Showing posts with label पृष्ठ संख्या १०. Show all posts
Showing posts with label पृष्ठ संख्या १०. Show all posts
Monday, April 25, 2011
Wednesday, April 20, 2011
साक्षरता की हकीकत
लगभग अस्सी फीसदी साक्षरता वाले राज्य उत्तराखंड की हकीकत उत्साह पर पानी फेर रही है। सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदरंग ही नहीं, भयावह है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) से साफ है कि लोग अपने बच्चों को क्यों सरकारी स्कूलों से दूर रखना चाहते हैं। जिन स्कूलों में आठवीं कक्षा के तकरीबन 99 फीसदी छात्र-छात्राएं अक्षर की पहचान न कर पा रहे हों, उनका भविष्य क्या होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है। रिपोर्ट में चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि शिक्षकों की उपस्थिति कम होती जा रही है। सरकार भले ही शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के दावे कर रही हो, लेकिन हालात दिन पर दिन खराब होते जा रहे हैं। दरअसल, वर्तमान में चिंता से ज्यादा चिंतन की आवश्यकता है। आखिर क्या वजह है कि भारी-भरकम बजट वाले विभाग के रिजल्ट इतने दयनीय हैं। परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो काफी कुछ साफ हो जाता है। राजनीतिक महत्वाकांक्षा और शिथिल प्रशासन, इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। स्कूल खोलने में जितनी दरियादिली दिखायी जाती है, शायद ही इतना ध्यान व्यवस्थाओं पर दिया गया हो। शिक्षक राजनीति में उलझी सरकार के पास स्कूलों के आंतरिक हालात का जायजा लेने का वक्त ही नहीं है। नियुक्ति से लेकर स्थानांतरण और बिल्डिंग से लेकर बजट तक, हर जगह राजनीति का हस्तक्षेप है। ऐसे में नौनिहालों के सुनहरे भविष्य की उम्मीद करना बेमानी होगी। जाहिर है अभिभावक सरकारी स्कूलों से मुंह मोड़ प्राइवेट स्कूलों की शरण ले रहे हैं और इन स्कूलों का रवैया सभी जानते हैं। लेकिन अभिभावक मजबूर है, बच्चों के भविष्य के लिए वह निजी स्कूलों की ब्लैकमेलिंग सहने को भी तैयार है। सरकार के लिए ये वक्त एक्शन का है। देर तो हो ही चुकी है, लेकिन कहीं अंधेर न हो जाए। शिक्षा समाज का अधिकार है और इसकी व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी। समाज तो शिक्षा के लालयित है, लेकिन सरकार अपनी कर्तव्य का निर्वहन करने में सतर्क नजर नहीं आ रही है।
Wednesday, April 13, 2011
Monday, April 11, 2011
प्राथमिक स्कूलों से भागते बच्चे
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि बीते दो वर्षो के दौरान देश के प्राइमरी स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या में 26 लाख से अधिक की गिरावट आई है! और भी हैरतअंगेज तथ्य यह है कि इसमें से आधी संख्या सिर्फ उत्तर प्रदेश से है! स्कूल न जाने के इस आंकड़े को इस परिवर्तन की रोशनी के बावजूद देखा जाना चाहिए कि साल भर से अधिक समय से ही सरकार ने पूरे देश में शिक्षा का अधिकार कानून भी लागू किया हुआ है! उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पढ़ाई छोड़कर भाग रहे बच्चों का कारण तो इसी एक आंकड़े में निहित है कि वहां बाल श्रमिकों की संख्या में इधर के वर्षो में तेजी से इजाफा हुआ है। स्पष्ट है कि बच्चे पढ़ाई क्यों छोड़ रहे हैं और कहां जा रहे हैं!
देश के प्राइमरी स्कूलों को आज जो कोई भी देखता है उसके मन में सिर्फ एक प्रश्न आता है कि इतनी सुविधाओं के बाद अब यहां किस चीज की कमी है जो न तो यहां पढ़ाई का स्तर सुधर पा रहा है और न ही बच्चे टिक रहे हैं? इन विद्यालयों की हकीकत यह है कि यहां पढ़ाने वाले अध्यापक अपने खुद के बच्चों को किसी पब्लिक स्कूल में पढ़ाते हैं और छात्र संख्या आधे से अधिक फर्जी होती है ताकि ग्राम प्रधान और अध्यापक मिलकर मध्याह्न भोजन व छात्रवृत्ति में प्रति छात्र के हिसाब से ज्यादा से ज्यादा धन का बंदरबांट कर सकें और छात्र संख्या कम होने के कारण अध्यापकों में से किसी का स्थानांतरण न हो जाए। स्कूल छोड़कर भागने वाले बच्चों में हालांकि ऐसे बच्चे कम ही होते हैं जो बेहतर पढ़ाई के लिए अभिभावकों द्वारा निकाल लिये जाते हों। अधिकतर बच्चे ऐसे ही हैं जो कहीं मजदूरी कर चार पैसे कमाने के लिए ही मां-बाप द्वारा स्कूल से निकाल लिए जाते हैं या स्कूल भेजे ही नहीं जाते। यही वह एकमात्र कारण है जिसके आगे मुफ्त में मिलने वाली शिक्षा, मुफ्त भोजन, किताब-कॉपी, यूनीफार्म और वार्षिक वजीफा भी इन बच्चों के अभिभावकों को इनकी पढ़ाई के लिए प्रेरित नहीं कर पाता। वर्ष 2000 में केंद्र सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान शुरू किया जिसका उद्देश्य स्कूल जाने योग्य हर बच्चे को अनिवार्य रूप से स्कूल तक पहुंचाना था। इससे भी पहले विश्व बैंक की सहायता से डी.पी.ई.पी. नामक जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम चल रहा था। यह जानकर किसी को भी आश्र्चय हो सकता है कि सिर्फ प्राथमिक स्कूलों तक हर बच्चे को पहुंचाने के लिए एक दर्जन से भी अधिक कार्यक्रम प्रत्येक जिले में चल रहे हैं और शायद ही शिक्षा विभाग का कोई अधिकारी या बाबू हो जिसे सारे कार्यक्रमों के नाम तक याद हों!
हाल यह है कि बर्ष 2008-09 और 2009-10 में पहले के वर्षों की अपेक्षा 26 लाख कम बच्चों का नाम लिखा गया। इसी अवधि में सबसे बुरी गति उत्तर प्रदेश की रही जहां स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या में 10 लाख की गिरावट आई! यानी 5 लाख बच्चे प्रतिवर्ष स्कूल जाने से वंचित रहे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय अब यह सोचकर हैरान है कि इन बच्चों को किस तरकीब से स्कूल तक पहुंचाया जाए। यही हाल राजस्थान, बिहार, असम, और महाराष्ट्र में भी है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि सरकारी प्राथमिक स्कूलों में अब सिर्फ गरीब बच्चे पढ़ते हैं। सरकार भी इस तथ्य से वाकिफ है और इसीलिए ऐसी योजनाएं इन विद्यालयों में लागू की जाती हैं जिससे भूखे-नंगे बच्चे न सिर्फ आकर्षित हों बल्कि विद्यालय पहुंचकर वहां टिकें भी। वजीफा, दोपहर का भोजन और किताब-कॉपी आदि मुफ्त में देना इसी योजना का अंग है, लेकिन हैरत उनकी सोच पर होती है, जो लोग इन योजनाओं का खाका तैयार करते हैं। उन्हें या तो गांवों के बारे में जमीनी हकीकत का पता नहीं होता या फिर वे येन-केन- प्रकारेण अपने सिर से बला टाल देते हैं। इस संदर्भ में एक उदाहरण पर्याप्त होगा- प्राथमिक स्कूलों में सरकार ने शौचालय बनवाये हैं ताकि बच्चे खुले में शौच न जाएं। शासन को रिपोर्ट मिली कि बच्चे इन शौचालयों का इस्तेमाल करने के बजाय खुले मे जाना ही पसंद कर रहे हैं। जानते हैं कि नौकरशाही ने इसका कौन सा उपाय बताया? विद्यालयों में शासनादेश आ गया कि प्रत्येक शौचालय में खूब रंगीन पेण्टिंग करके चिड़ियों आदि के चित्र बनाये जाएं तो बच्चे उन्हें देखने के बहाने शौचालय में टिकेंगें! करोड़ों रुपये का निपटारा इस बहाने हो गया लेकिन नतीजा शून्य। केंद्रीय योजना मनरेगा के साइड-इफेक्ट्स भी गरीब बच्चों के स्कूल न जाने या छोड़ने के लिए जिम्मेदार हैं। असल में मनरेगा की वजह से एक तो गांव में ही काम के अवसर बढ़े और दूसरे मजदूरी भी बढ़ी। मनरेगा में निश्चित काम की निश्चित मजदूरी होने के कारण होता यह है कि काम चाहे परिवार के किसी एक सदस्य के नाम ही मिला हो लेकिन उसे सब मिलकर जल्दी से निपटा लेते हैं। मसलन 100 घनफुट मिट्टी निकालने की मजदूरी 119 रुपये मिलती है। अब होता यह है कि परिवार के कई सदस्य मिलकर इसे जल्दी से निपटाकर दूसरे काम में लग जाते हैं। गरीब लोग अपने बच्चों को भी इस काम में लगा लेते हैं। मनरेगा ने चूंकि सामान्य मजदूरी की दर भी बढ़ा दी है इसलिए भी गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल जाना छोड़कर बालश्रमिक बन रहे हैं। आखिर स्कूल में उन्हें सड़ा-गला खाना और साल भर में 250 रुपये का वजीफा ही तो मिलता है! जाहिर है कि मजदूरी करने पर एक बच्चा इससे बहुत अधिक तो कमा ही लेता है। यही कारण तो है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में हाल के 2-3 वर्षों में बहुत तेजी से बाल श्रमिक बढ़े हैं।
Monday, March 28, 2011
विफलताओं से उपजा पलायन
एक भारतीय छात्रा की हत्या के बाद फिर से आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की सुरक्षा और आस्ट्रेलियाई प्रशासन की कार्यपण्राली पर सवाल उठने लगे हैं। लम्बे अंतराल के बाद हुए इस हमले में अभी तक किसी आस्ट्रेलियाई मूल के छात्र की संलिप्तता पता नहीं चली है फिर भी भारतीय छात्रों पर रह-रह कर होते हमले जहां आस्ट्रेलियाई समाज में तेजी से बढ़ती आर्थिक तथा सामाजिक विषमताओं को दर्शाते हैं वहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था की कमियों और कमजोरियों को भी उजागर करते हैं। उच्च शिक्षा के लिए आस्ट्रेलिया ही नहीं, सिंगापुर, हांगकांग, इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, चीन और कई यूरोपीय एवं पूर्व सोवियत देशों की ओर भारतीय छात्रों का पलायन हमारी शिक्षा व्यवस्था और वर्तमान शिक्षा सुधारों पर बड़ा प्रश्न चिह्न है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था के विकास की यदि बात की जाए व उसकी तुलना एशियाई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ करें तो भी स्थिति बिल्कुल संतोषजनक नहीं कही जा सकती है। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार जहां देश की केवल 65.47 प्रतिशत आबादी साक्षर थी वहीं चीन में साक्षरता की यह दर 84.1, इंडानेशिया में 87.3 और थाईलैंड में 95.7 थी। 1,68,000 महाविद्यालयों, 20 केंद्रीय विश्वविद्यालयों, 227 राज्य विश्वविद्यालयों, 109 डीम्ड विश्वविद्यालयों और 13 राष्ट्रीय स्तरीय संस्थानों के साथ उच्च शिक्षा की स्थिति कहीं ज्यादा दयनीय है। भारत में केवल 10 प्रतिशत युवा ही उच्च शिक्षा हासिल कर पाते हैं और यह आंकड़ा विकसित दुनिया के आधे से कम और पड़ोसी चीन के 15 प्रतिशत से भी बेहद कम है। आई.आई.टी. और आई.आई.एम. सरीखी शिक्षा की प्रतियोगी परीक्षाओं में छह लाख से अधिक प्रतियोगी हिस्सा लेते हैं जिनमें से कामयाब होकर उच्च शिक्षा पाने का अवसर महज एक से डेढ़ प्रतिशत भाग्यशाली युवाओं को ही होता है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था की इस बदहाली का एक बेहद दिलचस्प पहलू यह है कि भारतीय आई.आई.टी. में दाखिला लेना हार्वर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला पाने से 10 गुणा मुश्किल काम है और यह कोई शिक्षा के निर्धारित उच्च मानकों के कारण नहीं, संस्थानों की कम संख्या का परिणाम है। पिछले दिनों उच्च शिक्षा की स्थिति पर प्रकाशित लंदन टाइम्स की एक रिपोर्ट भी हमारी शिक्षा व्यवस्था की दुर्गति को उजागर करती है जिसके अनुसार उच्च शिक्षा के दुनिया के शीर्ष दो सौ संस्थानों में जहां महज एक ही भारतीय संस्थान शामिल है, वहीं चीन, हांगकांग, साउथ कोरिया के तीन-तीन विश्वविद्यालय इस श्रेणी में शामिल हैं। उच्च शिक्षा के स्तर में सुधार की जरूरतों को समझते हुए हम लगातार उच्च शिक्षा के संस्थानों के निर्माण की बात करते हैं परंतु इन पर बातें ही अधिक हो रही हैं। भारत में 8 आई.आई.टी., 7 आई.आई.एम. और 5 भारतीय विज्ञान संस्थानों की स्थापना का प्रश्न लम्बे समय से लम्बित है पर अभी तक मामला केवल केंद्रीय मंत्रिमंडल तक पहुंचा है, दूसरी तरफ मैकेंजी के एक सूत्र के अनुसार चीन आई.आई.टी. स्तर के सौ संस्थानों के निर्माण का काम शुरू भी कर चुका है। ध्यान रहे कि चीन दुनिया के एक बड़े एजूकेशन हब की तरह विकसित हो रहा है और आज भी वहां दो लाख से अधिक विदेशी छात्र शिक्षा पाते हैं। वहीं उच्च शिक्षा संस्थानों की कमी के कारण ही बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा के मौके तलाशने के लिए विवश होते हैं। विदेशों में शिक्षारत इन छात्रों पर इनके व परिवार द्वारा किया जाने वाला खर्च एक अनुमान के अनुसार 45 हजार करोड़ रुपये सालाना है। यह राशि भारतीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के वार्षिक खर्च से पंद्रह गुना से भी अधिक है और भारतीय छात्रों के अभिभावकों के गाढ़े खून- पसीने से कमाई गई इस पूंजी को अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, दुबई, हांगकांग, मलेशिया व आस्ट्रेलिया जैसे देशों के शिक्षा व्यवसायी लूट रहे हैं। उदारवाद के बदलते हुए परिवेश में इस शिक्षा व्यवसाय की लूट और अपनी विफलताओं से अनजान भारतीय मध्यम वर्ग सामाजिक सुरक्षा और रोजगार के खतरों की कठिन चुनौतियों को झेलते हुए भी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इस नए कथित विकास के साथ कदमताल करने की कोशिश कर रहा है। विकास की इस कदमताल में वह कल के सुनहरे सपने बुनकर अपने बच्चों को पढ़ने विदेश तो भेज देता है परंतु अपने आप को नए जनवादी राज परिवारों के जैसा समर्थ और आत्मनिर्भर नहीं पाता जिससे उसके बच्चे अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए दूसरे देशों में जाकर अंशकालिक कामों का सहारा लेते हैं। कैजुअल कामगारों के बड़े ठिकाने आस्ट्रेलिया में अंशकालिक कामों के लिए आस्ट्रेलियावासी गरीब युवाओं और भारतीय छात्रों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता हमारे छात्रों पर लगातार होते हमलों का मुख्य कारण है। बेशक हमारे नीति निर्माता सकल घरेलू उत्पाद की तेज वृद्धि दर और क्रांतिकारी शिक्षा सुधारों की लाख बातें करें, मगर वास्तविकता यही है कि एजूकेशन हब बनने की बात तो दूर, हम शिक्षा संस्थानों की आवश्यक संख्या और शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में अभी तक अंतराष्ट्रीय मानकों के आस पास भी नहीं हैं। इसी कारण बेहतर भविष्य की तलाश में अपने छात्रों का विदेश में जाना और उनके अभिभावकों की पूंजी को देश से बाहर जाने से रोक पाने में हम पूरी तरह असमर्थ हैं। यदि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की स्थिति लगातार ऐसी ही बनी रहती है तो यह तय है कि अंततोगत्वा यह विकास की गति और देश की अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं होगा।
Wednesday, March 9, 2011
शिक्षित विकलांगों का ब्राइट फ्यूचर
शिक्षित एवं उच्च शिक्षित विकलांगों के लिए कई प्रकार की निजी एवं सरकारी नौकरियां उपलब्ध हैं, जिनमें नौकरी पाकर वे अपना जीवन संवार सकते हैं
वित्त-लेखा एवं ऑडिट विभाग
इन विभागों में व्यावसायिक और वित्तीय विभाग के लेखा रजिस्टर एवं रिकॉर्ड आदि को तैयार करना और उनका रख-रखाव किया जाता है। निजी, सरकारी, अर्धसरकारी विभागों में विकलांग व्यक्ति एकाउंटेंट से लेकर फाइनेंस मैनेजर तक के पद पर कार्य कर सकते हैं। यहां उन्हें एक ओर अपने अधीनस्थ कर्मचारी, जैसे लेखा लिपिकों आदि के काम की देखरेख करनी होती है तो दूसरी ओर बिलों, प्राप्तियों, भुगतानों, कैश-बुक, लेजर, टैक्स, लाइंसेंस फीस आदि की जांच करनी पड़ती है। ऑडिट से सम्बद्ध अधिकारियों को निजी प्रतिष्ठानों, सरकारी व अर्ध सरकारी संस्थानों के लेखा संबंधी रिकॉर्ड जांचने होते हैं। इन पदों में प्रवेश के लिए वाणिज्य में स्नातक होना आवश्यक होता है और चार्टर्ड एकाउंटेंट या कास्ट एकाउंटेंट भी होना चाहिए। कई स्थानों पर एमबीए (फाइनेंस) की डिग्री से भी काम चल जाता है। इस प्रकार के पद सरकारी विभागों या सार्वजनिक क्षेत्रो में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार द्वारा भरे जाते हैं। ऐसे पद बड़ी संख्या में हर वर्ष निकलते हैं और प्रत्याशियों को अपने विषयों के अलावा सामान्य ज्ञान तथा हिन्दी-अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान होना चाहिए। इस प्रकार की नौकरियां सरकारी विभागों व सार्वजनिक क्षेत्रों के अलावा बैंकों और बीमा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निकलती हैं। बैंक और बीमा क्षेत्र का अभी और अधिक विस्तार होना है। नौकरी मिलने के बाद पदोन्नति आदि की अच्छी गुंजाइश है। अत: विकलांग व्यक्तियों खासतौर से छात्रों को अपना लक्ष्य निर्धारित करके तैयारी पहले से ही प्रारंभ कर देनी चाहिए।
Thursday, December 23, 2010
हर तीन किमी पर एक जूनियर हाईस्कूल होगा
लखनऊ। प्रदेश में अब प्रत्येक एक किलोमीटर पर प्राथमिक और तीन किलोमीटर पर उच्च प्राथमिक विद्यालय (जूनियर हाईस्कूल) खोला जाएगा। सर्व शिक्षा अभियान के राज्य परियोजना निदेशालय ने बेसिक शिक्षा अधिकारियों से नए मानक के आधार पर स्कूल खोलने का प्रस्ताव मांगा है। सूची के आधार पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्रस्ताव भेजकर धनराशि की मांग की जाएगी।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मुताबिक, प्रत्येक किलोमीटर पर प्राथमिक और डेढ़ किलोमीटर पर उच्च प्राथमिक स्कूल खोलने का मानक निर्धारित किया गया था। राज्य सरकार ने आबादी के आधार पर कर दिया था। इसमें 300 की आबादी पर प्राथमिक और 500 की आबादी पर उच्च प्राथमिक विद्यालय खोलने का प्रस्ताव मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संयुक्त सचिव अनीता कौल के सामने प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि आबादी के आधार पर मानक न बनाया जाए। फिर राज्य ने आबादी के हिसाब से पांच हजार प्राथमिक और एक हजार उच्च प्राथमिक विद्यालय खोलने का प्रस्ताव केंद्र को भेज दिया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। केंद्र से प्रस्ताव वापस आने के बाद सर्व शिक्षा अभियान के राज्य परियोजना निदेशालय ने नए सिरे से मानक निर्धारित किए। इसके अनुसार, एक किमी में प्राथमिक और तीन किमी के दायरे में उच्च प्राथमिक विद्यालय खोलने का निर्णय किया गया है। राज्य परियोजना निदेशालय के निदेशक के राम मोहन राव ने प्रदेश के सभी बीएसए को पत्र भेजकर इसके आधार पर ही नए स्कूल खोलने का प्रस्ताव देने को कहा है। पत्र में यह भी कहा गया है कि नए स्कूलों के लिए जो भी प्लान तैयार किया जाए, उसमें ब्लॉक वार मानचित्र भी दिया जाए।
Tuesday, December 21, 2010
अब विश्वविद्यालयों में तैयार होंगे शेयर ब्रोकर
कभी अमीरों का शौक रहा शेयर कारोबार अब हर खासो-आम तक पहुंच गया है। इसमें आमदनी की बेहतरीन संभावनाओं को देखते हुए आज आम आदमी भी अपनी गाढ़ी कमाई का कुछ हिस्सा निवेश करने से नहीं चूक रहा है। शेयरों के प्रति लगातार बढ़ रहे इस आकर्षण के चलते शेयर व वित्त बाजार का बड़ी तेजी से विस्तार हो रहा है। इसके लिए बड़ी संख्या में जरूरी पेशेवर अब विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तैयार होंगे। इसके लिए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) अब प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों व कालेजों की मदद लेने जा रहा है। योजना के अनुसार शेयर ब्रोकर, स्टॉक मार्केट एजेंट, डिस्ट्रीब्यूटर्स जैसे कैपिटल मार्केट पेशेवर अब विश्वविद्यालयों व कालेजों में तैयार होंगे। दरअसल, एनएसई वर्ष 1998 से शेयर व पूंजी बाजार के लिए प्रोफेशनल तैयार कर रहा है। इसके लिए एनएसई सर्टिफिकेशन इन फाइनेंशियल मार्केट्स (एनसीएफएम) के पाठ्यक्रम शुरू किए गए थे। इसमें देश भर में फैले केंद्रों पर इंटरनेट के जरिए व्यक्ति की दक्षता की जांच कर प्रमाणपत्र दिए जाते रहे हैं। ये प्रमाणपत्र स्टॉक एक्सचेंज से जुड़ी नौकरियों व कारोबार के लिए जरूरी हैं। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने भी वित्तीय कारोबार में आने वाले हर पेशेवर के लिए पढ़ाई अनिवार्य कर दी है। कैपिटल मार्केट के भारी विस्तार को देखते हुए एनएसई ने अगस्त, 2009 में इस कार्य में प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थाओं को भी शामिल करने का प्रस्ताव किया था। अब इसे अमली जामा पहनाया जा रहा है। एनएसई सर्टीफाइड मार्केट प्रोफेशनल्स नामक इस स्कीम के तहत तीन से चार माह के सर्टिफिकेट कोर्स व एक वर्ष तक के डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित होने हैं। इसमें छात्रों को एनएसई व संबंधित कॉलेज का संयुक्त प्रमाण पत्र दिया जाएगा। फिलहाल, इस पाठ्यक्रम के साथ देश के बड़े महानगरों के आठ कॉलेज जुड़ चुके हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के डीन प्रो. एके. मिश्रा के अनुसार उत्तर प्रदेश में अभी इसकी शुरुआत होनी है। यह विद्यापीठ भी इस पाठ्यक्रम को संचालित करने के लिए कतार में है।
Subscribe to:
Posts (Atom)