क ख ग सीखकर शिक्षा की शुरुआत करने वाले छात्र भविष्य बनाने की ख्वाहिश में मातृभाषा की ही उपेक्षा कर रहे हैं। इसकी हकीकत यूपी बोर्ड इंटर परीक्षा परिणाम से पता लगती है। मातृभाषा हिंदी में लगभग 42 हजार छात्र फेल हुए हैं। यूपी बोर्ड के इंटरमीडिएट पाठ्यक्रम में वाणिज्य व विज्ञान वर्ग के परीक्षार्थियों को सामान्य हिंदी व कला वर्ग के परीक्षार्थियों को साहित्यिक हिंदी पढ़ाई जाती है। दोनों पाठ्यक्रम में गद्य व पद्य की पुस्तकों के कुछ पाठों का फर्क है। साहित्यिक हिंदी में 32 हजार 794 परीक्षार्थी फेल हुए तो सामान्य हिंदी में 9202 परीक्षार्थी। फेल छात्रों में विज्ञान वर्ग के मुकाबले कला वर्ग के छात्र अधिक हैं। इसका कारण छात्रों की यह मानसिकता मानी जा रही है कि हिंदी तो उनकी मातृभाषा है। वह सब ठीक कर लेंगे। इसके मुकाबले वे अंग्रेजी को कठिन मानकर अधिक समय देते हैं। इसके अतिरिक्त हिंदी की कुछ सहायक पुस्तकें कई सालों से बाजार से नदारद हैं। उत्तर प्रदेश में अन्य भारतीय भाषाओं की पढ़ाई का भी बुरा हाल है। आंकड़े गवाह हैं कि उडि़या, कन्नड़, तमिल, तेलगू व गुजराती में बोर्ड को एक भी छात्र नहीं मिला। नेपाली व मराठी में दो-दो छात्रों ने परीक्षा दी। बंगला में 28 छात्र पंजीकृत थे, लेकिन दो ने ही परीक्षा दी। इनके मुकाबले उर्दू में 44,703 परीक्षार्थी थे।
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Wednesday, June 15, 2011
हाईस्कूल तक मुफ्त शिक्षा पर सहमति
माध्यमिक तक मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा और स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए नए कानून की जमीन तैयार हो गई है। राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद (केब) ने केंद्र के इन दोनों प्रस्तावों को मंजूरी दे दी है। उसने नेशनल वोकेशनल एजूकेशन क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दिखा दी है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने मंगलवार को यहां हुई केब की बैठक के बाद पत्रकारों से कहा कि सारे फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। सदस्यों के सुझाव पर यह तय हो गया है कि केब की बैठक अब एक साल में दो बार हुआ करेगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून को माध्यमिक स्तर तक ले जाया जाएगा। नए कानून के शुरुआती मसौदे को तैयार करने के लिए केब के सदस्यों में से ही एक समिति बनेगी। उसमें मंत्रियों, शिक्षाविदें के अलावा सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि शामिल होंगे। वे सभी पक्षकारों से बात करके तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देंगे। उसके बाद आगे की कार्यवाही की जाएगी। हालांकि बैठक के दौरान राज्यों ने इसमें केंद्र के साथ खर्च के बंटवारे का सवाल भी उठाया था, लेकिन सिब्बल ने कहा यह तो अभी प्रस्ताव है। मसौदा बनने के बाद सारे मसलों पर चर्चा होगी। इसी तरह, स्कूलों में मनमानी फीस या फिर शिक्षकों को वेतन भुगतान में हेराफेरी समेत अन्य सभी गलत क्रियाकलापों को रोकने के लिए नए कानून के शुरुआती मसौदे के लिए भी केब प्रतिनिधियों में से ही एक अलग समिति बनेगी। वह भी तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देगी। नेशनल वोकेशनल एजूकेशन क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क के लिए राज्यों के शिक्षा मंत्रियों का एक समूह पहले से ही बना है। वह सभी राज्यों से मशविरा करके उसका मसौदा तैयार करेगा। व्यावसायिक शिक्षा का मानक राष्ट्रीय होगा, लेकिन पाठ्यक्रम राज्यों की स्थानीय जरूरतों के लिहाज से बनेगा। पूर्व में हुए कुलपतियों के सम्मेलन की सिफारिशों के तहत उच्च शिक्षा में सुधार, विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता जैसे अन्य मसलों पर भी केब ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है, लेकिन कुछ किंतु-परंतु भी हैं। लिहाजा इसके लिए भी केब सदस्यों की एक समिति बनेगी। इस बीच, राज्य सरकारें से अपने सुझाव देने की बात कही गई है।
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