Monday, December 27, 2010
शिक्षा का उद्देश्य
जीवन निर्माण के अनेक महत्त्वपूर्ण घटक हैं। उनमें एक महत्त्वपूर्ण घटक है शिक्षा। शिक्षा से जीवन बनता है, संवरता है और नये निर्माण के क्षितिज उन्मुक्त होते हैं। यह सब तभी सम्भव है जब शिक्षा के उद्देश्य सही हों। जो विद्यार्थी केवल जीविका या उपाधि के लिए पढ़ते हैं, वे उसे जीवन के साथ कैसे जोड़ पाएंगे? आज विश्व के सामने जितनी समस्याएं हैं, शैक्षिक समस्या भी उनमें समाविष्ट है। ज्ञान प्राप्त करना और सेवा के लिए समर्पित होना-शिक्षा का मूलभूत आदर्श रहा है। इसकी विस्मृति होने के कारण सारी व्यवस्था गड़बड़ा रही है। इसका सबसे पहला प्रभाव पड़ा है शिक्षक और विद्यार्थी के सम्बंधों पर। एक समय था, उनके बीच गुरु-शिष्य का रिश्ता था। विद्यार्थी के मन में शिक्षक के प्रति बहुमान का भाव था। शिक्षक अध्यापन को अपना व्यवसाय नहीं, कर्त्तव्य मानते थे। कर्त्तव्य के आसन पर जब से जीविका प्रतिष्ठित हुई, बहुमान के भाव का लोप हो गया। शिक्षा क्यों? इस प्रश्न का छोटा सा उत्तर है-व्यक्तित्व निर्माण। इस उद्देश्य को थोड़ा सा विस्तार दिया जाये तो-आध्यात्मिकवैज्ञानिक व्यक्तित्व का निर्माण। अध्यात्म बहुत ऊंचा तत्त्व है, पर वह जब तक विज्ञान को लेकर नहीं चलेगा, अधूरा रहेगा। इसी प्रकार विज्ञान बहुत उपयोगी है पर अध्यात्म के अभाव में उसकी विध्वंसक शक्ति पर नियंतण्रनहीं हो पाएगा। उपयोगी होने पर भी एक-दूसरे से बिछुड़कर दोनों अधूरे हैं। इसी सत्य को अभिव्यक्ति देते हुए प्रज्ञा गीत में कहा गया है- कोरी आध्यात्मिकता युग को प्राण नहीं दे पाएगी। कोरी वैज्ञानिकता युग को त्राण नहीं दे पाएगी। दोनों की प्रीति जुड़ेगी, युगधारा तभी मुड़ेगी। क्या-क्या पाना है पहले आंक लो। अध्यात्म हमारी चेतना के केन्द्र में है और विज्ञान परिधि में है। जो केन्द्र में रहता है, मौलिक होता है, आधार होता है। परिधि में रहने वाला सहयोगी होता है, संरक्षक होता है। कोरा अध्यात्म युग में प्राण नहीं भर पाएगा और कोरा विज्ञान त्राण देने की क्षमता का विकास नहीं कर पाएगा। इस दृष्टि से दोनों का योग आवश्यक है। जब अध्यात्म और विज्ञान निकट आएंगे, दोनों में सद्भाव जागेगा। दोनों का एक साथ उपयोग होगा, तभी युगधारा को मोड़ दिया जा सकेगा। शिक्षाविद् इस बात पर अपना ध्यान केंद्रित करें, आध्यात्मिक-वैज्ञानिक व्यक्तित्व के निर्माण को प्रमुखता दें तो शिक्षा जगत की अहम समस्याओं का समाधान हो सकता है।
Thursday, December 23, 2010
शिक्षा में हर प्रकार का प्रदूषण अस्वीकार्य
अधिकतर ‘पब्लिक स्कूल’ खुलेआम धनार्जन का जरिया हो गये है, वे मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते है, सरकारी आदेशों को धता बता देते है, अध्यापकों को छठे वेतन आयोग के अनुसार प्रावधान करने के नाम पर फीस बढ़ाते है , मगर उन्हें वेतनमान नहीं देते। ये वही नामी-गिरामी स्कूल है जो सरकार से सारी सुविधाएं सामान्य जन के बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर लेते है, प्रारम्भ में सभी सरकारी प्रावधानों को मानने का वादा करते है मगर बाद में मनमानी करते है। विडम्बना यह है कि वे नेता तथा अधिकारी जो नीतियां बनाते है, उनका क्रियान्वयन करने के जिम्मेदार है, वे सभी इन्हीं स्कूलों में प्रवेश प्राप्त कराने के लिए कभी न कभी पहुंचे रहते है .
यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने जिम्मेदार नागरिक तैयार किये होते तो क्या जीवन के हर कार्य क्षेत्र में मूल्यों का इतना क्षरण दिखाई देता? यदि शिक्षा व्यवस्था मूल्यों तथा नैतिकता के आधार पर चल रही होती तो क्या उसके द्वारा तैयार किये युवा अपने कार्यो तथा कार्यालयों में भ्रष्टाचार को इस कदर पनपते देते?
बी सवीं शताब्दी में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति तथा राजनीतिक परिदृश्य में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों का सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचना पर गहन प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। हर तरफ यह स्वीकार किया गया कि मानवीय सम्मान हर व्यक्ति को बराबरी से मिलना चाहिए, उसे मानवीय अधिकार मिलने चाहिए और समानता के अवसर हर कार्यक्षेत्र में उपलब्ध होने चाहिए। इन सभी वैश्विक मानवीय अपेक्षाओं के लिए रास्ता एक ही था। हर व्यक्ति को शिक्षा, हर बच्चे को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की उपलब्धता तथा उच्च एवं व्यावसायिक स्तर पर अभिरुचि तथा योग्यता के आधार पर अध्ययन की व्यवस्था तथा अवसर देना आवश्यक माना गया। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय 20 प्रतिशत की साक्षरता दर आज 70 के आसपास मानी जाती है- यानी शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ है। जनसंख्या भी इसी दौरान तीन गुणा से अधिक बढ़ी। शैक्षिक प्रगति का मूल्यांकन-परीक्षण करते समय इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन मुख्य प्रश्न इसके प्रतिशत तथा संख्या वृद्धि से-परे उभरते है। क्या शिक्षा हर बच्चे के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास में अपना उत्तरदायित्व निर्वाह कर पा रही है और क्या शिक्षा संस्थाएं उदात्त राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति में ईमानदारी तथा कर्मठता से लगी है? यह जिज्ञासा किसी के भी सामने रखी जाए, वह तुरंत ही इसका उत्तर देने को उत्सुक दिखाई देगा। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने जिम्मेदार नागरिक तैयार किये होते तो क्या जीवन के हर कार्य क्षेत्र में मूल्यों का इतना क्षरण दिखाई देता? क्या शिक्षा के प्रसार के साथ भ्रष्टाचार दिन दोगुना, रात चौगुना बढ़ता? यदि शिक्षा व्यवस्था मूल्यों तथा नैतिकता के आधार पर चल रही होती तो क्या उसके द्वारा तैयार किये युवा अपने कार्यो तथा कार्यालयों में भ्रष्टाचार को इस कदर पनपते देते? क्या राजनेताओं को वर्तमान पीड़ा जनमानस में स्वार्थ-लोलुप समूह के रूप में अपनी पहचान बनाती। इस स्थिति में पहुंचने के कारण स्पष्ट है- शिक्षा व्यवस्था अपने उत्तरदायित्यों की गरिमा को नहीं पहचान पायी समय के साथ अपने में गतिशीलता समाहित नहीं कर पायी तथा समाज में बदलती तथा बड़े स्तर पर उभरती अपेक्षाओं को समझकरअपने को उसके अनुकूल नहीं ढाल सकी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की शिक्षा व्यवस्था के उद्देश्य अलग थे। उनमें आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक था- जो नहीं हुआ, यद्यपि भारत के सर्वहारा को ध्यान में रखकर गांधी जी द्वारा दिखाया गया ‘बेसिक शिक्षा’ का सारा ढांचा देश के समक्ष उपस्थित था। सरकारी तंत्र में उसे बिना कहे धीरे से नकार दिया। 1964-66 में कोठारी आयोग की रिपोर्ट आयी जो अनेक दूरगामी सुझावों के लिए आगे भी जानी जाती रहेगी। उसमें एक सुझाव समान स्कूल व्यवस्था (कॉमन स्कूल सिस्टम) का था। आज भी सरकारी दस्तावेज इस संकल्पना का समय-समय पर प्रयोग कर लेते है मगर इसे लागू करने के लिए जिस ईमानदार तथा साहसपूर्ण संकल्प की आवश्यकता थी, वह कहीं कभी दिखाई नहीं पड़ी है। परिणामस्वरूप आज भारत की शिक्षा व्यवस्था स्कूल स्तर पर दो पूरी तरह अलग खण्डों में बंट गयी है जिनके बीच की खाई हर वर्ष बढ़ती ही जा रही है। 20 प्रतिशत लोगों के बच्चों के लिए पब्लिक स्कूल, केन्द्रीय विद्यालय, सैनिक स्कूल आदि व्यवस्थाएं है। शेष 80 प्रतिशत के लिए सरकारी स्कूल है जिनके अच्छे ढंग से चलने का उत्तरदायित्व उन लोगों पर है जो अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ाते। यह बढ़ती हुई खाई का केन्द्र बिन्दु है। देश के अधिकतर गरीबों, सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो तथा दलित समुदाय के बच्चे सरकारी स्कूलों में है। यहां रखरखाव. उपकरण, पुस्तकालय उचित संख्या में अध्यापक, पीने का पानी, शौचालय जैसी व्यवस्थाएं निम्नतम स्तर पर देखी जाती है। यदि वातावरण उपयुक्त नहीं होगा तो शिक्षा सम्पूर्णता कैसे प्राप्त करेगी। यदि अध्यापक समय पालन नहीं करता है तो विद्यार्थी आगे चलकर समय का पाबंद कैसे होगा और क्यों होगा। यदि समाज जानता है कि अध्यापकों की नियुक्ति में पारदर्शिता नहीं है तथा उनकी नियुक्ति भ्रष्ट तरीकों से होती है तब अध्यापक को परम्परागत सम्मान कैसे मिलेगा? जो व्यक्ति किसी भी स्तर पर अध्यापक बनता ही गलत तरीकों से है- जो उसकी मजबूती है- तो उससे यह अपेक्षा करना व्यर्थ ही होगा कि नैतिक मूल्यों का प्रय8पूर्वक पालन करेगा और अपने विद्यार्थियों में वही गुण निर्मित करने का प्रयास करेगा। उसका अपना मनोबल प्रारम्भ से ही नीचे आ जाएगा और व्यवस्था को जड़ों से कमजोर होने की प्रक्रिया में वह जाने अनजाने भागीदार बन जाएगा। भारतीय समाज का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व था कि गरीब तबके के लोगों को तथा पूरे वंचित वर्ग को ऊपर लाया जाए-उन्हें शिक्षा के द्वारा ही आगे लाया जा सकता है। जब स्कूल में अपने नैतिक तथा सामाजिक दायित्व के निर्वाह के लिए आवश्यक प्रतिबद्धता का वातावरण ही नहीं बनेगा तब यह लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त कर सकने की सम्भावना कैसे फलीभूत हो सकती है। जनजाति अनुसूचित जन जाति तथा अन्य दलित और वंचित वर्गो को इसी कारण उचित स्तर तथा गुणवत्ता की शिक्षा तथा कौशलों से परिचय प्राप्त नहीं हो रहा है। देश के जो स्कूल साधन सम्पन्न है, वे अब केवल उन लोगों के लिए एक प्रकार से सुरक्षित है जो साधन सम्पन्न, सत्ता सम्पन्न तथा आवश्यक रसूख वाले है। यदि ऐसा न होता तो नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश को लेकर लगभग प्रतिवर्ष ‘नूरा-कुश्ती’ की तर्ज पर दिल्ली सरकार तथा ‘पब्लिक स्कूलों’ के बीच प्रवेश की शर्तो को लेकर रस्साकशी नहीं होती। कई वर्ष पहले से दिल्ली उच्च न्यायालय ने नर्सरी कक्षाओं में एक नियत प्रतिशत स्थान आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करने का निर्देश दिया है, डोनेशन देने- लेने पर प्रतिबंध है। बच्चे या माता-पिता का साक्षात्कार अस्वीकार है। अब शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुसार 25 प्रतिशत स्थान कक्षा एक में वंचित वर्ग के लिए आरक्षित होते है। सभी जानते है कि किसी भी आदेश, निर्देश या परिपत्र का पालन पब्लिक स्कूल नहीं करते है। वे अनेक विकल्प सुझाते है, उनकी समकक्षता के ढिंढोरे पीटते है मगर वंचित वर्ग के बच्चों को सम्पन्न घरों से आये बच्चों के साथ बैठाकर पढ़ाने को तैयार नहीं होते है। सरकार की असमर्थता लगभग निरीहता में परिवर्तित हो जाती है। यदि सरकारें स्वयं ईमानदारी से कार्य करें, प्रतिबद्धता दिखायें तथा साहसपूर्वक नियमों को लागू करायें तो ऐसी स्थिति निर्मित्त हो ही नहीं सकती थी। आज भी इसे ठीक किया जा सकता है। अधिकतर ‘पब्लिक स्कूल’
खुलेआम धनार्जन का जरिया हो गये है, वे मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते है, सरकारी आदेशों को धता बता देते है, अध्यापकों को छठे वेतन आयोग के अनुसार प्रावधान करने के नाम पर फीस बढ़ाते है, मगर वेतनमान नहीं देते। ये वही नामी-गिरामी स्कूल है जो सरकार से सारी सुविधाएं सामान्य जन के बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर लेते है, प्रारम्भ में सभी सरकारी प्रावधानों को मानने का वादा करते है मगर बाद में मनमानी करते है। विडम्बना यह है कि वे नेता तथा अधिकारी जो नीतियां बनाते है, उनका क्रियान्वयन करने के जिम्मेदार है, वे सभी इन्हीं स्कूलों में प्रवेश प्राप्त कराने के लिए कभी न कभी पहुंचे रहते है। यही कारण है कि इन स्कूलों को गुणवत्ता बढ़ाने वाला माना जाता है तथा सरकारी पुरस्कारों का रुख अक्सर इन्हीं की ओर मुड़ जाता है। वैसे नर्सरी की शिक्षा देश में बहुत थोड़े बच्चों को ही उपलब्ध है मगर इस पर चर्चा के कारण बड़े-बड़े मुद्दे भी सामने आते है। कक्षा एक में भारत सरकार 25 प्रतिशत बच्चों की फीस पब्लिक स्कूलों को देने को तैयार है मगर स्कूल बच्चों को नहीं लेना चाहते है। संविधान की भावना तथा उसमें निहित भाव हर संस्था तथा नागरिक पर ये उत्तरदायित्व डालते है कि वे वंचित एवं दलित वर्ग के उत्थान में भाग लें। फिर इन स्कूलों का रवैया समाजविरोधी क्यों निरूपित नहीं किया जाता है; नियमों की अवहेलना क्या केवल 80 प्रतिशत के लिए ही अपराध है, बाकी के लिए नहीं? मेरा दृढ़ विश्वास है कि किसी भी देश की प्रगति का मार्ग उसके प्राथमिक विद्यालयों के दरवाजों से होकर जाता है। स्कूल शिक्षा में सुधार का पहला बिन्दु समान स्कूल व्यवस्था तथा यह प्रावधान होना चाहिए कि हर सरकारी कर्मचारी के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ेंगे। सरकार में इसके विरोध को झेलने का साहस होना चाहिए। जब स्कूल शिक्षा बढ़ेगी तब उच्च शिक्षा पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा और उसका विस्तार करना होगा। उच्च शिक्षा में संसाधन आवश्यक सीमा तक सरकार नहीं दे सकती है; अत: निजी संस्थाएं खुलीं और खूब खुलीं- लोगों ने भ्रष्ट व्यवस्था में वे सब तरीके निकाल लिये जिससे स्वीकृतियां ‘खरीदी’ गयीं। राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रही नियामक संस्थाएं साख के निम्नतम स्तर पर पहुंच गयी है। डीम्ड विश्वविद्यालय जैसे खेल- सारा देश जानता है। समस्या उसके आगे की है। बिना अध्यापकों के, बिना उचित ज्ञान कौशल दिये लोगों को डिग्री मिल जाती है। बाद में युवाओं को प्रतिस्पर्धा की दुनिया में जो हताशा मिलती है उसकी चिन्ता विश्वविद्यालय के ‘मालिक’ तथा नियामक संस्थाओं के कर्ताधर्ता क्यों करें?( लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक है)
यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने जिम्मेदार नागरिक तैयार किये होते तो क्या जीवन के हर कार्य क्षेत्र में मूल्यों का इतना क्षरण दिखाई देता? यदि शिक्षा व्यवस्था मूल्यों तथा नैतिकता के आधार पर चल रही होती तो क्या उसके द्वारा तैयार किये युवा अपने कार्यो तथा कार्यालयों में भ्रष्टाचार को इस कदर पनपते देते?
बी सवीं शताब्दी में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति तथा राजनीतिक परिदृश्य में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों का सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचना पर गहन प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। हर तरफ यह स्वीकार किया गया कि मानवीय सम्मान हर व्यक्ति को बराबरी से मिलना चाहिए, उसे मानवीय अधिकार मिलने चाहिए और समानता के अवसर हर कार्यक्षेत्र में उपलब्ध होने चाहिए। इन सभी वैश्विक मानवीय अपेक्षाओं के लिए रास्ता एक ही था। हर व्यक्ति को शिक्षा, हर बच्चे को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की उपलब्धता तथा उच्च एवं व्यावसायिक स्तर पर अभिरुचि तथा योग्यता के आधार पर अध्ययन की व्यवस्था तथा अवसर देना आवश्यक माना गया। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय 20 प्रतिशत की साक्षरता दर आज 70 के आसपास मानी जाती है- यानी शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ है। जनसंख्या भी इसी दौरान तीन गुणा से अधिक बढ़ी। शैक्षिक प्रगति का मूल्यांकन-परीक्षण करते समय इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन मुख्य प्रश्न इसके प्रतिशत तथा संख्या वृद्धि से-परे उभरते है। क्या शिक्षा हर बच्चे के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास में अपना उत्तरदायित्व निर्वाह कर पा रही है और क्या शिक्षा संस्थाएं उदात्त राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति में ईमानदारी तथा कर्मठता से लगी है? यह जिज्ञासा किसी के भी सामने रखी जाए, वह तुरंत ही इसका उत्तर देने को उत्सुक दिखाई देगा। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने जिम्मेदार नागरिक तैयार किये होते तो क्या जीवन के हर कार्य क्षेत्र में मूल्यों का इतना क्षरण दिखाई देता? क्या शिक्षा के प्रसार के साथ भ्रष्टाचार दिन दोगुना, रात चौगुना बढ़ता? यदि शिक्षा व्यवस्था मूल्यों तथा नैतिकता के आधार पर चल रही होती तो क्या उसके द्वारा तैयार किये युवा अपने कार्यो तथा कार्यालयों में भ्रष्टाचार को इस कदर पनपते देते? क्या राजनेताओं को वर्तमान पीड़ा जनमानस में स्वार्थ-लोलुप समूह के रूप में अपनी पहचान बनाती। इस स्थिति में पहुंचने के कारण स्पष्ट है- शिक्षा व्यवस्था अपने उत्तरदायित्यों की गरिमा को नहीं पहचान पायी समय के साथ अपने में गतिशीलता समाहित नहीं कर पायी तथा समाज में बदलती तथा बड़े स्तर पर उभरती अपेक्षाओं को समझकरअपने को उसके अनुकूल नहीं ढाल सकी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की शिक्षा व्यवस्था के उद्देश्य अलग थे। उनमें आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक था- जो नहीं हुआ, यद्यपि भारत के सर्वहारा को ध्यान में रखकर गांधी जी द्वारा दिखाया गया ‘बेसिक शिक्षा’ का सारा ढांचा देश के समक्ष उपस्थित था। सरकारी तंत्र में उसे बिना कहे धीरे से नकार दिया। 1964-66 में कोठारी आयोग की रिपोर्ट आयी जो अनेक दूरगामी सुझावों के लिए आगे भी जानी जाती रहेगी। उसमें एक सुझाव समान स्कूल व्यवस्था (कॉमन स्कूल सिस्टम) का था। आज भी सरकारी दस्तावेज इस संकल्पना का समय-समय पर प्रयोग कर लेते है मगर इसे लागू करने के लिए जिस ईमानदार तथा साहसपूर्ण संकल्प की आवश्यकता थी, वह कहीं कभी दिखाई नहीं पड़ी है। परिणामस्वरूप आज भारत की शिक्षा व्यवस्था स्कूल स्तर पर दो पूरी तरह अलग खण्डों में बंट गयी है जिनके बीच की खाई हर वर्ष बढ़ती ही जा रही है। 20 प्रतिशत लोगों के बच्चों के लिए पब्लिक स्कूल, केन्द्रीय विद्यालय, सैनिक स्कूल आदि व्यवस्थाएं है। शेष 80 प्रतिशत के लिए सरकारी स्कूल है जिनके अच्छे ढंग से चलने का उत्तरदायित्व उन लोगों पर है जो अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ाते। यह बढ़ती हुई खाई का केन्द्र बिन्दु है। देश के अधिकतर गरीबों, सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो तथा दलित समुदाय के बच्चे सरकारी स्कूलों में है। यहां रखरखाव. उपकरण, पुस्तकालय उचित संख्या में अध्यापक, पीने का पानी, शौचालय जैसी व्यवस्थाएं निम्नतम स्तर पर देखी जाती है। यदि वातावरण उपयुक्त नहीं होगा तो शिक्षा सम्पूर्णता कैसे प्राप्त करेगी। यदि अध्यापक समय पालन नहीं करता है तो विद्यार्थी आगे चलकर समय का पाबंद कैसे होगा और क्यों होगा। यदि समाज जानता है कि अध्यापकों की नियुक्ति में पारदर्शिता नहीं है तथा उनकी नियुक्ति भ्रष्ट तरीकों से होती है तब अध्यापक को परम्परागत सम्मान कैसे मिलेगा? जो व्यक्ति किसी भी स्तर पर अध्यापक बनता ही गलत तरीकों से है- जो उसकी मजबूती है- तो उससे यह अपेक्षा करना व्यर्थ ही होगा कि नैतिक मूल्यों का प्रय8पूर्वक पालन करेगा और अपने विद्यार्थियों में वही गुण निर्मित करने का प्रयास करेगा। उसका अपना मनोबल प्रारम्भ से ही नीचे आ जाएगा और व्यवस्था को जड़ों से कमजोर होने की प्रक्रिया में वह जाने अनजाने भागीदार बन जाएगा। भारतीय समाज का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व था कि गरीब तबके के लोगों को तथा पूरे वंचित वर्ग को ऊपर लाया जाए-उन्हें शिक्षा के द्वारा ही आगे लाया जा सकता है। जब स्कूल में अपने नैतिक तथा सामाजिक दायित्व के निर्वाह के लिए आवश्यक प्रतिबद्धता का वातावरण ही नहीं बनेगा तब यह लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त कर सकने की सम्भावना कैसे फलीभूत हो सकती है। जनजाति अनुसूचित जन जाति तथा अन्य दलित और वंचित वर्गो को इसी कारण उचित स्तर तथा गुणवत्ता की शिक्षा तथा कौशलों से परिचय प्राप्त नहीं हो रहा है। देश के जो स्कूल साधन सम्पन्न है, वे अब केवल उन लोगों के लिए एक प्रकार से सुरक्षित है जो साधन सम्पन्न, सत्ता सम्पन्न तथा आवश्यक रसूख वाले है। यदि ऐसा न होता तो नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश को लेकर लगभग प्रतिवर्ष ‘नूरा-कुश्ती’ की तर्ज पर दिल्ली सरकार तथा ‘पब्लिक स्कूलों’ के बीच प्रवेश की शर्तो को लेकर रस्साकशी नहीं होती। कई वर्ष पहले से दिल्ली उच्च न्यायालय ने नर्सरी कक्षाओं में एक नियत प्रतिशत स्थान आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करने का निर्देश दिया है, डोनेशन देने- लेने पर प्रतिबंध है। बच्चे या माता-पिता का साक्षात्कार अस्वीकार है। अब शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुसार 25 प्रतिशत स्थान कक्षा एक में वंचित वर्ग के लिए आरक्षित होते है। सभी जानते है कि किसी भी आदेश, निर्देश या परिपत्र का पालन पब्लिक स्कूल नहीं करते है। वे अनेक विकल्प सुझाते है, उनकी समकक्षता के ढिंढोरे पीटते है मगर वंचित वर्ग के बच्चों को सम्पन्न घरों से आये बच्चों के साथ बैठाकर पढ़ाने को तैयार नहीं होते है। सरकार की असमर्थता लगभग निरीहता में परिवर्तित हो जाती है। यदि सरकारें स्वयं ईमानदारी से कार्य करें, प्रतिबद्धता दिखायें तथा साहसपूर्वक नियमों को लागू करायें तो ऐसी स्थिति निर्मित्त हो ही नहीं सकती थी। आज भी इसे ठीक किया जा सकता है। अधिकतर ‘पब्लिक स्कूल’
खुलेआम धनार्जन का जरिया हो गये है, वे मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते है, सरकारी आदेशों को धता बता देते है, अध्यापकों को छठे वेतन आयोग के अनुसार प्रावधान करने के नाम पर फीस बढ़ाते है, मगर वेतनमान नहीं देते। ये वही नामी-गिरामी स्कूल है जो सरकार से सारी सुविधाएं सामान्य जन के बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर लेते है, प्रारम्भ में सभी सरकारी प्रावधानों को मानने का वादा करते है मगर बाद में मनमानी करते है। विडम्बना यह है कि वे नेता तथा अधिकारी जो नीतियां बनाते है, उनका क्रियान्वयन करने के जिम्मेदार है, वे सभी इन्हीं स्कूलों में प्रवेश प्राप्त कराने के लिए कभी न कभी पहुंचे रहते है। यही कारण है कि इन स्कूलों को गुणवत्ता बढ़ाने वाला माना जाता है तथा सरकारी पुरस्कारों का रुख अक्सर इन्हीं की ओर मुड़ जाता है। वैसे नर्सरी की शिक्षा देश में बहुत थोड़े बच्चों को ही उपलब्ध है मगर इस पर चर्चा के कारण बड़े-बड़े मुद्दे भी सामने आते है। कक्षा एक में भारत सरकार 25 प्रतिशत बच्चों की फीस पब्लिक स्कूलों को देने को तैयार है मगर स्कूल बच्चों को नहीं लेना चाहते है। संविधान की भावना तथा उसमें निहित भाव हर संस्था तथा नागरिक पर ये उत्तरदायित्व डालते है कि वे वंचित एवं दलित वर्ग के उत्थान में भाग लें। फिर इन स्कूलों का रवैया समाजविरोधी क्यों निरूपित नहीं किया जाता है; नियमों की अवहेलना क्या केवल 80 प्रतिशत के लिए ही अपराध है, बाकी के लिए नहीं? मेरा दृढ़ विश्वास है कि किसी भी देश की प्रगति का मार्ग उसके प्राथमिक विद्यालयों के दरवाजों से होकर जाता है। स्कूल शिक्षा में सुधार का पहला बिन्दु समान स्कूल व्यवस्था तथा यह प्रावधान होना चाहिए कि हर सरकारी कर्मचारी के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ेंगे। सरकार में इसके विरोध को झेलने का साहस होना चाहिए। जब स्कूल शिक्षा बढ़ेगी तब उच्च शिक्षा पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा और उसका विस्तार करना होगा। उच्च शिक्षा में संसाधन आवश्यक सीमा तक सरकार नहीं दे सकती है; अत: निजी संस्थाएं खुलीं और खूब खुलीं- लोगों ने भ्रष्ट व्यवस्था में वे सब तरीके निकाल लिये जिससे स्वीकृतियां ‘खरीदी’ गयीं। राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रही नियामक संस्थाएं साख के निम्नतम स्तर पर पहुंच गयी है। डीम्ड विश्वविद्यालय जैसे खेल- सारा देश जानता है। समस्या उसके आगे की है। बिना अध्यापकों के, बिना उचित ज्ञान कौशल दिये लोगों को डिग्री मिल जाती है। बाद में युवाओं को प्रतिस्पर्धा की दुनिया में जो हताशा मिलती है उसकी चिन्ता विश्वविद्यालय के ‘मालिक’ तथा नियामक संस्थाओं के कर्ताधर्ता क्यों करें?( लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक है)
हर तीन किमी पर एक जूनियर हाईस्कूल होगा
लखनऊ। प्रदेश में अब प्रत्येक एक किलोमीटर पर प्राथमिक और तीन किलोमीटर पर उच्च प्राथमिक विद्यालय (जूनियर हाईस्कूल) खोला जाएगा। सर्व शिक्षा अभियान के राज्य परियोजना निदेशालय ने बेसिक शिक्षा अधिकारियों से नए मानक के आधार पर स्कूल खोलने का प्रस्ताव मांगा है। सूची के आधार पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्रस्ताव भेजकर धनराशि की मांग की जाएगी।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मुताबिक, प्रत्येक किलोमीटर पर प्राथमिक और डेढ़ किलोमीटर पर उच्च प्राथमिक स्कूल खोलने का मानक निर्धारित किया गया था। राज्य सरकार ने आबादी के आधार पर कर दिया था। इसमें 300 की आबादी पर प्राथमिक और 500 की आबादी पर उच्च प्राथमिक विद्यालय खोलने का प्रस्ताव मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संयुक्त सचिव अनीता कौल के सामने प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि आबादी के आधार पर मानक न बनाया जाए। फिर राज्य ने आबादी के हिसाब से पांच हजार प्राथमिक और एक हजार उच्च प्राथमिक विद्यालय खोलने का प्रस्ताव केंद्र को भेज दिया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। केंद्र से प्रस्ताव वापस आने के बाद सर्व शिक्षा अभियान के राज्य परियोजना निदेशालय ने नए सिरे से मानक निर्धारित किए। इसके अनुसार, एक किमी में प्राथमिक और तीन किमी के दायरे में उच्च प्राथमिक विद्यालय खोलने का निर्णय किया गया है। राज्य परियोजना निदेशालय के निदेशक के राम मोहन राव ने प्रदेश के सभी बीएसए को पत्र भेजकर इसके आधार पर ही नए स्कूल खोलने का प्रस्ताव देने को कहा है। पत्र में यह भी कहा गया है कि नए स्कूलों के लिए जो भी प्लान तैयार किया जाए, उसमें ब्लॉक वार मानचित्र भी दिया जाए।
Wednesday, December 22, 2010
विधि कॉलेजों की मान्यता की जांच करेगी सीबीआइ
उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद के ग्लोबल कॉलेज ऑफ लॉ के लिए रिश्वत की लेन-देन तो महज बानगी है। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की तरह विधि कॉलेजों को मान्यता देने में बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी के संकेत मिले हैं। सीबीआइ की मानें तो रिश्वत लेकर विधि कॉलेजों को मान्यता देने का रैकेट पूरे देश में फैला है। विधि कॉलेजों को मान्यता देने और सीटें निर्धारित करने का काम बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआइ) के जिम्मे है। सूत्रों के मुताबिक जल्द ही अन्य कॉलेजों को मान्यता देने के मामले में भी आरोपियों के खिलाफ नई एफआइआर दर्ज की जा सकती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बीसीआइ के सदस्य राजेंद्र राणा और उपाध्यक्ष आर धनपाल राज के घर और बीसीआइ के दफ्तर से मिले दस्तावेज मान्यता देने के नाम पर चल रहे गोरखधंधे की पोल खोलने के लिए काफी हैं। धनपाल राज के चेन्नई स्थित घर पर मारे गए छापे के दौरान करोड़ों रुपये की नामी-बेनामी संपत्ति के अलावा 75 लाख रुपये नकद मिले हैं। यह रकम रिश्वत की हो सकती है। सीबीआइ ने पिछले साल अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) के अध्यक्ष और इस साल मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआइ) के अध्यक्ष के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर छापा मारा था। इनसे मिले दस्तावेजों के आधार पर 40 से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेजों और 12 से अधिक मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने में गड़बड़ी के आरोप में एफआइआर दर्ज की जा चुकी हैं। सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बीसीआइ मुख्यालय और उसके अधिकारियों के यहां से बरामद दस्तावेजों की पड़ताल की जा रही है। इसके साथ ही पिछले कुल सालों में जिन-जिन विधि कॉलेजों को मान्यता दी गई है, उनसे संबंधित फाइलों की भी जांच की जाएगी और गड़बड़ी पाए जाने पर नई एफआइआर दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
Tuesday, December 21, 2010
अब विश्वविद्यालयों में तैयार होंगे शेयर ब्रोकर
कभी अमीरों का शौक रहा शेयर कारोबार अब हर खासो-आम तक पहुंच गया है। इसमें आमदनी की बेहतरीन संभावनाओं को देखते हुए आज आम आदमी भी अपनी गाढ़ी कमाई का कुछ हिस्सा निवेश करने से नहीं चूक रहा है। शेयरों के प्रति लगातार बढ़ रहे इस आकर्षण के चलते शेयर व वित्त बाजार का बड़ी तेजी से विस्तार हो रहा है। इसके लिए बड़ी संख्या में जरूरी पेशेवर अब विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तैयार होंगे। इसके लिए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) अब प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों व कालेजों की मदद लेने जा रहा है। योजना के अनुसार शेयर ब्रोकर, स्टॉक मार्केट एजेंट, डिस्ट्रीब्यूटर्स जैसे कैपिटल मार्केट पेशेवर अब विश्वविद्यालयों व कालेजों में तैयार होंगे। दरअसल, एनएसई वर्ष 1998 से शेयर व पूंजी बाजार के लिए प्रोफेशनल तैयार कर रहा है। इसके लिए एनएसई सर्टिफिकेशन इन फाइनेंशियल मार्केट्स (एनसीएफएम) के पाठ्यक्रम शुरू किए गए थे। इसमें देश भर में फैले केंद्रों पर इंटरनेट के जरिए व्यक्ति की दक्षता की जांच कर प्रमाणपत्र दिए जाते रहे हैं। ये प्रमाणपत्र स्टॉक एक्सचेंज से जुड़ी नौकरियों व कारोबार के लिए जरूरी हैं। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने भी वित्तीय कारोबार में आने वाले हर पेशेवर के लिए पढ़ाई अनिवार्य कर दी है। कैपिटल मार्केट के भारी विस्तार को देखते हुए एनएसई ने अगस्त, 2009 में इस कार्य में प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थाओं को भी शामिल करने का प्रस्ताव किया था। अब इसे अमली जामा पहनाया जा रहा है। एनएसई सर्टीफाइड मार्केट प्रोफेशनल्स नामक इस स्कीम के तहत तीन से चार माह के सर्टिफिकेट कोर्स व एक वर्ष तक के डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित होने हैं। इसमें छात्रों को एनएसई व संबंधित कॉलेज का संयुक्त प्रमाण पत्र दिया जाएगा। फिलहाल, इस पाठ्यक्रम के साथ देश के बड़े महानगरों के आठ कॉलेज जुड़ चुके हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के डीन प्रो. एके. मिश्रा के अनुसार उत्तर प्रदेश में अभी इसकी शुरुआत होनी है। यह विद्यापीठ भी इस पाठ्यक्रम को संचालित करने के लिए कतार में है।
Sunday, December 19, 2010
भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के आने की आहट
डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल अपनी धून के पक्के हैं इस बार उन्होंने भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को स्थापित करने की जिद पकडी है। जाहिर है कि उनकी इस जिद के पीछे किसी ताकतवर का हाथ भी होगा। जैसे हालात चल रहे हैं उससे संकेत मिलते हैं कि यह ताकतवर हाथ सोनिया गांधी का हीं हो सकता है। कांग्रेस में सोनिया से ज्यादा ताकतवर हाथ किसी का नहीं है और बिनाक कांग्रेस के समर्थन के कपिल सिब्बल विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में लाने की इतनी जिद न करते। अब जब उन्होंने अमेरिका और इंग्लैंड के विश्व विद्यालयों को भारत में लाने की ठान ही ली है तो जाहिर है कि उससे पहले भारत के विश्वविद्यालयों को अपंग बनाना जरूरी है ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि देश की उन्नति के लिए ये अपंग विश्वविद्यालय कुछ नहीं कर सकते। देश को दिशा देने के लिए विदेशों के चुस्त-दुरुस्त विश्वविद्यालय यहां लाना जरूरी है। कें द्र सरकार ने पिछले दिनों देश भर में 15 के लगभग केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किए है। उन विश्वविद्यालयों के लिए ना तो अभी आधारभूत संरचना बन पाई है, न ही पाठ्यक्रम ही तैयार हो पाया हैं और न ही अध्यापकों की नियुक्ति हुई है। लेकिन केंद्र सरकार ने आनन-फानन में 15 कुलपतियों की नियुक्ति कर दी है और उन कुलपतियों ने अपने ई-मेल पर हीं अनेक पाठ्यक्रमों के लिए आवेदन आमंत्रित करने शुरू कर दिए हैं और अध्याापकों की नियुक्ति कांट्रेक्ट पर की जा रही है। एक ओर तो कपिल सिब्बल इस प्रकार के आदर्श विश्वविद्यालय खोल रहे हैं और दूसरी ओर स्वयं हीं रोना शुरू कर देते हैं कि भारतीय विश्वविद्यालयों का स्तर काफी नीचे गिर गया है और उसकी भरपाई के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित करना लाजमी हो चुका है। इस पूरे खेल में एक और पेंच भी सामने आ रहा है। कपिल सिब्बल इसी आपा-धापी में भारतीय परंपरा के अनुसार शिक्षा प्रदान कर रहे विश्वविद्यालयों को समाप्त करना चाह रहे है।
पिछले दिनों जिन विश्वविद्यालयों को अपने घटिया स्तर के कारण बंद करने का नोटिस दिया गया है उसमें विश्वविख्यात गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय भी है। ध्यान रहे की यह वही विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना मैकाले की शिक्षा पद्धति का उत्तार देने के लिए स्वामी श्रध्दाानंद ने की थी, जिसकी प्रशंसा महात्मा गांधी ने स्वयं विश्वविद्यालय में आकर की और जिसके शिक्षा मॉडल की विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए स्वयं इंगलैंड के प्रधानमंत्री यहां आए थे। कपिल सिब्बल को यदि विश्वविद्यालयों की इतनी ही चिंता है तो उन्हें इन विश्वविद्यालयों की गुणवत्ताा सुधारने के लिए प्रकल्प लाना चाहिए था। आज भारतीय विश्वविद्यालयों में नए प्राध्यापकों की भर्ति नहीं हो रही है। वहीं अंग्रेजों के जमाने का पुराना पाठ्यक्रम पढाया जा रहा है€। सरकार इन विश्वविद्यालयों को वित्तीय सहायता देने के लिए तैयार नहीं है। दरअसल, कपिल सिब्बल भारतीय विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता की चर्चा की आढ में विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में लाने का रास्ता साफ कर रहे हैं। यदि ये मान लिया जाए कि भारतीय विश्वविद्यालयों का स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो क्या उसका उत्तर विदेशी विश्वविद्यालयों से देना होगा?
दरअसल, जब भारत में विदेशी विश्वविद्यालय आ जाएंगे तो कपिल सिब्बल जैसे लोग भारतीय विश्वविद्यालयों के स्वास्थ्य को लेकर और भी चिल्लाना शुरू कर देंगे। उनका तर्क होगा कि भारत के ये विश्वविद्यालय विदेशी विश्वविद्यालयों से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। इस अखाडे में वे उन्हें पराजित घोषित कर देंगे। और फिर या तो इन्हें बंद करने का फरमान सुना देंगे या फिर इनको ठेके पर उन्हीं प्राइवेट कंपनियों को सौंप देंगे, जो आज भी जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट विश्वविद्यालय खोलकर अपनी जीत का जश्न मना रही है।
प्रश्न यह है कि ये विदेशी विश्वविद्यालय भारत में किस प्रकार की शिक्षा प्रदान करेंगे और उन्हें किस प्रकार के संस्कार देंगे। कपिल सिब्बल मैकाले के उसी सूत्र को नंगे रूप में आगे बढा रहे हैं जिस सूत्र ने भारतीय लोगों की आत्मा को अंग्रेजी बनाने का स्वप्न देखा था। जहां तक बात है अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण की, तो जो सरकार 15 हजार लोगों की हत्या कर देने वाले एक अमेरिकी एंडरसन पर नियंत्रण नहीं कर सकी वह इन विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण कैसे कर पायेगी?
मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल अपनी धून के पक्के हैं इस बार उन्होंने भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को स्थापित करने की जिद पकडी है। जाहिर है कि उनकी इस जिद के पीछे किसी ताकतवर का हाथ भी होगा। जैसे हालात चल रहे हैं उससे संकेत मिलते हैं कि यह ताकतवर हाथ सोनिया गांधी का हीं हो सकता है। कांग्रेस में सोनिया से ज्यादा ताकतवर हाथ किसी का नहीं है और बिनाक कांग्रेस के समर्थन के कपिल सिब्बल विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में लाने की इतनी जिद न करते। अब जब उन्होंने अमेरिका और इंग्लैंड के विश्व विद्यालयों को भारत में लाने की ठान ही ली है तो जाहिर है कि उससे पहले भारत के विश्वविद्यालयों को अपंग बनाना जरूरी है ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि देश की उन्नति के लिए ये अपंग विश्वविद्यालय कुछ नहीं कर सकते। देश को दिशा देने के लिए विदेशों के चुस्त-दुरुस्त विश्वविद्यालय यहां लाना जरूरी है। कें द्र सरकार ने पिछले दिनों देश भर में 15 के लगभग केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किए है। उन विश्वविद्यालयों के लिए ना तो अभी आधारभूत संरचना बन पाई है, न ही पाठ्यक्रम ही तैयार हो पाया हैं और न ही अध्यापकों की नियुक्ति हुई है। लेकिन केंद्र सरकार ने आनन-फानन में 15 कुलपतियों की नियुक्ति कर दी है और उन कुलपतियों ने अपने ई-मेल पर हीं अनेक पाठ्यक्रमों के लिए आवेदन आमंत्रित करने शुरू कर दिए हैं और अध्याापकों की नियुक्ति कांट्रेक्ट पर की जा रही है। एक ओर तो कपिल सिब्बल इस प्रकार के आदर्श विश्वविद्यालय खोल रहे हैं और दूसरी ओर स्वयं हीं रोना शुरू कर देते हैं कि भारतीय विश्वविद्यालयों का स्तर काफी नीचे गिर गया है और उसकी भरपाई के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रित करना लाजमी हो चुका है। इस पूरे खेल में एक और पेंच भी सामने आ रहा है। कपिल सिब्बल इसी आपा-धापी में भारतीय परंपरा के अनुसार शिक्षा प्रदान कर रहे विश्वविद्यालयों को समाप्त करना चाह रहे है।
पिछले दिनों जिन विश्वविद्यालयों को अपने घटिया स्तर के कारण बंद करने का नोटिस दिया गया है उसमें विश्वविख्यात गुरूकुल कांगडी विश्वविद्यालय भी है। ध्यान रहे की यह वही विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना मैकाले की शिक्षा पद्धति का उत्तार देने के लिए स्वामी श्रध्दाानंद ने की थी, जिसकी प्रशंसा महात्मा गांधी ने स्वयं विश्वविद्यालय में आकर की और जिसके शिक्षा मॉडल की विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए स्वयं इंगलैंड के प्रधानमंत्री यहां आए थे। कपिल सिब्बल को यदि विश्वविद्यालयों की इतनी ही चिंता है तो उन्हें इन विश्वविद्यालयों की गुणवत्ताा सुधारने के लिए प्रकल्प लाना चाहिए था। आज भारतीय विश्वविद्यालयों में नए प्राध्यापकों की भर्ति नहीं हो रही है। वहीं अंग्रेजों के जमाने का पुराना पाठ्यक्रम पढाया जा रहा है€। सरकार इन विश्वविद्यालयों को वित्तीय सहायता देने के लिए तैयार नहीं है। दरअसल, कपिल सिब्बल भारतीय विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता की चर्चा की आढ में विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में लाने का रास्ता साफ कर रहे हैं। यदि ये मान लिया जाए कि भारतीय विश्वविद्यालयों का स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो क्या उसका उत्तर विदेशी विश्वविद्यालयों से देना होगा?
दरअसल, जब भारत में विदेशी विश्वविद्यालय आ जाएंगे तो कपिल सिब्बल जैसे लोग भारतीय विश्वविद्यालयों के स्वास्थ्य को लेकर और भी चिल्लाना शुरू कर देंगे। उनका तर्क होगा कि भारत के ये विश्वविद्यालय विदेशी विश्वविद्यालयों से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। इस अखाडे में वे उन्हें पराजित घोषित कर देंगे। और फिर या तो इन्हें बंद करने का फरमान सुना देंगे या फिर इनको ठेके पर उन्हीं प्राइवेट कंपनियों को सौंप देंगे, जो आज भी जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट विश्वविद्यालय खोलकर अपनी जीत का जश्न मना रही है।
प्रश्न यह है कि ये विदेशी विश्वविद्यालय भारत में किस प्रकार की शिक्षा प्रदान करेंगे और उन्हें किस प्रकार के संस्कार देंगे। कपिल सिब्बल मैकाले के उसी सूत्र को नंगे रूप में आगे बढा रहे हैं जिस सूत्र ने भारतीय लोगों की आत्मा को अंग्रेजी बनाने का स्वप्न देखा था। जहां तक बात है अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण की, तो जो सरकार 15 हजार लोगों की हत्या कर देने वाले एक अमेरिकी एंडरसन पर नियंत्रण नहीं कर सकी वह इन विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण कैसे कर पायेगी?
परिवर्तन के लिए एक खामोश अभियान
संदीप
जीवन विद्या अभियान का प्रस्ताव है कि हर व्यक्ति में सही को पहचानने और उसके अनुसार जीने की मूल क्षमता मौजूद है। शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर करना सिर्फ इतना है कि हर आदमी को सही की पहचान करा दी जाए। एक बार सही को पहचानकर हर आदमी अपने दम पर खड़ा होगा और व्यवस्था, जो कि प्रकृति में है ही, के साथ भागीदार होकर, अपनी भूमिका निभाते हुए, जीना शुरू कर सकेगा।
न कोई नेता, न कार्यकर्ता, न कोई नारा और शोर, न दिखावे का कोई तामझाम, मगर आवाहन ऐसा कि गांव का अनपढ़ किसान हो या आई.आई.टी. का वैज्ञानिक, हर कोई कारवां में शाामिल हो जाता है। मकसद है समस्याओं और अव्यवस्थाओं से जूझ रहे मानव, परिवार, समाज और प्रकृति को राहत दिलाने का। ये मौका था जीवन विद्या अभियान के 15 वें राष्ट्रीय सम्मेलन का। बांदा शहर से पांच कि.मी. दूर आंवले की बगिया में 12 नवंबर से 13 नवंबर तक उन तमाम गहन मुद्दों पर चर्चा हुई जिनसे देश और दुनिया के लोग इस समय जूझ रहे हैं।
मध्यस्थ दर्शन की रोशनी में पिछले पन्द्रह साल से चल रहे जीवन विद्या अभियान का लक्ष्य आतंकवाद का खात्मा भी है और भ्रष्टाचार पर आवाज उठाना भी। बात मिलावट, नशाखोरी की हो, ग्लोबल वार्मिंग, पारिवारिक असंतुलन की, आधुनिकता की या रूढ़िवादिता की, जीवन विद्या अभियान का दावा है कि उसके प्रस्ताव में धरती की हर समस्या का समाधान है, दुनिया के 700 करोड़ लोगों के सवालों का जवाब है। सम्मेलन में देश भर से आए लोगों का अनुभव और निष्कर्ष को सुनकर विश्वास भी होता है कि बिना किसी का विरोध किए, बिना संघर्ष का रास्ता अपनाए, भी दुनिया को सजाया जा सकता है। वस्तुतः तो यह भी समझ में आता है कि दुनिया को सजाने का काम संघर्ष और विरोध की बुनियाद पर नहीं बल्कि सही शिक्षानीति को अपनाने से होगा। आज व्यवस्था-परिवर्तन और समस्या-समाधान के नाम पर कहीं सरकारें बदली जा रही हैं तो कहीं संविधान। लेकिन एक बुनियादी चीज जो नहीं बदली जा रही है वह हैं देश में फैले हमारे शिक्षा संस्थान तथा शिक्षा नीति। हर पढ़ा लिखा आदमी अपनी जिंदगी के बीस साल शिक्षा-व्यवस्था को ग्रहण कर लेने के बाद भी यही सीखकर जीना शुरू करता है कि जीवन का लक्ष्य सिर्फ सामान और सुविधा इकट्ठा करना है, इसके लिए फिर भले ही किसी का शोषण क्यों न करना पड़े। उधर शिक्षा-मूल्य के नाम पर सच और ईमान जैसे शब्द केवल रटा दिए जा रहे हैं।
जीवन विद्या अभियान का प्रस्ताव है कि हर व्यक्ति में सही को पहचानने और उसके अनुसार जीने की मूल क्षमता मौजूद है। शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर करना सिर्फ इतना है कि हर आदमी को सही की पहचान करा दी जाए। एक बार सही को पहचानकर हर आदमी अपने दम पर खड़ा होगा और व्यवस्था, जो कि प्रकृति में है ही, के साथ भागीदार होकर, अपनी भूमिका निभाते हुए, जीना शुरू कर सकेगा। आई.आई.टी., कानफर, आई.आई.आई.टी., हैदराबाद, आई.आई.टी., दिल्ली, सोमया कालेज मुंबई सहित कई विश्व विद्यालयों के प्राफेसर इस कारवां में शामिल हैं। सर्वोदयी आंदोलन के नेता, किसान यूनियन के संस्थापक, योगाचार्य, चिकित्सक, नौकरीपेशा, व्यापारी, अनपढ़ किसान, विभिन्न धाराओं के लोगों और समाजिक कार्यकर्ताओं सहित देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों के लगभग 300 प्रतिनिधि इस खामोश आंदोलन के सूत्रधार बने हुए हैं।
सम्मेलन की शुरूआत में ही बांदा के किसान रणवीर सिंह चौहान ने कहा कि आज एक तरफ सिओल में धरती के संसाधनों को बांटने का काम चल रहा है वहीं दूसरी ओर देश की संसद में पक्ष-विपक्ष एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम कर रहे हैं। ऐसे में जीवन विद्या का यह सम्मेलन आज एक महत्वपूर्ण विकल्प पर विचार करेगा जिसमें मानव सहज रूप से मानव और प्रकृति के रूप में तालमेल पूर्वक रह सके। आई.आई.टी. से जुड़े और मानवीय शिक्षा संस्कार समिति, कानफर के श्री गणेश बागड़िया ने कहा कि विगत में कई लोगांे ने आंदोलन, क्रांतियों या हिंसक तरीकों से मौजूदा व्यवस्था को बदलने के लिए प्रयास किया है बहुत बार ये बदलाव हुआ भी लेकिन उसका स्थान लेने वाली व्यवस्था पहले से भी ज्यादा पीड़ादायक साबित हुई है। इसी पीड़ादायक व्यवस्था के विकल्प के रूप में जीवन विद्या जिंदगी के सभी आयामों अर्थात् स्वयं, शरीर, परिवार, समाज और प्रकृति के साथ व्यवस्था पूर्वक जीने का तरीका बताती है जिसे हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी पर जांच सकता है।
अमरकंटक में निवासरत जीवन विद्या के प्रणेता 92 वर्षीय श्री ए. नागराज ने अपने उद्बोधन में कहा- शिष्टतापूर्वक जीवन जीने की विधि समझाना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है यह कार्य कोई कम्प्यूटर या किताबों केे आधार पर नही हो सकता है। बल्कि समझदार शिक्षकों के आचरण से ही संभव होगा।
व्यवस्था के विकल्प की बात करते हुए किसान आंदोलन एवं आई.आई.टी. से जुड़े डा. रण सिंह आर्य ने कहा कि वर्तमान में मनुष्य निर्मित तंत्र को हम व्यवस्था कह रहें है, जो कि न सिर्फ सड़ चुका है, बल्कि इसमें मनुष्य की पहचान भी मनुष्य के रूप में किए जाने की संभावना भी खत्म हो गई है। आजकल सफल माने जाने वाले लोग भी मानसिक रूप में अभाव, भय, तनाव, खालीपन एवं अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। परिवार में टूटन, शिकायत एवं समाज में अविश्वास के रूप में तमाम समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे मे अस्तित्व और प्रकृति में व्यवस्था को समझे बिना वर्तमान संकटों का समाधान संभव नही है। छत्तीसगढ़ में मानवीय शिक्षा की स्थापना की जानकारी श्री सोमदेव त्यागी एवं शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने दी। उन्होंने बताया कि बहुत सारे मित्र अलग-अलग दिशाओं में, देश के अलग-अलग हिस्सों में, सबकी अपनी प्रवृति के अनुसार लगे हैं। लेकिन ये लगभग सबकी स्वीकृति में है कि जितना हमने नियोजन किया है परिणाम उससे कहीं ज्यादा ही आया है। छत्तीसगढ़ में इंजीनियरिंग शिक्षा में बहुत काम हुआ। पिछले 3 सालों में छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग के साथ मिलकर बड़ा काम हुआ। लगभग बीस हजार शिक्षक शिविरों से गुजर चुके हैं और जितना काम छत्तीसगढ़ में पिछले तीन साल में हुआ उतना पिछले चार महीने में महाराष्ट्र में हो चुका है। ऐसा लगता है कि आगे की यात्रा और सुखद होने वाली है।
जीवन विद्या आधारित चेतना विकास मूल्य शिक्षा के पाठ्यक्रम पर भी चर्चा की गई। इसके आधार पर कक्षा एक से पांच तक की किताबें तैयार कर ली गई हैं जिन्हें छत्तीसगढ़ के सभी प्राइमरी स्कूलों में लागू कर दिया गया है। अगले चरण में कक्षा 6 से 10 तक की किताबें तैयार की जानी हैं। जिसकी जिम्मेदारी माइनिंग इंजीनियर रहे और 20 वर्षां से जुड़े साधन भट्टाचार्य एवं उनकी टीम ने संभाली है।
जीवन विद्या अभियान का प्रस्ताव है कि हर व्यक्ति में सही को पहचानने और उसके अनुसार जीने की मूल क्षमता मौजूद है। शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर करना सिर्फ इतना है कि हर आदमी को सही की पहचान करा दी जाए। एक बार सही को पहचानकर हर आदमी अपने दम पर खड़ा होगा और व्यवस्था, जो कि प्रकृति में है ही, के साथ भागीदार होकर, अपनी भूमिका निभाते हुए, जीना शुरू कर सकेगा।
न कोई नेता, न कार्यकर्ता, न कोई नारा और शोर, न दिखावे का कोई तामझाम, मगर आवाहन ऐसा कि गांव का अनपढ़ किसान हो या आई.आई.टी. का वैज्ञानिक, हर कोई कारवां में शाामिल हो जाता है। मकसद है समस्याओं और अव्यवस्थाओं से जूझ रहे मानव, परिवार, समाज और प्रकृति को राहत दिलाने का। ये मौका था जीवन विद्या अभियान के 15 वें राष्ट्रीय सम्मेलन का। बांदा शहर से पांच कि.मी. दूर आंवले की बगिया में 12 नवंबर से 13 नवंबर तक उन तमाम गहन मुद्दों पर चर्चा हुई जिनसे देश और दुनिया के लोग इस समय जूझ रहे हैं।
मध्यस्थ दर्शन की रोशनी में पिछले पन्द्रह साल से चल रहे जीवन विद्या अभियान का लक्ष्य आतंकवाद का खात्मा भी है और भ्रष्टाचार पर आवाज उठाना भी। बात मिलावट, नशाखोरी की हो, ग्लोबल वार्मिंग, पारिवारिक असंतुलन की, आधुनिकता की या रूढ़िवादिता की, जीवन विद्या अभियान का दावा है कि उसके प्रस्ताव में धरती की हर समस्या का समाधान है, दुनिया के 700 करोड़ लोगों के सवालों का जवाब है। सम्मेलन में देश भर से आए लोगों का अनुभव और निष्कर्ष को सुनकर विश्वास भी होता है कि बिना किसी का विरोध किए, बिना संघर्ष का रास्ता अपनाए, भी दुनिया को सजाया जा सकता है। वस्तुतः तो यह भी समझ में आता है कि दुनिया को सजाने का काम संघर्ष और विरोध की बुनियाद पर नहीं बल्कि सही शिक्षानीति को अपनाने से होगा। आज व्यवस्था-परिवर्तन और समस्या-समाधान के नाम पर कहीं सरकारें बदली जा रही हैं तो कहीं संविधान। लेकिन एक बुनियादी चीज जो नहीं बदली जा रही है वह हैं देश में फैले हमारे शिक्षा संस्थान तथा शिक्षा नीति। हर पढ़ा लिखा आदमी अपनी जिंदगी के बीस साल शिक्षा-व्यवस्था को ग्रहण कर लेने के बाद भी यही सीखकर जीना शुरू करता है कि जीवन का लक्ष्य सिर्फ सामान और सुविधा इकट्ठा करना है, इसके लिए फिर भले ही किसी का शोषण क्यों न करना पड़े। उधर शिक्षा-मूल्य के नाम पर सच और ईमान जैसे शब्द केवल रटा दिए जा रहे हैं।
जीवन विद्या अभियान का प्रस्ताव है कि हर व्यक्ति में सही को पहचानने और उसके अनुसार जीने की मूल क्षमता मौजूद है। शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर करना सिर्फ इतना है कि हर आदमी को सही की पहचान करा दी जाए। एक बार सही को पहचानकर हर आदमी अपने दम पर खड़ा होगा और व्यवस्था, जो कि प्रकृति में है ही, के साथ भागीदार होकर, अपनी भूमिका निभाते हुए, जीना शुरू कर सकेगा। आई.आई.टी., कानफर, आई.आई.आई.टी., हैदराबाद, आई.आई.टी., दिल्ली, सोमया कालेज मुंबई सहित कई विश्व विद्यालयों के प्राफेसर इस कारवां में शामिल हैं। सर्वोदयी आंदोलन के नेता, किसान यूनियन के संस्थापक, योगाचार्य, चिकित्सक, नौकरीपेशा, व्यापारी, अनपढ़ किसान, विभिन्न धाराओं के लोगों और समाजिक कार्यकर्ताओं सहित देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों के लगभग 300 प्रतिनिधि इस खामोश आंदोलन के सूत्रधार बने हुए हैं।
सम्मेलन की शुरूआत में ही बांदा के किसान रणवीर सिंह चौहान ने कहा कि आज एक तरफ सिओल में धरती के संसाधनों को बांटने का काम चल रहा है वहीं दूसरी ओर देश की संसद में पक्ष-विपक्ष एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम कर रहे हैं। ऐसे में जीवन विद्या का यह सम्मेलन आज एक महत्वपूर्ण विकल्प पर विचार करेगा जिसमें मानव सहज रूप से मानव और प्रकृति के रूप में तालमेल पूर्वक रह सके। आई.आई.टी. से जुड़े और मानवीय शिक्षा संस्कार समिति, कानफर के श्री गणेश बागड़िया ने कहा कि विगत में कई लोगांे ने आंदोलन, क्रांतियों या हिंसक तरीकों से मौजूदा व्यवस्था को बदलने के लिए प्रयास किया है बहुत बार ये बदलाव हुआ भी लेकिन उसका स्थान लेने वाली व्यवस्था पहले से भी ज्यादा पीड़ादायक साबित हुई है। इसी पीड़ादायक व्यवस्था के विकल्प के रूप में जीवन विद्या जिंदगी के सभी आयामों अर्थात् स्वयं, शरीर, परिवार, समाज और प्रकृति के साथ व्यवस्था पूर्वक जीने का तरीका बताती है जिसे हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी पर जांच सकता है।
अमरकंटक में निवासरत जीवन विद्या के प्रणेता 92 वर्षीय श्री ए. नागराज ने अपने उद्बोधन में कहा- शिष्टतापूर्वक जीवन जीने की विधि समझाना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है यह कार्य कोई कम्प्यूटर या किताबों केे आधार पर नही हो सकता है। बल्कि समझदार शिक्षकों के आचरण से ही संभव होगा।
व्यवस्था के विकल्प की बात करते हुए किसान आंदोलन एवं आई.आई.टी. से जुड़े डा. रण सिंह आर्य ने कहा कि वर्तमान में मनुष्य निर्मित तंत्र को हम व्यवस्था कह रहें है, जो कि न सिर्फ सड़ चुका है, बल्कि इसमें मनुष्य की पहचान भी मनुष्य के रूप में किए जाने की संभावना भी खत्म हो गई है। आजकल सफल माने जाने वाले लोग भी मानसिक रूप में अभाव, भय, तनाव, खालीपन एवं अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। परिवार में टूटन, शिकायत एवं समाज में अविश्वास के रूप में तमाम समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे मे अस्तित्व और प्रकृति में व्यवस्था को समझे बिना वर्तमान संकटों का समाधान संभव नही है। छत्तीसगढ़ में मानवीय शिक्षा की स्थापना की जानकारी श्री सोमदेव त्यागी एवं शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने दी। उन्होंने बताया कि बहुत सारे मित्र अलग-अलग दिशाओं में, देश के अलग-अलग हिस्सों में, सबकी अपनी प्रवृति के अनुसार लगे हैं। लेकिन ये लगभग सबकी स्वीकृति में है कि जितना हमने नियोजन किया है परिणाम उससे कहीं ज्यादा ही आया है। छत्तीसगढ़ में इंजीनियरिंग शिक्षा में बहुत काम हुआ। पिछले 3 सालों में छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग के साथ मिलकर बड़ा काम हुआ। लगभग बीस हजार शिक्षक शिविरों से गुजर चुके हैं और जितना काम छत्तीसगढ़ में पिछले तीन साल में हुआ उतना पिछले चार महीने में महाराष्ट्र में हो चुका है। ऐसा लगता है कि आगे की यात्रा और सुखद होने वाली है।
जीवन विद्या आधारित चेतना विकास मूल्य शिक्षा के पाठ्यक्रम पर भी चर्चा की गई। इसके आधार पर कक्षा एक से पांच तक की किताबें तैयार कर ली गई हैं जिन्हें छत्तीसगढ़ के सभी प्राइमरी स्कूलों में लागू कर दिया गया है। अगले चरण में कक्षा 6 से 10 तक की किताबें तैयार की जानी हैं। जिसकी जिम्मेदारी माइनिंग इंजीनियर रहे और 20 वर्षां से जुड़े साधन भट्टाचार्य एवं उनकी टीम ने संभाली है।
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