Wednesday, October 3, 2012

कालेजों को मदद की राह आसान करेगा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग




ठ्ठराजकेश्वर सिंह, नई दिल्ली देश के हजारों कालेजों की केंद्रीय मदद में विश्वविद्यालयों का गैरजरूरी अड़ंगा अब नहीं चलेगा। विश्वविद्यालयों अस्थायी संबद्धता के बहाने कालेजों को कई वर्ष तक नहीं लटका सकेंगे। विश्वविद्यालयों को संबद्धता का फैसला एक निश्चित अवधि में करना ही पड़ेगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) कालेजों की वित्तीय मदद में भी उदार होना चाहता है। लिहाजा, आयोग संबद्धता के नियमों में बदलाव करने जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, आयोग चाहकर भी देश के ऐसे हजारों कालेजों की वित्तीय मदद नहीं कर पाता, जिनकी किसी विवि से स्थायी संबद्धता नहीं है। किसी विश्वविद्यालय या कालेज को यूजीसी अधिनियम के तहत पात्रता रखने पर ही अनुदान मिल सकता है। देश में लगभग 33 हजार कालेज हैं, लेकिन संबद्धता और पात्रता की शर्तो की अनदेखी के चलते यूजीसी सिर्फ 634 कालेजों को ही अनुदान देता है। कई बार विवि जानबूझकर कालेजों को संबद्धता नहीं देते। हर साल फीस लेकर एक साल की अस्थायी संबद्धता देते हैं, जबकि नियमानुसार पांच साल तक सभी शर्ते पूरी करने के बाद निश्चित फीस लेते हुए उन्हें स्थायी संबद्धता दी जानी चाहिए। मापदंडों पर खरा नहीं उतरने पर कालेज को स्थायी संबद्धता से मना किया जा सकता है। ऐसे में संबंधित कालेज छह महीने बाद ही फिर से आवेदन कर सकता है। इन स्थितियों में आयोग नियमों में बदलाव कर सकता है। किसी कालेज के संबद्धता आवेदन के समय ही उसे बताया जा सकता है कि एक निश्चित अवधि में मापदंडों को पूरा करने पर स्थायी संबद्धता मिलना तय है।
Dainik Jagran  National Edition 3-10-2012 Education PeJ -3

Tuesday, October 2, 2012

आइआइटी के लिए छात्रों को मिलेगा एक और मौका




ठ्ठ जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) के लिए अगले साल शुरू होने जा रही दाखिले की नई प्रक्रिया में इस साल 12वीं की पढ़ाई पूरी कर चुके छात्रों का भी ध्यान रखा जाएगा। चूंकि, जेईई-एडवांस की मेरिट लिस्ट में आने के बाद छात्रों को अपने स्कूल बोर्ड के टॉप 20 परसेंटाइल छात्रों में शामिल होना जरूरी है, लिहाजा उन्हें इन मापदंडों पर खरा उतरने के लिए 12वीं की परीक्षा का एक मौका और मिलेगा। सूत्रों का कहना है कि आइआइटी सिस्टम में नई दाखिला प्रक्रिया के अमल में आने के बाद उन छात्रों का भी ध्यान रखा जाएगा, जिन्होंने इस साल ही 12वीं की परीक्षा पास की है। आइआइटी-जेईई में बैठने के लिए छात्रों को दो मौके मिलते रहे हैं। संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) एडवांस की नई प्रक्रिया में भी उन्हें दो मौके मिलेंगे। पुरानी प्रक्रिया में छात्रों को इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में टॉप 20 परसेंटाइल (प्रतिशतांक) में शामिल होने की अनिवार्यता नहीं थी। लिहाजा, जो छात्र इस साल 12वीं पास कर चुके हैं और अगले साल आइआइटी में दाखिला चाहते हैं तो उन्हें खुद के परीक्षा परिणाम को और बेहतर करने का मौका दिया जाएगा। गौरतलब है कि आइआइटी समेत सभी केंद्रीय तकनीकी शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए अगले साल (2013) से प्रवेश परीक्षा के तौर तरीके बदलने जा रहे हैं। सबसे पहले एआइईईई की तर्ज पर सीबीएसई एक संयुक्त प्रवेश परीक्षा-मुख्य ((जेईई)-मेन) का आयोजन करेगा। उसमें सबसे बेहतर डेढ़ लाख छात्रों को जेईई-एडवांस में बैठने का मौका मिलेगा। यह प्रवेश परीक्षा आइआइटी-संयुक्त एडमीशन बोर्ड की देखरेख में होगी। आइआइटी में दाखिला उन्हीं छात्रों को मिलेगा जो जेईई-एडवांस की मेरिट में लिस्ट में आने के साथ ही अपने स्कूल बोर्ड (12वीं) के टॉप 20 परसेंटाइल छात्रों में शामिल होंगे। दूसरी तरफ, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (एनआइटी) और दूसरे केंद्रीय तकनीकी शिक्षण संस्थानों में दाखिले का आधार जेईई-मुख्य व 12वीं बोर्ड के अंक होंगे। उसके तहत सीबीएसई की संयुक्त प्रवेश परीक्षा-मुख्य (जेईई-मेन) के अंकों को 60 प्रतिशत और इंटरमीडिएट बोर्ड के अंकों को 40 प्रतिशत वेटेज (तवज्जो) के आधार पर मेरिट लिस्ट बनेगी।
Dainik Jagran National Edition 02-10-2012 Education Pej -3

Friday, September 28, 2012

महावीर मेडिकल कॉलेज में अनुसूचित जाति के छात्रों के साथ भेदभाव





बीते दिनों यह तथ्य विभिन्न जांचों के बाद सामने आया कि सफदरजंग अस्पताल के वर्धमान  किया गया था। इस मामले की जांच कर रहे अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पूनिया ने इस पीड़ादायक सत्य को उद्घाटित किया कि दलित छात्रों को जानबूझ कर फेल किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि केवल सफदरजंग ही नहीं, देश के तमाम अन्य बड़े संस्थानों में भी दलित व पिछड़े छात्रों के साथ भेदभाव किया जाता है। आयोग ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय से सिफारिश की है कि दलित छात्रों को भेदभाव से बचाने और उन्हें बेहतर माहौल देने के लिए उपाय किए जाएं। इसके लिए आयोग ने सुझाव दिए हैं। आयोग का यह मानना है कि आइआइटी, आइआइएम, एम्स और केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे देश के चोटी के शिक्षण संस्थान भी दलित छात्रों से भेदभाव कर रहे हैं जिससे दलित विद्यार्थी अपना आत्मविश्वास खो रहे हैं। विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश इस कलंक के साथ कठघरे में खड़ा है कि चहुंओर मानवता के पैरवी करने वाला स्वयं कैसे मानव और मानव के मध्य भेद कर रहा है और वह भी वहां जहां कदम रखते ही भेदभाव, ऊंच-नीच की हर दीवार स्वत: ही गिर जाती है। जातिगत भेद की पीड़ा सिर्फ गांवों की नहीं है, सच तो यह है कि आधुनिक शहरों में भी हर कोई जानना चाहता है कि उसके साथ खड़े व्यक्ति का सरनेम क्या है? यह सरनेम व्यक्ति के नाम और प्रतिभा दोनों पर भारी है। विभिन्न अध्ययन इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि शिक्षण संस्थाओं में जातीय भेदभाव के चलते छात्र न केवल हीनभावना का शिकार हो रहे हैं, बल्कि कई बार तो अपमान और उपेक्षा के चलते अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कमजोर तबकों के लिए कदम-कदम पर खतरे हैं। वे वहां तक पहुंचने के लिए खूब मेहनत करते हैं मगर वहां पहुंचने के बाद उनका आत्मविश्वास चकनाचूर हो जाता है। दलित परिवार में जन्म कदम-कदम पर सामाजिक तिरस्कार और दूसरी मुश्किलों का पर्याय है। सच तो यह है कि छुआछूत और जातिगत भेदभाव मानवता के प्रति सबसे गंभीर अपराध है। यह नस्लभेद से भी भयावह और निंदनीय है। यह सोच निम्न वर्ग से लेकर मध्यमवर्गीय श्रेणी तक ही सीमित नहीं है। आनंद तेलतुंबडे को जातिगत भेदभाव सबसे पहले मुंबई के एक कॉरपोरेट ऑफिस में झेलना पड़ा था। बकौल आनंद अंबेडकर के नेतृत्व ने दलितों में आत्मविश्वास जगाया। मगर अंबेडकर के बाद क्या हुआ? बिखरते, नोटों के लिए बिकते और आरक्षण को रामबाण की तरह पेश करते हमारे नेता आखिर नौजवानों में गर्व और आत्मविश्वास की भावना कैसे जगा सकते हैं? प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक जातिगद भेद का दंश, दलित छात्रों को सिर्फ अपने साथी छात्रों द्वारा ही नहीं, बल्कि प्राध्यापकों द्वारा भी झेलना पड़ता है। आरक्षण को वोट बैंक की जुगत में मुद्दा बनने वाले नेता, इस तथ्य से अंजान है कि इस देश में बड़ी तेजी से एक ऐसा वर्ग पनप रहा है जो आरक्षण नहीं चाहता क्योंकि वह उस वेदना को जीना नहीं चाहता जो उसकी पहचान आते ही उसकी झोली में स्वत: आ जाती अपनी ही जन्मभूमि में प्रताड़ना, अपमान और तिरस्कार दलित युवाओं को कुंठित कर रहा है। इससे वह न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक तौर पर भी पिछड़ रहे हैं। विश्व मानचित्र में अगर भारत को स्वयं की छवि मानवीय रखनी है तो विभेद की रेखा को मिटाना ही होगा। माना यह सहज नहीं है क्योंकि सवर्ण वर्ग अपने तथाकथित वर्चस्व को सहजता से छोड़ने को तैयार नहीं होगा। अत: इस देश को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो चुनावी राजनीति और आरक्षण पर बहस के इतर खुशी और ऊर्जा के साथ अपनी पहचान को बनाए रखते हुए आगे बढ़ें और यह विश्वास करें कि उनका अस्तित्व देश के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि किसी उच्च जाति के व्यक्ति का। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) उच्च शिक्षा में दलित छात्रों के उत्पीड़न पर डॉ. ऋतु सारस्वत की टिप्पणी शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव

दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण, पेज 8  , 26-09-2012   f’k{kk