीं है।

Wednesday, June 15, 2011

इंटर में हिंदी में फेल हुए 42 हजार छात्र


क ख ग सीखकर शिक्षा की शुरुआत करने वाले छात्र भविष्य बनाने की ख्वाहिश में मातृभाषा की ही उपेक्षा कर रहे हैं। इसकी हकीकत यूपी बोर्ड इंटर परीक्षा परिणाम से पता लगती है। मातृभाषा हिंदी में लगभग 42 हजार छात्र फेल हुए हैं। यूपी बोर्ड के इंटरमीडिएट पाठ्यक्रम में वाणिज्य व विज्ञान वर्ग के परीक्षार्थियों को सामान्य हिंदी व कला वर्ग के परीक्षार्थियों को साहित्यिक हिंदी पढ़ाई जाती है। दोनों पाठ्यक्रम में गद्य व पद्य की पुस्तकों के कुछ पाठों का फर्क है। साहित्यिक हिंदी में 32 हजार 794 परीक्षार्थी फेल हुए तो सामान्य हिंदी में 9202 परीक्षार्थी। फेल छात्रों में विज्ञान वर्ग के मुकाबले कला वर्ग के छात्र अधिक हैं। इसका कारण छात्रों की यह मानसिकता मानी जा रही है कि हिंदी तो उनकी मातृभाषा है। वह सब ठीक कर लेंगे। इसके मुकाबले वे अंग्रेजी को कठिन मानकर अधिक समय देते हैं। इसके अतिरिक्त हिंदी की कुछ सहायक पुस्तकें कई सालों से बाजार से नदारद हैं। उत्तर प्रदेश में अन्य भारतीय भाषाओं की पढ़ाई का भी बुरा हाल है। आंकड़े गवाह हैं कि उडि़या, कन्नड़, तमिल, तेलगू व गुजराती में बोर्ड को एक भी छात्र नहीं मिला। नेपाली व मराठी में दो-दो छात्रों ने परीक्षा दी। बंगला में 28 छात्र पंजीकृत थे, लेकिन दो ने ही परीक्षा दी। इनके मुकाबले उर्दू में 44,703 परीक्षार्थी थे।


Saturday, June 4, 2011

उत्तराखंड में बेटियों के भरोसे चल रहे 56 कालेज


उत्तराखंड के दूरदराज और दुर्गम इलाकों के 56 सरकारी डिग्री कालेज छात्राओं के भरोसे चल रहे हैं। जी हां, छात्राएं नहीं आएं तो संसाधनों की कमी से जूझ रहे इन कालेजों के बंद होने की नौबत आ सकती है। इनमें 60 से 82 फीसदी छात्राएं हैं। छात्रों के न टिकने का कारण उनका पलायन है। और यह हो रहा है संसाधनों और रोजगारपरक शिक्षा में पिछड़ेपन के कारण। सुनने में भले ही यह अजीबोगरीब लगे, लेकिन सच्चाई यही है कि सूबे के 80 फीसदी सरकारी डिग्री कालेजों में रौनक छात्राओं के बूते है। यूं तो राज्य के सभी 70 सरकारी अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री कालेजों में छात्राओं की संख्या छात्रों से ज्यादा है। छात्राओं की संख्या 52706 और छात्रों की संख्या 38716 है। छात्र महज 42 फीसदी तो छात्राएं 58 फीसदी हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सामान्य वर्ग के साथ ही अनुसूचित जनजाति की छात्राओं की तादाद भी छात्रों से ज्यादा है। अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या 41 फीसदी तो छात्राओं की संख्या 59 फीसदी है। अलबत्ता, अनुसूचित जाति के छात्र संख्या के लिहाज से छात्राओं से खासे आगे हैं। इस वर्ग के छात्र 52.3 फीसदी तो छात्राएं 47.7 फीसदी हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पर्वतीय क्षेत्रों के कालेजों में छात्र और छात्राओं की संख्या में अंतर काफी ज्यादा है। मैदानी क्षेत्रों के 14 कालेजों में छात्र 48 फीसदी और छात्राएं 52 फीसदी हैं। वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में छात्राओं की संख्या 60 फीसदी से 80 फीसदी तक है। आंकड़े बयां कर रहे हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों से छात्रों का पलायन बड़ी संख्या में हो रहा है। संसाधनों की कमी, शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगारपरक शिक्षा में पिछड़ेपन के कारण छात्र टिक नहीं रहे हैं। इस वजह से दूरदराज के छात्रों का जिला मुख्यालयों और शहरों के कालेजों में जमावड़ा बढ़ रहा है। टिहरी जिले के चंद्रबदनी, देवप्रयाग, प्रतापनगर, पौखाल, अगरोड़ा, थत्यूड़, पौड़ी जिले के चौबट्टाखाल, बेदीखाल, नैनीडांडा, रिखणीखाल, सतपुली, चमोली जिले के गैरसैंण, तलवाड़ी, नागनाथ पोखरी, जोशीमठ, कर्णप्रयाग और गोपेश्र्वर, रुद्रप्रयाग जिले के जखोली व अगस्त्यमुनि, उत्तरकाशी जिले के उत्तरकाशी, बड़कोट व चिन्यालीसौड़, देहरादून जिले के चकराता व त्यूणी, नैनीताल जिले के दोषापानी, बागेश्र्वर जिले के कपकोट, कांडा व गरुड़, अल्मोड़ा जिले के रानीखेत, द्वाराहाट, जैंती, चौखुटिया व सोमेश्र्वर, पिथौरागढ जिले के बेरीनाग, नारायणनगर, बलुवाकोट, मुनस्यारी व गंगोलीहाट, चंपावत जिले के लोहाघाट व चंपावत कालेजों में छात्राओं की संख्या 60 से 82 फीसदी है।


Monday, April 11, 2011

12वीं योजना में शोध विवि पर रहेगा जोर


अमेरिका और चीन की तुलना में शोध में काफी पीछे रहने और युवाओं को हुनरमंद बनाने की धीमी रफ्तार की चुनौती को सरकार भांप गई है। लिहाजा देश में अगला दौर शोध विश्वविद्यालयों और ज्यादा से ज्यादा व्यावसायिक (वोकेशनल) शिक्षा के कॉलेजों का है। सरकार की मंशा 2020 तक उच्च शिक्षा के कुल दाखिले में 50 प्रतिशत व्यावसायिक शिक्षा में कराने की है। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शिक्षा क्षेत्र में अगले वर्षों की चुनौतियों के मद्देनजर अभी से तैयारी शुरु कर दी है। 12वीं योजना (2012-2017) में शोध को बढ़ावा देने वाले विश्वविद्यालयों को खोलने पर उसका सबसे ज्यादा जोर होगा। बताते हैं कि सरकार 2020 तक छोटी-छोटी ऐसे लगभग 50 विश्वविद्यालयों को खोलने का इरादा रखती है, जिनमें छात्रों की संख्या अधिकतम पांच हजार तक ही हो। ताकि उसमें शोध आदि पर ज्यादा बेहतर ढंग से काम हो सके। इसी तरह युवाओं को व्यावसायिक शिक्षा के जरिए हुनरमंद बनाने पर भी खास फोकस किया जाना है। बताते हैं कि 2007-08 में उच्च शिक्षा में कुल 1.63 करोड़ दाखिले में से सरकारी संस्थानों के तकनीकी व व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में सिर्फ 16 प्रतिशत छात्रों ने दाखिले लिये थे। 2020 तक इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य तय किया गया है। लिहाजा 12वीं पंचवर्षीय योजना से ही इस क्षेत्र को खास तवज्जो देनी होगी। उसके लिए कम और मध्यम अवधि के एक या दो वर्षीय एसोसिएट डिग्री या डिप्लोमा जैसे पाठ्यक्रम शुरू किये जा सकते हैं। सरकार ने उन पर विचार करना शुरू कर दिया है। विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में व्यावसायिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने, मानक को तय करने, जरूरी दिशा-निर्देश जारी करने के लिए एक राष्ट्रीय तंत्र का गठन भी किया जा सकता है|

Tuesday, March 29, 2011

संसद में अटक गए सिब्बल के अहम शिक्षा सुधार


 लगभग दो साल पहले फिर से बनी संप्रग की सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री बनने के बाद कपिल सिब्बल ने उच्च शिक्षा में सुधारों के लिए चाहे जितना शोर मचाया हो, लेकिन अब तक वे बेमायने ही साबित हुए हैं। शिक्षा का अधिकार कानून को छोड़ दें तो बाकी लगभग आधा दर्जन विधेयक अभी भी संसद में भी लटके पड़े हैं, जबकि कई तो वहां पेश भी नहीं हो पाए हैं। इस बार बजट सत्र में भी एक भी विधेयक संसद में पारित न होना शिक्षा में सुधार के एजेंडों को बड़ा झटका है। जब कपिल सिब्बल मानव संसाधन विकास मंत्री बने थे तो शिक्षा में सुधारों की इतनी बात हुई कि लगा ऊंची तालीम का पूरा ढांचा ही बदल जाएगा। अब लगभग दो साल होने को हैं और विदेशी विश्वविद्यालय (प्रवेश, नियमन एवं संचालन) विधेयक, विश्वविद्यालयों, कालेजों में कदाचार रोकने संबंधी विधेयक, उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए अनिवार्य मान्यता संबंधी विधेयक, शैक्षिक न्यायाधिकरण विधेयक, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (संशोधन) विधेयक और शिक्षा का अधिकार (संशोधन) विधेयक अभी संसद में ही लटके पड़े हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) विधेयक भी लंबित ही है|

Wednesday, January 26, 2011

तय क्रेडिट पर डिग्री पाएंगे आइआइटियन


सब कुछ योजना के तहत हुआ तो नए सत्र से देश के सभी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) में छात्रों की मूल्यांकन प्रणाली बदल जाएगी। अब तय क्रेडिट लाने पर ही छात्रों को डिग्री मिल जाएगी। हालांकि कम्युलेटिव इंडेक्स प्वाइंट (सीपीआइ) जारी रहेगा, लेकिन उसके खराब होने का भूत नहीं सताएगा। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल और संस्थानों के निदेशकों की उपस्थिति में आइआइटी काउंसिल ने उक्त फैसला किया। मूल्यांकन प्रणाली बदलने के सुझाव आइआइटी निदेशक प्रो.संजय गोविंद धांडे ने रखे थे। उन्होंने बताया कि संस्थान में छात्रों को 40 कोर्स करने होते हैं। इसके लिए सीपीआई प्रणाली लागू है। इसमें छात्र का किस पाठ्यक्रम में कैसा प्रदर्शन है? प्रोजेक्ट व प्रैक्टिकल कितने किये? आदि के आधार पर उसे अगली कक्षा में स्थान मिलता है। यदि किसी में प्रदर्शन कमजोर रहा तो सीनेट फैसला करती है। तय सीमा से न्यून प्रदर्शन पर छात्र को एकेडमिक टर्मिनेशन का शिकार होना पड़ता है। काउंसिल ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है कि सीपीआइ प्रणाली जारी रहेगी परंतु अब कोर्स का प्रदर्शन देखने के बजाय छात्र को हर सेमेस्टर में किये कार्य के लिए निर्धारित क्रेडिट दिये जाएंगे। ये क्रेडिट उसके खाते में जमा होते रहेंगे। कोर्स समाप्त होने पर कुल क्रेडिट (निर्धारित या उससे अधिक होने पर डिग्री दे दी जाएंगी। उन्होंने बताया कि सभी आइआइटी की सीनेट पहले की तरह स्वायत्त रहेंगी। कोर्सवार क्रेडिट तय करने, कितने क्रेडिट लाने पर डिग्री दी जायेगी? कितने क्रेडिट तक के छात्रों को अकादमिक निष्कासन का शिकार होना पड़ेगा। कितने क्रेडिट तक उसे सीनेट में अपील का मौका मिलेगा? डिग्री पूरी करने के लिए अधिकतम समय कितने साल होगा? इसके निर्धारण का अधिकार सभी संस्थानों की सीनेट का होगा। अलग-अलग संस्थानों की क्रेडिट का मूल्य अलग अलग हो सकता है परंतु इससे छात्रों को सीपीआई ठीक रखने का भूत नहीं सताएगा। छात्र के लिए एक-दो सेमेस्टर के बाद किसी और संस्थान में जाना आसान हो जाएगा। पीजी, पीएचडी व शिक्षक बढ़ाने का बना रोडमैप : भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की संयुक्त परिषद (आइआइटी काउंसिल) ने संस्थानों में परास्नातक व पीएचडी छात्रों की संख्या बढ़ाने और शिक्षकों की कमी दूर करने का रोडमैप स्वीकार कर लिया।



Sunday, January 23, 2011

बिजनौर के 634 गांवों में पाठशाला ही नहीं


शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू कर हर बच्चे को शिक्षा से जोड़ने का सरकारी प्रयास बिजनौर में बेमानी नजर आ रहा है। सर्वशिक्षा अभियान के माध्यम से गांवों में शिक्षा की अलख जगाने का सरकारी वायदा किया जा रहा है, खजाने में धन भी पड़ा है लेकिन अभी भी जिले के 634 गांवों में स्कूल नहीं हैं। यहां के बच्चों को पढ़ाई के लिए कोसों दूर जाना पड़ता है। शिक्षा विभाग ने नए स्कूल खोलने के लिए सत्यापन कराया तो पता चला कि जिले जिले में 2390 गांव हैं। इनमें से मात्र 1756 गांवों में ही स्कूल हैं। बाकी गांवों के बच्चे तालीम हासिल करने के लिए कोसों दूर जाते हैं। शिक्षा का अधिकार के तहत हर गांव में स्कूल खोलने की सरकारी योजना परवान चढ़ती नहीं दिख रही। नए परिषदीय स्कूल खोलकर सभी बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की योजना पर काम करने का वायदा तो किया जा रहा है, लेकिन स्कूलों के निर्माण के लिए पिछले साल आए धन को अभी तक खर्च नहीं किया जा सका है। ऐसे में फिलहाल हर बच्चे की किस्मत संवारने को स्कूल मिलने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच कई बार हर गांव में स्कूल खोलने के लिए मानक तय किए गये, लेकिन इसमें आने वाले खर्च को देखते हुए हर बार प्रस्ताव को मंजूरी देने के बाद उसमें बदलाव कर दिया गया। अब फिर से नया प्रस्ताव आया है। सबसे पहले प्रत्येक एक किमी पर बेसिक और डेढ़ किमी पर जूनियर हाईस्कूल खोलने की योजना बनाई गई। सरकार ने इसे नहीं स्वीकारा। इसके बाद आबादी के आधार पर स्कूलों को खोलने का प्रस्ताव बनाया। इसे भी केंद्र सरकार ने नहीं माना। अब प्रत्येक तीन किमी पर जूनियर हाईस्कूल खोलने का प्रस्ताव पास किया गया है। इसके तहत जिले के छह सौ से अधिक गांवों को चिन्हित किया गया है, जहां पर विद्यालय नहीं हैं। इस बारे में बात करने पर बीएसए योगराज सिंह ने बताया कि जिन गांवों में स्कूल नहीं हैं, उनमें मानकों के अनुरूप स्कूलों का निर्माण कराया जाएगा।


Monday, January 10, 2011

400 स्कूलों की बदलेगी किस्मत

हिमाचल प्रदेश के चार सौ स्कूलों की किस्मत संवरने वाली है। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएस) के तहत प्रदेश को केंद्र से वर्ष 2010-11 के लिए 156 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मंजूर हो गई है। इस योजना राशि में 75 फीसदी हिस्सा केंद्र देगा 25 फीसदी खर्च राज्य सरकार को उठाना होगा। इस राशि से स्कूलों में आधारभूत ढांचा विकसित किया जाएगा। इससे पहले शिक्षा विभाग को वर्ष 09-10 की योजना के तहत 12 करोड़ से अधिक की रकम मिल चुकी है। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत चयनित स्कूलों में विभिन्न विकासात्मक कार्य किए जाएंगे। प्रदेश में चार सौ स्कूलों का चयन किया गया है। इनमें से वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल के रूप में स्तरोन्नत होने वाले 45 स्कूलों के अलावा 355 उच्च पाठशालाएं और वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाएं हैं। इन पाठशालाओं में बेहतर क्लास रूम, कंप्यूटर लैब और पुस्तकालय अपडेट किए जाएंगे। इसके अलावा स्कूलों में छात्राओं के लिए एक्टीविटी रूम भी बनाए जाएंगे। जहां चारदीवारी की जरूरत है, वहां इसका निर्माण करवाया जाएगा। स्तरोन्नत होने वाले स्कूलों को 52 लाख रुपये प्रति स्कूल व चिन्हित स्कूलों को 45 लाख रुपये दिए जाएंगे। सर्वशिक्षा अभियान के राज्य परियोजना निदेशक राजेश शर्मा ने बताया कि शिक्षा विभाग को इस साल की योजना के तहत 156 करोड़ रुपये मंजूर हुए हैं। इस पैसे से चिन्हित स्कूलों में आधारभूत ढांचा विकसित किया जाएगा। स्कूलों को तय प्रावधानों के अनुसार राशि आवंटित की जाएगी। इस राशि से स्कूलों में कंप्यूटर लैब व क्लास रूम आदि विकसित किए जाएंगे। इसके अलावा छात्राओं की सुविधा के लिए शौचालयों का निर्माण किया जाएगा। कई संस्थानों में सुरक्षा के लिहाज से चारदीवारी भी बनाई जाएगी। छात्राओं के लिए अलग से एक्टिविटी रूम बनेंगे, जहां उनके व्यक्तित्व विकास के लिए विभिन्न प्रकार की गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत मिले पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा।