Sunday, January 23, 2011

उच्च शिक्षा की अधूरी चिंता


पिछले चार महीने से राहुल गांधी देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में जा-जाकर छात्रों को राजनीति से जुड़ने की सलाह दे रहे हैं। इधर उन्होंने उच्च-स्तर पर हस्तक्षेप कर कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों पर लगी रोक हटवाई है। उन्होंने छात्रों को राजनीति में आने को कहा। यहां तक कि विश्वविद्यालयों को राजनीति की नर्सरी बनाने की चाह व्यक्त की। विश्वविद्यालयों को लेकर उनके सभी बयान लगातार केवल राजनीति की चिंता करते हैं। एक बार भी उसमें शिक्षा संबंधी कोई बात नहीं कही गई। उनके विविध वक्तव्यों से लगता ही नहीं कि विश्वविद्यालयों का शिक्षा, शोध और ज्ञान से भी कुछ संबंध है, क्योंकि अपवाद स्वरूप भी राहुल ने शिक्षा संबंधी किसी समस्या या चिंता पर कहीं कुछ नहीं कहा। मानो विश्वविद्यालयों की कुल समस्या राजनीतिक सक्रियता की कमी रह गई हो! बात ठीक उल्टी है। अधिकांश विश्वविद्यालय लंबे समय से राजनीति से ग्रस्त होकर चौपट हो रहे हैं। पिछले वषरें में लखनऊ, उज्जैन, मेरठ, दिल्ली, अलीगढ़ आदि कई स्थानों पर छात्र-राजनीति के नाम पर हिंसा और उत्पात होता रहा है। दक्षिण भारत में भी स्थित भिन्न नहीं है। कर्नाटक और केरल में कई जगह विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में छात्र-संघ चुनाव पर ही प्रतिबंध लगाना पड़ा। हर कोई समझता है कि इसका क्या कारण है? छात्र राजनीति अधिकांश स्थानों में केवल स्थानीय दादागीरी चलाने का लाइसेंस भर है। हाल में उज्जैन में एक प्रोफेसर की इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उन्होंने कॉलेज के छात्र-संघ चुनाव को स्थगित करने की सलाह दी। कुछ पहले लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्र-संघ चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए दस ऐसे उम्मीदवार तैयार थे जिन पर हत्या के मामले दर्ज थे। अधिकांश जगहों पर छात्र-राजनीति का यही रंग है। एक विश्वविद्यालय के चुनाव में 48 वर्ष का छात्र चुनाव लड़ रहा था। इन छात्र-नेताओं में कई ऐसे होते हैं जिन्होंने अपने विषय की किसी किताब का मुंह भी नहीं देखा होता है। उलटे वे दूसरों की पढ़ाई-लिखाई को बाधित करते हैं। छात्र नेताओं द्वारा बात-बात में शिक्षकों को धमकाना, पीटना आदि तो असंख्य विश्वविद्यालयों में हो रहा है। यह सब केवल अनुशासनहीनता की बात नहीं, क्योंकि इन तत्वों को प्राय: राजनीतिक संरक्षण प्राप्त रहता है। हमारे नेतागण छात्र राजनीति को सीधे दलीय राजनीति का औजार मानते हैं। इस पर ठंडे दिमाग से विचार होना चाहिए कि राजनीतिक अभ्यास के नाम पर विश्वविद्यालयों को गुंडागर्दी की आरामगाह बनाना किसके हित में है? क्या शिक्षक, माता-पिता और अधिकांश छात्र चाहते भी हैं कि कॉलेज-विश्वविद्यालयों में राजनीति की नर्सरी चले? यदि नहीं, तो फिर क्यों शिक्षा केंद्रों पर राजनीति को थोपा जाता रहा है? नि:संदेह, देश का जनमत कहीं इसके पक्ष में नहीं है। लिंगदोह समिति के एक सदस्य का मानना था कि जहां छात्र पढ़ाई में ध्यान देते हैं, वहां छात्र-राजनीति बेहतर है, पर यह भी सच नहीं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्र-राजनीति की गिरावट का रूप दूसरा है, पर उतना ही हानिकारक है। उदाहरणार्थ, दिल्ली का एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय देशद्रोह का पार्टी-स्कूल बना रहा है। वहां नक्सलियों द्वारा सत्तर सुरक्षा-बल जवानों की एकमुश्त हत्या किए जाने पर जश्न मनाया जाता है। वहां हर तरह के देशी-विदेशी, भारत-निंदकों को सम्मानपूर्वक मंच मिलता है, किंतु देश के गृह मंत्री को बोलने नहीं दिया जाता। यहां तक कि उनके आगमन तक के विरुद्ध आंदोलन की धमकी दी जाती है। इसलिए, जो लोग विश्वविद्यालयों में विचारधारा वाली छात्र-राजनीति को बेहतर मानते हैं वे भी गलत चीज का ही बचाव कर रहे हैं। वस्तुत: कॉलेज और विश्वविद्यालय राजनीतिक अभ्यास के स्थान नहीं। शिक्षा ग्रहण करने के मूल्यवान काल, और कच्चे मस्तिष्क वाले किशोर-युवाओं के लिए राजनीतिक अभ्यास की जरूरत का कोई तर्क नहीं बनता। उससे हानि अवश्य होती है। कॉलेज-विश्वविद्यालयों में चुनावी अखाड़ेबाजी की जरूरत केवल दलीय राजनीति को है। अधिकांश दलों ने इसीलिए शिक्षा केंद्रों में राजनीति को प्रोत्साहन दिया है। इसमें उनका संकीर्ण स्वार्थ है, जिसका सामाजिक, राष्ट्रीय और विद्यार्थियों के हितों से कोई लेना-देना नहीं। हमारे नीति-नियंताओं को कभी विश्वविद्यालयों के असली काम, शिक्षा और शोध की गुणवत्ता पर भी कुछ चिंता करनी चाहिए। कभी उसके लिए भी हस्तक्षेप करना चाहिए। राजनीति की अधिकता ने हमारे कॉलेज-विश्वविद्यालयों को बिगाड़ा है। चाहे वह अंदर से हो या ऊपर से। नियुक्तियों का राजनीतिकरण, पाठ्यक्रमों का राजनीतिकरण, पुस्तकों का राजनीतिकरण, हर तरह की राजनीति ने ही विद्या केंद्रों को नष्ट किया है। हमारे उद्योग विश्व-स्तर को छू रहे हैं, किंतु हमारे विश्वविद्यालय अपनी पहले वाली स्थिति से भी नीचे गिर गए। क्या चिंता का विषय यह नहीं होना चाहिए? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Friday, January 21, 2011

30 फीसदी में आधे छात्र गायब


देश में छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को बुनियादी शिक्षा के दायरे में लाने वाला शिक्षा अधिकार कानून भले ही लागू हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में कानून पर अमल कोसों दूर है। तमाम कोशिशों के बावजूद सूबे के सरकारी स्कूलों में यदि छात्रों की उपस्थिति निराशाजनक है तो शिक्षकों की जबर्दस्त कमी भी चिंता का विषय है। सूबे में बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल हैं जिनमें बच्चों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। सूबे के बदहाल शैक्षिक परिदृश्य को उजागर करती है गैर सरकारी संस्था प्रथम द्वारा तैयार एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2010। प्रदेश के 69 जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों के 1896 सरकारी स्कूलों में किये गए सर्वेक्षण के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट बताती है कि 30 फीसदी सरकारी प्राथमिक विद्यालयों और 26.6 फीसदी उच्च प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति 50 फीसदी से कम रहती है। सर्वेक्षण में सूबे के महज 21.3 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात शिक्षा के अधिकार अधिनियम के मुताबिक पाया गया। प्रदेश के 5.4 प्रतिशत प्राथमिक और 4.8 फीसदी उच्च प्राथमिक स्कूलों में प्रधानाध्यापक नियुक्त नहीं पाये गए। वहीं 26 फीसदी प्राथमिक और 24.7 प्रतिशत उच्च प्राथमिक स्कूल ऐसे मिले जहां प्रधानाध्यापक तो नियुक्त थे लेकिन सर्वेक्षण के दिन अनुपस्थित थे। प्राथमिक स्कूलों के 19 प्रतिशत व उच्च प्राथमिक स्कूलों के 21 फीसदी शिक्षक भी नदारद पाये गए। सर्वेक्षण के दौरान 6.9 प्रतिशत परिषदीय स्कूलों में पेयजल सुविधा नहीं मिली। वहीं 10.9 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल की सुविधा होने के बावजूद पीने के लिए पानी मयस्सर नहीं था। 6.7 फीसदी स्कूलों में शौचालय की सुविधा नदारद थी जबकि 44 फीसदी स्कूलों में शौचालय इस्तेमाल के लायक नहीं पाये गए। 24.9 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की सुविधा नहीं थी। जिन स्कूलों में बालिकाओं के लिए शौचालय थे, उनमें से 25.4 प्रतिशत स्कूलों में वे बंद थे जबकि 14.2 फीसदी इस्तेमाल के काबिल नहीं मिले। सर्वेक्षण में 51.4 प्रतिशत स्कूल पुस्तकालय की सुविधा से महरूम पाये गए। 55.6 प्रतिशत स्कूलों में चहारदीवारी नदारद थी जबकि 39.2 फीसदी विद्यालयों में खेल का मैदान नहीं था।

आइआइटी की पढ़ाई आम से होने जा रही है खास


उच्च शिक्षा में सुधारों व विस्तार की कोशिशों के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) को और स्वायत्तता की राह खुल सकती है। लेकिन, इस बदलाव से छात्रों व अभिभावकों पर खर्च का बोझ भी बढ़ने के आसार हैं। आइआइटी काउंसिल में सहमति बनी तो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की मौजूदा फीस में पांच गुना तक इजाफा हो सकता है। सूत्रों के मुताबिक आइआइटी को और स्वायत्तता व बेहतर विकास के लिए परमाणु वैज्ञानिक व आइआइटी मुंबई के चेयरमैन डॉ. अनिल काकोदकर के नेतृत्व में गठित पैनल शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट देने जा रहा है। बताते हैं कि उसी दिन होने वाली आइआइटी काउंसिल की बैठक में पैनल की सिफारिशों पर चर्चा भी हो सकती है। सूत्रों की मानें तो काकोदकर पैनल आइआइटी में स्नातक (ग्रेजुएट) स्तर पर फीस बढ़ाए जाने के पक्ष में है। मौजूदा फीस 50 हजार रुपये के आसपास है, जो बढ़कर 2.10 से 2.50 लाख तक हो सकती है। तर्क यह है कि इससे सरकार पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की निर्भरता कम होगी जबकि संस्थान के कामकाज में और आजादी का रास्ता खुलेगा। जाहिर है कि फीस बढ़ने से छात्रों व अभिभावकों पर खर्च का बोझ बढ़ेगा। सूत्रों का हालांकि कहना है कि सस्ती ब्याज दरों व सब्सिडी पर कर्ज की उपलब्धता के चलते पढ़ाई का आसान रास्ता खुला रहेगा। इतना ही नहीं, छात्रवृत्तियों की संख्या बढ़ाकर भी इसकी भरपाई होती रहेगी। बताते हैं कि उच्च शिक्षा में बड़ा जोर शोध को बढ़ावा देने पर है। इसके मद्देनजर पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर फीस की बढ़ोतरी नहीं की जा सकती है। आइआइटी काउंसिल की वर्ष 2009 में हुई बैठक में आइआइटी की स्वायत्तता व भविष्य में उनके और विकास व विस्तार का रोडमैप तैयार करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने डा. काकोदकर की अध्यक्षता में एक पैनल का गठन किया था। आइआइटी संयुक्त प्रवेश परीक्षा में सुधार के लिए टी. रामास्वामी की अगुआई में एक अन्य समिति भी गठित की गई थी।


नींव से शिखर तक मजबूत हो कार्य-संस्कृति


स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक जिस प्रश्न का उत्तर पाने का प्रयास नहीं किया जाता है वह है पारदर्शिता की कमी तथा कार्य संस्कृति की शिथिलता। जब तक इन्हें सुधारने का प्रयास नहीं होगा, कोई बड़ा गुणात्मक परिवर्तन लगभग असंभव है। कमजोर कार्य संस्कृति तथा मूलभूत आवश्यकताओं की अनापूर्ति शिक्षा क्षेत्र की बड़ी चुनौतियां हैं। मूल्य-आधारित व्यवस्था की स्थापना के लिए इनका समाधान सघन प्रयासों द्वारा ही हो सकता है
गुणवत्तापरक शिक्षा का प्रारंभ परिवार के बाद स्कूल में प्रथम दिवस से प्रारंभ होना चहिए। दूसरी ओर विश्वविद्यालयों में उन्हीं प्राध्यापकों की नियुक्ति होनी चाहिए जिनकी अध्यापन तथा शोध में अभिरुचि सवरेपरि हो। उच्चतम स्तर की शिक्षा प्राप्त कर आगे अपने चयनित क्षेत्र में श्रेष्ठता तथा उत्कृष्टता प्राप्त करने की ललक हो। आज पूरा विश्व भारत के युवाओं की उत्कृष्टता तथा प्रवीणता को सराहता है। अमेरिका में नासा तथा सिलिकान वैली में उन्होंने भारत के ज्ञान-विज्ञान में किसी से पीछे होने का झंडा गाड़ा है। यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष उन युवाओं का है जो अपने आपको विश्वविद्यालयों में स्थापित करना चाहते हैं मगर जोर-जोर से सारे विश्व को बता रहे हैं कि वह योग्य नहीं हैं। वे नेट परीक्षा पास नहीं कर सकते हैं। योग्यता के मापदंड घटाए जाएं और उन्हें नियुक्त किया जाए। वे इसके लिए भी तैयार नहीं हैं कि दोतीन वर्ष के भीतर नेट पास कर लेंगे। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पिछले लगभग दो दशकों से पीएचडी तथा नेट को लेकर एक अनिश्चय सा बना रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कई बार इस संबंध में परिवर्तन किए हैं। नेट की अर्हता के बाद राज्य स्तरीय परीक्षाओं को उसे स्वीकार करना पड़ा। विश्व शक्ति बनने की राह पर चल रहा देश यह कैसे स्वीकार कर सका कि कुछ राज्यों के योग्यता प्राप्त परास्नातक नेट परीक्षा को कठिन पाते हैं अत: उन्हें राज्य स्तर पर परीक्षा पास करने दी जाए। इसके बाद यूजीसी पर नेट के स्थान पर पीएचडी को स्वीकार करने के दबाव बनते रहे। अब फिर एक बार इसे स्वीकार कर लिया गया है। क्या हमने मान लिया है कि नेट परीक्षा पास करना उनके लिए कठिन या असंभव है जो पीएचडी कर लेते हैं। विश्वविद्यालय या उसके महाविद्यालयों में प्रवक्ता बनकर प्राध्यापक बनने वाले व्यक्ति की गरिमा कैसे बनेगी या बढ़ेगी जो नेट की परीक्षा पास करने से प्रारंभ में बचना चाहता है? डॉक्टरेट की उपाधि का महत्व है परंतु उसकी जो स्थिति आज है उससे कोई नावाकिफ नहीं है। होना तो यह चाहिए कि केवल उन्हें ही शोध करने की अनुमति मिले जो पहले नेट परीक्षा उत्तीर्ण कर अपनी प्रवीणता, योग्यता तथा रुचि का प्रदर्शन कर लें। गुणवत्ता के हृास की कहानी किसी एक स्तर पर विद्यमान नहीं है। जिस देश में केवल 12-15 प्रतिशत बच्चों को साधन संपन्न स्कूलों में शिक्षा मिलती हो तथा बाकी खस्ताहाल सरकारी स्कूलों के भरोसे हों, वहां वह विश्वविद्यालय स्तर इसके प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता है। प्रतिवर्ष विशेषकर बड़े शहरों में नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश के लिए पब्लिक स्कूलों के दरवाजों पर जो भीड़ जुड़ती है, वह लगातार बढ़ती जा रही है। ये स्कूल तथा राज्य सरकार मिलकर कई खेल खेलते हैं। दिल्ली के नर्सरी स्कूलों में प्रवेश की र्चचा सारे देश में फैलती है। सरकार नीतियों में बातें तो आम आदमी तथा आर्थिक रूप से वंचित तथा पिछड़े वर्ग की करती है मगर इस बात का भी ध्यान रखती है कि विशिष्ट वर्ग की प्राथमिकता बनी रहे। 1950-60 के वर्षो में क्या यह कल्पना भी की जा सकती थी कि किसी स्कूल में प्रवेश के लिए उन्हीं बच्चों को लिया जाएगा जिनके माता-पिता ऊंची से शिक्षा प्राप्त कर चुके हों, आर्थिक रूप से संपन्न हों तथा स्कूल द्वारा लिए गए इंटरव्यू, जो अब सामान्य परिचय भेंट इत्यादि के नाम से जाना जाता है, में उत्तीर्ण हों? वही बच्चे प्रवेश पाएंगे जिनके माताप्िाता स्कूल प्रबंधन को यह आश्वासन दे सकें कि हम आपकी हर फीस देने को तैयार हैं तथा जो बढ़ोत्तरी होगी, उसे भी पूरा करेंगे। 2010 में शिक्षा के मौलिक अधिकार विधेयक को लागू किया गया। इसके अंतर्गत 25 प्रतिशत स्थानों पर पब्लिक सहित हर स्कूल में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य किया गया। पब्लिक स्कूलों में इनकी फीस सरकार स्वयं देने को तैयार है मगर स्कूल प्रबंधन इसे मानने को तैयार नहीं है। फीस की भरपाई से इन स्कूलों की अघोषित फीस का क्या होगा। सरकार तथा प्रबंधन के बीच इस प्रकार के प्रश्नों के समाधान सदा ही इस ढंग से निकाले जाते हैं कि प्रबंधन अपने ढंग सेस्कूल के उद्देश्य के अनुसार प्रवेश देता रहे और सरकार सामान्य व्यक्ति को अपने द्वारा निर्धारित नीतियों के परिपत्र दिखाती रहे। पब्लिक स्कूलों में प्रवेश के लिए जो दौड़-धूप प्रतिवर्ष होती हैउसमें उनका अनुग्रह पाने की कतार में राजनेता, अधिकारी, उद्योगपति, व्यापारी, मंत्री, सांसद कौन नहीं होता है? जो भी आर्थिक रूप से इन स्कूलों की मांगें पूरी कर सकता है, इन्हीं में अपने बच्चों को भेजता है और उसके लिए हर प्रकार का प्रयत्न करता है। यह स्कूल बच्चों को भी इंटरव्यू जैसे चक्र से नहीं बख्शते हैं। यद्यपि हाई कोर्ट ने उस पर रोक लगायी है। पब्लिक स्कूलों में नर्सरी प्रवेश प्रक्रिया प्रतिवर्ष लगभग सारे स्कूल शिक्षा क्षेत्र को आच्छादित कर देती है कि व्यवस्था तंत्र तथा मीडिया उन 85-90 प्रतिशत बच्चों की समस्याओं को लगभग नगण्य मान लेता है जो सरकारी या सामान्य स्कूलों में पढ़ते हैं। उनके स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय, अध्यापक, पुस्तकें, मध्याह्न भोजन जैसे पक्ष औसत से कमजोर ही पाए जाते हैं। दिल्ली में जब कॉमनवेल्थ खेलों में हजारों करोड़ के खेल अलग से खेले जा रहे थे, हर तरफनिर्माणहो रहा था तब उसी दिल्ली में साठ सरकारी स्कूल तंबुओं में चल रहे थे। वे आज भी उसी हालात में हैं। नर्सरी प्रवेश की प्रक्रिया पर केंद्रित व्यवस्था जिस प्रकार सामान्य स्कूलों की नजर अंदाज करती है वही आगे चलकर महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में स्तरिभन्नता को बढ़ाती है। पिछले 20 महीनों में शिक्षा के क्षेत्रा में बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुई। कक्षा दस की बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक घोषित हुई। केवल सीबीएसई ही क्रियान्वयन करना प्रारंभ कर रहा है। 44 डीम्ड विश्वविद्यालयों की मान्यता समाप्त घोषित की गई तथा उतने ही अन्य को नोटिस दिया गया कि मान्यता समाप्त क्यों कर दी जाए। सभी आराम से अपना कार्य कर रहे हैं। विद्यार्थी अवश्य असमंजस में हैं, अनिश्चितता में हैं। उच्च स्तर पर नियामक संस्थाएं अपनी असफलता झेल रही हैं मगर उनकी कार्य पण्राली में परिवर्तन केवल कागजों पर आया है। बड़ी तेजी से कहा गया था कि यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई इत्यादि को मिलाकर एक समग्र अधिकार संपन्न नियामक तथा शोध संस्थान बनेगा। पर अभी प्रतीक्षा कीजिए अगली सूचना की। स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक जिस प्रश्न का उत्तर पाने का प्रयास नहीं किया जाता है वह है पारदर्शिता की कमी तथा कार्य संस्कृति की शिथिलता। जब तक इन्हें सुधारने का प्रयास नहीं होगा, कोई बड़ा गुणात्मक परिवर्तन लगभग असंभव है। दिल्ली विश्वविद्यालय में दो-ढाई महीने हड़ताल रहती है दूर-दराज के स्कूलों में अध्यापक महीनों नहीं जाते हैं। कमजोर कार्य संस्कृति तथा मूलभूत आवश्यकताओं की अनापूर्ति शिक्षा क्षेत्र की बड़ी चुनौतियां हैं। मूल्य-आधारित व्यवस्था की स्थापना के लिए इनका समाधान सघन प्रयासों द्वारा ही हो सकता है। शिक्षा का वर्णपट केवल साक्षरता नहीं बढ़ाता है वह भविष्य बनाता है देश का और उसकी प्रगति तथा विकास का स्तर निर्धारित करता है। वही देश की साख बनाता है।