Tuesday, July 19, 2011
Saturday, July 16, 2011
दाखिलों में नहीं बढ़ेगा सांसदों का कोटा
स्कूलों में दाखिलों की दिक्कत से जूझ रहे माता-पिता को उनके सांसद भी ज्यादा राहत नहीं दिला पाएंगे। कानून मंत्रालय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उस प्रस्ताव को हरी झंडी देने से इंकार कर दिया है जिसमें केंद्रीय विद्यालयों के दाखिलों में सांसदों का कोटा दो से बढ़ाकर पांच करने की बात कही गई थी। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल की पहल पर उनके मंत्रालय ने केंद्रीय विद्यालयों के दाखिले में सांसदों के कोटे को बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था। मंत्रालय ने कानूनी बाध्यताओं के तहत प्रस्ताव पर कानून मंत्रालय की मंजूरी मांगी थी। बताते हैं कि कानून मंत्रालय ने सुप्रीमकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए विवेकाधीन कोटे के मामले को जन नीति के दायरे में आने की बात कही है। साथ ही विवेकाधीन कोटे के मनमाने उपयोग की गुंजाइश से बचने की भी पैरवी की। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कोटे को बढ़ाने के पीछे केंद्रीय विद्यालयों की संख्या 871 से बढ़कर 1085 हो जाने का तर्क दिया था। कानून मंत्रालय ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया है कि जिस लिहाज से सांसदों के कोटे की सीटें बढ़ाने की मांग की गई है, उस हिसाब से केंद्रीय विद्यालयों की संख्या नहीं बढ़ी है। वैसे भी यह मामला कानूनी नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रकृति का है। लिहाजा मंत्रालय को इस बारे में अपने स्तर पर ही फैसला लेना चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कहना था कि मानव संसाधन विकास मंत्री के कोटे की हर साल 1200 सीटों पर दाखिले का प्रावधान 2010 से ही खत्म किया जा चुका है। सांसदों के कोटे को दो से पांच करने पर हर शैक्षिक सत्र में सिर्फ 2400 अतिरिक्त दाखिले ही करने होंगे। सांसद अपने कोटे के हर साल पांच दाखिलों में से तीन को अपने संसदीय क्षेत्र में और दो को अपने क्षेत्र के ही लोगों के बच्चों के लिए दिल्ली में उपयोग कर सकेंगे। राज्यसभा सांसद अपने प्रदेश व दिल्ली में अपने कोटे का इस्तेमाल कर सकते थे। दूसरी बात यह कि इससे शिक्षा का अधिकार कानून के तहत वर्ग विशेष के लिए 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों पर भी कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। जिन सांसदों के क्षेत्र में केंद्रीय विद्यालय नहीं हैं, वे अपने बगल के संसदीय क्षेत्र में कोटे का इस्तेमाल कर सकते थे।
Tuesday, July 12, 2011
सवा लाख शिक्षा मित्रों को शिक्षक का दर्जा देंगी माया
शिक्षामित्रों को बेसिक स्कूलों में स्थायी शिक्षक का दर्जा देने पर मुख्यमंत्री मायावती ने कैबिनेट की बैठक में मुहर लगा दी। फैसले के अनुसार सूबे के एक लाख 24 हजार स्नातक शिक्षा मित्रों को दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से दो वर्षीय बीटीसी प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण के बाद शिक्षामित्र सूबे के प्राथमिक स्कूलों में बतौर शिक्षक नियुक्त होने की शैक्षिक योग्यता हासिल कर लेंगे और उनकी स्थायी नियुक्ति का रास्ता साफ हो जाएगा। शिक्षामित्रों को यह प्रशिक्षण दो चरणों में दिया जाएगा। पहला चरण 2011-13 और दूसरा 2013-15 में होगा। प्रत्येक चरण में 62,000 शिक्षामित्र प्रशिक्षित किये जाएंगे। इस संबंध में सोमवार को शासनादेश भी जारी कर दिया गया है। अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण करने पर एससीईआरटी की ओर से उन्हें प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा। प्रशिक्षण के दौरान शिक्षा मित्रों को स्कूलों में पढ़ाना होगा। इस बीच शिक्षा मित्रों को 3500 रुपये प्रति माह मानदेय मिलता रहेगा। शासन ने जून 2015 तक 1.24 लाख स्नातक शिक्षामित्रों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य तय किया है।
पृष्ठ संख्या 01, दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण), 12 जुलाई, 2011
Thursday, July 7, 2011
जर्जर बुनियाद पर टिकी शिक्षा
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संसदीय समिति ने देश की प्राथमिक शिक्षा से जुड़े दो प्रमुख ज्वलंत मुद्दों पर राज्य सरकारों से जवाब-तलब किया है। इसमें पहला मुद्दा मिड-डे मील में बढ़ते भ्रष्टाचार का है तो दूसरा प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की नामांकन संख्या में आ रही लगातार गिरावट का है। उल्लेखनीय है कि मिड-डे मील योजना स्कूलों में गरीब तबकों के बच्चों को पोषाहार उपलब्ध कराने के लिए लागू की गई थी और उम्मीद की गई थी कि इससे स्कूलों में ड्रापआउट रेट अर्थात बीच में ही पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या की दर को घटाने में मदद मिलेगी। साथ ही साथ उनका पोषण स्तर भी ठीक रहेगा। उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखंड समेत आधा दर्जन राज्यों ने इस योजना की धनराशि दूसरे मदों में खर्च करने की बात स्वीकार की है। इसे लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कड़ी नाराजगी जाहिर करने के साथ ही योजना प्रबंधन के तौर-तरीकों पर भी नए सिरे से विचार करने की बात कही है। देश में सर्वप्रथम मिड-डे मील योजना 1960 में तमिलनाडु में शुरू हुई थी। योजना की सफलता देखते हुए बाद में इसका अनुकरण गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश व राजस्थान सरकारों ने भी किया। इस योजना का प्रमुख उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा के विस्तार में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करना था। 28 नवंबर 2001 को उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देश के बाद यह योजना देश के सभी सरकारी एवं सहायता प्राप्त स्कूलों में शुरू हुई, लेकिन मिड-डे मील योजना आज भ्रष्टाचार का एक लाभकारी साधन बनकर रह गई है। पिछले साल अप्रैल में केंद्र सरकार ने बच्चों की शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाते हुए शिक्षा अधिकार कानून लागू किया। इसके लिए प्राथमिक शिक्षा के मद में अतिरिक्त बजट दिया गया, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहा। आंकड़े बताते हैं मिड-डे मील योजना ने देश की प्राथमिक शिक्षा का बहुत भला नहीं किया है। 2007 के बाद से पूरे देश में प्राथमिक स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या में अच्छी-खासी गिरावट आई है। 2008 से 2010 के बीच कक्षा एक से लेकर कक्षा चार तक के बच्चों का नामांकन 26 लाख घटा है। केवल उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो पिछले दो वर्षो में दस लाख नामांकन घटे हैं। इसके अलावा बिहार, राजस्थान, तमिलनाडु में भी बच्चों का नामांकन लगातार घट रहा है। इस मामले में असम सर्वाधिक प्रभावित राज्य है। आजादी के बाद 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा देने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी। इसके तहत ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, अनौपचारिक शिक्षा तथा महिला समाख्या के अलावा आंध्र प्रदेश में बेसिक शिक्षा परियोजना, राजस्थान में लोक जुंबिश तथा उत्तर प्रदेश में सर्वशिक्षा अभियान तथा जिला प्राथमिक शिक्षा जैसे प्रमुख कार्यक्रम रहे हैं। इन सभी परियोजनाओं का मूल उद्देश्य बुनियादी शिक्षा के माध्यम से देश में सामाजिक न्याय और समानता स्थापित करना था। पिछले छह दशकों में देश की प्राथमिक शिक्षा में तीस गुना तथा उच्च प्राथमिक शिक्षा में चालीस गुना से भी अधिक की वृद्धि हुई है। बावजूद इसके प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर धुंधली नजर आती है। छह से 14 वर्ष तक के दो करोड़ बच्चों में से आधे बच्चे भी स्कूलों तक नहीं पहुंच रहे हैं और मिड-डे मील योजना के बावजूद भी ड्रापआउट दर बहुत अधिक है। शिक्षा का बुनियादी ढांचा कमजोर है तथा शिक्षण दिनचर्या भी उबाऊ है। उच्चतम न्यायालय के मुताबिक पूरे देश में लगभग 1800 स्कूल टेंट और पेड़ों के नीचे चल रहे हैं। 24 हजार स्कूलों में पक्के भवन नही हैं। एक लाख से भी अधिक स्कूलों में पीने के पानी का प्रबंध नहीं है तथा 45 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालयों जैसी सुविधाओं का अभाव है। लाखों शिक्षकों के पद आज भी रिक्त हैं। राज्य सरकारें बजट की कमी का तर्क देकर अल्प वेतन पर शिक्षामित्र, शिक्षाकर्मी तथा पैरा टीचर्स की नियुक्ति करके कामचलाऊ व्यवस्था चला रही हैं। शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद 14 वर्ष तक के बच्चों को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा देना आज संवैधानिक मजबूरी बन गई है, लेकिन इस हेतु बजट के लिए हमें विदेशी संस्थाओं का मुंह ताकना पड़ता है। विकास के जिस अंग्रेजी मॉडल का अनुकरण किया गया उससे हमारी मातृभाषा से जुड़ी प्राथमिक शिक्षा पृष्ठभूमि में चली गई। देश की संसद को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून बनाने में छह दशक लग गए। नि:संदेह आज राष्ट्र की प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी मिड-डे मील योजना के संचालन में भ्रष्टाचार एक गंभीर चिंता का विषय है। देश के प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे के निरंतर कमजोर होने का यह परिणाम रहा कि राष्ट्र के अहसास से जुड़ी बुनियादी सस्थाएं भी कमजोर होती चली गई। इस संबंध में भ्रष्टाचार का समाजशास्त्र बताता है कि जब लोग अपने राष्ट्र के नैतिक चरित्र से कट जाते हैं तो उनमें चारित्रिक विचारधारा का लोप होने लगता है। देश की बुनियादी शिक्षा तक उनके लिए स्वार्थसिद्धि और खुदगर्जी का साधन बन जाती है। राष्ट्र में जवाबदेही के वातावरण का निर्माण हो, इसके लिए प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्थाओं पर राष्ट्रीय प्रतिबद्धता से जुड़े लोगों का आसीन होना जरूरी है। प्राथमिक शिक्षा किसी भी देश की रीढ़ होती है और जब किसी देश की रीढ़ टूटती है तो आकर्षक से आकर्षक इमारतें भी भरभराकर गिरने लगती हैं। देश की प्राथमिक शिक्षण संस्थाओं के साथ आज भी यह क्रम जारी है। यदि देश में मिड-डे मील जैसी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करना है तो प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे को न केवल मजबूत बनाना होगा, बल्कि शिक्षक व शिक्षण की गुणवत्ता को भी बढ़ाना होगा। इस काम को किए बिना प्राथमिक शिक्षण को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। (लेखक समाज शास्त्र के प्राध्यापक हैं).
Wednesday, July 6, 2011
उठने लगी राष्ट्रीय परीक्षा नीति की मांग
एक तरह के पाठ्यक्रम के लिए अलग-अलग परीक्षाओं को आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं प्रतीत होता है। उदाहरण केलिए यदि कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो क्या जरूरत है कि उसे विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में बैठना पड़े। विार्थी इतनी परीक्षाएं देते-देते पस्त हो जाता है और असफल होने पर कुंठा व निराशा का शिकार भी बनता है। केवल मेडिकल ही नहीं, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की परीक्षाओं में भी अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित की जा रही हैं..भी तक क्रिकेट में ही लीग मैचेज हुआ करते थे, अब स्कूल-कॉलेज और विश्वविालयों में भी परीक्षा लीग इस तरह बढ़ती जा रही है कि परीक्षार्थियों केसाथ अभिभावक भी परेशान हो गए हैं। पहले मुख्य रूप से तिमाही, छमाही और वार्षिक ये ही तीन परीक्षाएं ली जाती थीं। छोटी कक्षाओं में इस तरह की परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं था। लेकिन अब वार्षिक परीक्षा या मासिक परीक्षा के अलावा भी नित्य परीक्षाएं आयोजित हो रही हैं। इसमें प्रवेश परीक्षा, जांच परीक्षा, योग्यता परीक्षा, दक्षता परीक्षा, क्वालिफाइंग परीक्षा व चयन परीक्षा और न जाने कैसी-कैसी परीक्षाओं के आयोजन स्कूल-कॉलेज व विश्वविालय ही नहीं अपितु इसके लिए बनी कई निजी संस्थाएं इस समय हर शहर में काम कर रही हैं।
बस इनको आप जिम्मेदारी दे दीजिए। इन संस्थाओं ने आज अपना इस क्षेत्र में केवल मुकाम ही नहीं बनाया है, बल्कि इसकी बदौलत अच्छी-खासी रकम भी पैदा कर रही हैं। इससे भी बड़ी बात व चिंता का विषय यह है कि इनके पाठ्यक्रम भी अलग-अलग हैं। परीक्षा के नाम पर रोज बाजार में नई-नई विभिन्न विषयों की पुस्तकें आ रही हैं। इनके प्रकाशकों की तो चांदी है, भले ही इन पुस्तकों से परीक्षा में कुछ भी न पूछा जाता हो। हां, इसके पीछे की जो कहानी है, वह जरूर एक अलग दास्तां बयान करती है। इस धंधे से जुड़े मेरे कुछ मित्र हैं, उनका कहना है कि इन पुस्तकों के प्रकाशकों व मुद्रकों के पास कोई प्रकाशक मंडल नहीं है, फिर भी वे कुछ जानी-मानी हस्तियों के नाम पुस्तक में लिखकर अपनी शाख बनाते हैं और उसके सहारे करोड़ों रुपए की कमाई कुछ काली तो कुछ सफेद कर रहे हैं। जिसका नाम पुस्तक में देते हैं, उसे पारिश्रमिक के नाम पर कुछ रुपए थमा देते हैं। यही वजह है कि परीक्षाओं की बाढ़ आ गई है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति स्नातक, परास्नातक के अलावा बीएड की डिग्री भी हासिल किए है, किंतु उसे भी शिक्षक बनने के लिए शिक्षक पात्रता की परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है। आखिर इन परीक्षाओं का क्या मतलब है? पिछले दिनों प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद केअध्यक्ष सीएनआर राव ने खुद इतनी तरह की परीक्षाओं के बोझ और तनाव से लदे छात्रों की दुर्दशा पर गहरी चिंता जताते हुए कहा था कि भारत में उचित शिक्षा व्यवस्था नहीं है। परिणाम हो रहा है कि विार्थी जीवन का लंबा समय फिजूल की इन परीक्षाओं में ही उलझ कर रह जाता है। उसे समाज या देश के लिए सोचने का अवसर ही नहीं मिल पाता है। वह कोई सार्थक कार्य भी नहीं कर पाता है। उल्टे छात्र की ऊर्जा व सर्जनात्मकता धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है। आगे चलकर वह निराशा और कुंठा का शिकार हो जाता है।
परीक्षाओं के मकड़जाल से विार्थियों को तत्काल मुक्त कराने की जरूरत है। अब समय आ गया है कि परीक्षा का मॉडल बदला जाए और परीक्षाएं एक ही स्तर यानी राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाएं। इधर कुछ क्षेत्रों में ऐसी परीक्षाएं लेने का प्रयास शुरू भी हो गया है। इसे कम से कम इंटरमीडिएट के स्तर तक जरूर ले जाना चाहिए। एक तरह के पाठ्यक्रम के लिए अलग-अलग परीक्षाओं को आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं प्रतीत होता है। उदाहरण केलिए यदि कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो क्या जरूरत है कि उसे विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में बैठना पड़े। विार्थी इतनी परीक्षाएं देते-देते पस्त हो जाता है और असफल होने पर कुंठा व निराशा का शिकार भी बनता है। केवल मेडिकल ही नहीं, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की परीक्षाओं में भी अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित की जा रही हैं। यही हाल कानून की पढ़ाई अथवा विभिन्न स्नातक व परास्नातक पाठ्यक्रमों का भी है। जरूरी है कि एक तरह के पाठ्यक्रम के लिए एक अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा हो। इसके लिए केंद्र सरकार को ही पहल करनी होगी। कई अवसरों पर मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने इस तरह के विचार व्यक्त भी किए हैं। अमेरिका जैसे विकसित देश में छात्रों को किसी एक स्ट्रीम में जाने के लिए सिर्फ एक ही परीक्षा देनी पड़ती है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस मकड़जाल को तोड़ने के लिए कई समितियों का गठन भी किया है। लेकिन फिलहाल कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट के अभी हालिया निर्णय के बाद इसकेलागू होने की उम्मीद जरूर बढ़ी है। इससे छात्रों का हित तो होगा ही, भ्रष्टाचार व कदाचार से भी मुक्ति मिल सकेगी। अभी तक जो लोग परीक्षा के नाम पर धंधा करते आ रहे हैं, उस पर भी लगाम लगेगी।
(लेखक अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षक महासंघ के महामंत्री हैं)
बस इनको आप जिम्मेदारी दे दीजिए। इन संस्थाओं ने आज अपना इस क्षेत्र में केवल मुकाम ही नहीं बनाया है, बल्कि इसकी बदौलत अच्छी-खासी रकम भी पैदा कर रही हैं। इससे भी बड़ी बात व चिंता का विषय यह है कि इनके पाठ्यक्रम भी अलग-अलग हैं। परीक्षा के नाम पर रोज बाजार में नई-नई विभिन्न विषयों की पुस्तकें आ रही हैं। इनके प्रकाशकों की तो चांदी है, भले ही इन पुस्तकों से परीक्षा में कुछ भी न पूछा जाता हो। हां, इसके पीछे की जो कहानी है, वह जरूर एक अलग दास्तां बयान करती है। इस धंधे से जुड़े मेरे कुछ मित्र हैं, उनका कहना है कि इन पुस्तकों के प्रकाशकों व मुद्रकों के पास कोई प्रकाशक मंडल नहीं है, फिर भी वे कुछ जानी-मानी हस्तियों के नाम पुस्तक में लिखकर अपनी शाख बनाते हैं और उसके सहारे करोड़ों रुपए की कमाई कुछ काली तो कुछ सफेद कर रहे हैं। जिसका नाम पुस्तक में देते हैं, उसे पारिश्रमिक के नाम पर कुछ रुपए थमा देते हैं। यही वजह है कि परीक्षाओं की बाढ़ आ गई है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति स्नातक, परास्नातक के अलावा बीएड की डिग्री भी हासिल किए है, किंतु उसे भी शिक्षक बनने के लिए शिक्षक पात्रता की परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है। आखिर इन परीक्षाओं का क्या मतलब है? पिछले दिनों प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद केअध्यक्ष सीएनआर राव ने खुद इतनी तरह की परीक्षाओं के बोझ और तनाव से लदे छात्रों की दुर्दशा पर गहरी चिंता जताते हुए कहा था कि भारत में उचित शिक्षा व्यवस्था नहीं है। परिणाम हो रहा है कि विार्थी जीवन का लंबा समय फिजूल की इन परीक्षाओं में ही उलझ कर रह जाता है। उसे समाज या देश के लिए सोचने का अवसर ही नहीं मिल पाता है। वह कोई सार्थक कार्य भी नहीं कर पाता है। उल्टे छात्र की ऊर्जा व सर्जनात्मकता धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है। आगे चलकर वह निराशा और कुंठा का शिकार हो जाता है।
परीक्षाओं के मकड़जाल से विार्थियों को तत्काल मुक्त कराने की जरूरत है। अब समय आ गया है कि परीक्षा का मॉडल बदला जाए और परीक्षाएं एक ही स्तर यानी राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाएं। इधर कुछ क्षेत्रों में ऐसी परीक्षाएं लेने का प्रयास शुरू भी हो गया है। इसे कम से कम इंटरमीडिएट के स्तर तक जरूर ले जाना चाहिए। एक तरह के पाठ्यक्रम के लिए अलग-अलग परीक्षाओं को आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं प्रतीत होता है। उदाहरण केलिए यदि कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो क्या जरूरत है कि उसे विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में बैठना पड़े। विार्थी इतनी परीक्षाएं देते-देते पस्त हो जाता है और असफल होने पर कुंठा व निराशा का शिकार भी बनता है। केवल मेडिकल ही नहीं, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की परीक्षाओं में भी अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित की जा रही हैं। यही हाल कानून की पढ़ाई अथवा विभिन्न स्नातक व परास्नातक पाठ्यक्रमों का भी है। जरूरी है कि एक तरह के पाठ्यक्रम के लिए एक अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा हो। इसके लिए केंद्र सरकार को ही पहल करनी होगी। कई अवसरों पर मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने इस तरह के विचार व्यक्त भी किए हैं। अमेरिका जैसे विकसित देश में छात्रों को किसी एक स्ट्रीम में जाने के लिए सिर्फ एक ही परीक्षा देनी पड़ती है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस मकड़जाल को तोड़ने के लिए कई समितियों का गठन भी किया है। लेकिन फिलहाल कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट के अभी हालिया निर्णय के बाद इसकेलागू होने की उम्मीद जरूर बढ़ी है। इससे छात्रों का हित तो होगा ही, भ्रष्टाचार व कदाचार से भी मुक्ति मिल सकेगी। अभी तक जो लोग परीक्षा के नाम पर धंधा करते आ रहे हैं, उस पर भी लगाम लगेगी।
(लेखक अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षक महासंघ के महामंत्री हैं)
Monday, July 4, 2011
शिक्षा पर गंभीर सवाल
झारखंड में परीक्षाफल से उपजी परिस्थितियों में शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी खामी देख रहे हैं लेखक
अरस्तू ने कहा था कि नेतृत्व के खराब कमरें और अदूरदर्शिता का खामियाजा बिना किसी गलती के भी आम जनता को भुगतना पड़ता है। आज यह बात पूरे भारत पर लागू होती दिख रही है-खासकर शिक्षा के क्षेत्र में। झारखंड का एक ताजा मामला इसका प्रमाण भी है। सचमुच झारखंड में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद विकास का अभाव, भ्रष्टाचार, माओवाद आदि के बीच झारखंड की सरकार और शासन-व्यवस्था ने राज्य का मजाक बना दिया है। हालात सिर्फ राजनीतिक परिक्षेत्र के खराब न होकर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक क्षेत्रों तक के खराब हैं। झारखंड में इंटरमीडिएट के परीक्षाफल से उपजी परिस्थितियों ने पूरे देश के सामने शिक्षा प्रणाली को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो सीबीएसई या अन्य राज्यों के बोर्डो के इंटरमीडिएट के रिजल्ट के बाद विद्यार्थी विभिन्न स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेकर अपने स्वर्णिम भविष्य की तैयारी में जुट जाते हैं, लेकिन झारखंड में इंटरमीडिएट के परीक्षाफल के बाद आक्रोश और निराशा-हताशा का आलम छाया हुआ है। महज 41 प्रतिशत विद्यार्थी ही कामयाब हुए हैं। साइंस के मात्र 28 फीसदी छात्र सफल हुए। ऐसी ही स्थिति कॉमर्स की भी है। कला विषयों की हालत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है। बड़ी संख्या में अनेक विद्यार्थी ऐसे हैं, जो देश की विभिन्न इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेजों की प्रवेश परीक्षा में अच्छे रैंक से उत्तीर्ण हुए हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि इंटर की परीक्षा में फेल हो गए हैं। इन मेधावी विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों में शून्य अंक तक दिए गए हैं। विद्यार्थी इतने बदहवास-निराश हो चले हैं कि दो ने आत्महत्या कर ली है। अन्य कई विद्यार्थियों ने भी इस तरह के प्रयास किए। अनेक अवसादग्रस्त हो गए हैं। इस समय पूरे देश में जहां छात्र अपने सुखद भविष्य के सपने देख रहे हैं, वहीं झारखंड के छात्र क्रमिक अनशन, भूख हड़ताल और आंदोलन पर उतरे हुए हैं। आक्रोश इतना ज्यादा है कि झारखंड इंटरमीडिएट शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी महासंघ व अखंड प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ इस मामले में एक मंच पर मिलकर सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ने को कूद पड़े हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की प्रतिक्रिया शुरू से ही अत्यंत ढीली-ढाली और निराशापूर्ण रही- खास तौर से मानव संसाधन विभाग और झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) की, जो इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार है। झारखंड सरकार की ही तरह झारखंड एकेडमिक काउंसिल में पूरी अव्यवस्था छाई हुई है। न मूल्यांकन प्रणाली निश्चित है और न ही परीक्षक। किस प्रणाली के आधार पर कॉपी की जांच हो रही है, शिक्षकों को नहीं पता है। प्रदेश की मैट्रिक व इंटर शिक्षा सीबीएसई सिलेबस पर आधारित है। मूल्यांकन पद्धति पुराने ढर्रे पर (बिहार वाली) ही चल रही है। हालांकि, बिहार में मूल्यांकन पद्धति में बदलाव हो चुका है। मूल्यांकन से पूर्व मुख्य परीक्षक व परीक्षकों को मार्किंग स्कीम या जांच कार्य को संपादित करने के बारे में जानकारी नहीं दी जाती है। प्रभाव रिजल्ट पर दिख रहा है। वर्ष 2010 का भी रिजल्ट खराब रहा था। विज्ञान में महज 30 प्रतिशत विद्यार्थी ही पास हो सके थे। रांची में कॉलेज के प्राचार्यो की एक बैठक में खराब रिजल्ट के लिए पूरी तरह जैक को जिम्मेदार ठहराया गया है और सभी कॉलेजों ने एक सुर में कहा कि जैक व कॉलेजों के बीच संवादहीनता है। दवाब में आकर सरकार और झारखंड एकेडमिक काउंसिल ने कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन आधे अधूरे तरीके से। छात्र कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन की मांग कर रहे थे, पर जैक ने शाही फरमान जारी कर दिया है कि किसी भी स्थिति में कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन नहीं हो सकता है। केवल स्क्रूटनी हो सकती है। इस संबंध में छात्रों का कहना है कि गड़बड़ रिजल्ट देने के बाद इस प्रकार की बातें ठीक नहीं हैं। सचमुच पौने दो लाख छात्रों के भविष्य को लेकर सरकार और झारखंड एकेडमिक काउंसिल का रवैया जरा भी सहानुभूतिपूर्ण नहीं है। यहां यह समझ लिया जाए कि स्क्रूटनी में कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन नहीं होता सिर्फ किसी प्रश्न में अगर अंक न दिए गए हों तो अंक दे दिए जाते हैं, जबकि पुनर्मूल्यांकन में पूरी जांच फिर से होती है। जब सीबीएसई के पैटर्न पर नया सिलेबस बना तो उसी पद्धति पर चरणबद्ध मार्किंग और मार्किंग स्कीम के तहत कॉपियों की जांच होनी चाहिए। चरणबद्ध मार्किंग में प्रश्नों के उत्तर को चार या पांच चरणों में बांट दिया जाता है। प्रत्येक चरण के लिए अंकों का निर्धारण होता है। अगर छात्र एक चरण में भी सही उत्तर देता है तो उसे अंक मिलता है, केवल अंतिम उत्तर न मिलने और अन्य भाग के सही रहने पर छात्रों को 80 फीसदी अंक तक दिए जाते हैं। यह अपने आपमें एक सही और संतुलित पद्धति भी है, लेकिन वहां के मानव संसाधन विभाग और जैक ने इसको पूर्णरूपेण लागू करने में कोई तत्परता नहीं दिखाई और कोई जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय उलटे शिक्षकों और छात्रों को ही दोषी ठहराया। झारखंड का मूल निवासी होने के नाते मैंने इस संदर्भ में जैक के अध्यक्ष से फोन पर बात की कि विद्यार्थियों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। मैंने सुझाव दिया कि स्क्रूटनी की बजाय कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन ही सही हल है, लेकिन उन्होंने इस सुझाव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि झारखंड के कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है और पूरे देश में ऐसा कहीं नहीं होता। यह कहकर उन्होंने फोन पटक दिया। यहां यह बताना जरूरी है कि कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन गैरकानूनी और असामान्य स्थिति नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में ही कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन होता रहता है। अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालयों में प्राध्यापन के दौरान पुनर्मूल्यांकन तो छोडि़ए हमें विद्यार्थियों को कॉपियां तक दिखानी पड़ती थीं। एक अभूतपूर्व स्थिति से निपटने के लिए झारखंड में पुनर्मूल्यांकन के लिए अगर कानून और नियमों में संशोधन करना पडे़ तो इससे पीछे नहीं हटना चाहिए। आखिर ऐसा करने से कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा। हमारे संविधान में संशोधन लगातार होते रहते हैं। अरस्तू के समय में लोकतंत्र नहीं था, लेकिन आज के लोकतांत्रिक समय में सरकार और अधिकारी क्या आम जनता के हित में कभी सोचेंगे? कम से कम शिक्षा के क्षेत्र में तो हमारे नीति-नियंताओं को नियम-कायदों और परंपराओं की आड़ लेना समाप्त करने के लिए आगे आना ही चाहिए। (लेखक दिल्ली विवि में एसोसिएट प्रोफेसर हैं).
Friday, July 1, 2011
उच्च शिक्षा का यह निम्न कारोबार
क्या यह उन उम्मीदवारों के साथ भद्दा मजाक नहीं है, जिन्होंने सालों मेहनत करके नेट या स्लेट क्वालीफाई किया? उनकी बराबरी वे करेंगे, जो ठेके पर अपनी थीसिस लिखा लाए या किसी दूसरी थीसिस से चुराकर नई थीसिस तैयार कर ली और पीएचडी हो गए? जिस डिग्री की कहीं भी कोई सुव्यवस्थित परीक्षा प्रणाली आजतक नहीं थी और अभी भी नहीं बनी है, वह डिग्री एक राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के बराबर कैसे हो सकती है?च्च शिक्षा का निम्न कारोबार केवल ग्रेजुएट होने का दाखिला लेने में ही नहीं है। देश में उच्च शिक्षा के शीर्ष समझे जानेवाले पीएचडी शोध के लिए जिस तरह से शिक्षक लॉबी और धनपति कारोबार कर रहे हैं, उसकी दशा तो और भी दयनीय है। देश में भ्रष्टाचार और लालफीताशाही कितनी ताकतवर है, यह एक बार हम फिर देख सकते हैं, जहां यूजीसी ने हाल में ही दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को भी रद्दी की टोकरी में फेंककर अपनी दबंगई का अहसास पूरे देश को करा दिया है। उसने अपने ही बनाए 25 साल पुराने मानदंडों को चंद रईसजादों के स्वार्थ के लिए छिन्न-भिन्न कर दिया है। पूरा मामला ठंडे दिमाग से समझना होगा। भरतीय गड़बड़तंत्र में उच्च शिक्षा की नियामक संस्थाओं में एक यूजीसी ने उच्च शिक्षा में उच्चतम गुणवत्ता युक्त शिक्षण सुनिश्चित करने के लिए 1985 में एक राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षा आयोजित करने और इस परीक्षा में अर्हता प्राप्त उम्मीदवारों को ही उच्च शिक्षा की शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन हेतु पात्र मानने का निर्णय लिया था, जिसका देशभर में स्वागत किया गया था। इस परीक्षा में तीन-तीन प्रश्नपत्रों के जरिए उम्मीदवार के समग्र विषय ज्ञान के साथ-साथ शोध अभियोग्यता व समग्र अध्यापक व्यक्तित्व की भी परीक्षा ली जाती रही। इस परीक्षा को राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा नाम दिया गया और इसे वर्ष में दो बार आयोजित किया जाने लगा। पिछले 25 वर्षो से यह परीक्षा देशभर में हर साल दो बार आयोजित की जाती रही है।
यूजीसी के इस नियम से भ्रष्ट प्राध्यापकों का धंधा चौपट हो गया, क्योंकि छात्रों ने अब पीएचडी करने के बजाय नेट क्वालीफाई करने हेतु पढ़ना शुरू कर दिया था। अब न तो प्राध्यापकों के मनोरंजन के लिए शोध छात्राएं थीं और न आटा पिसाने वाले शोध छात्र। सो प्राध्यापकों की निहित स्वार्थी लॉबी नेट के विरुद्ध संगठित हो गई। इसमें उन अफसरों, नेताओं और धनपतियों का भी सहयोग उन्हें मिला, जो अपनी बीवियों, बच्चों और चमचों को कॉलेजों में चिपकाना चाहते थे, लेकिन नेट क्वालीफाई करने की बाधा उनके सामने थी। इस बाधा को दूर करने के लिए भ्रष्ट तंत्र का सहारा लिया गया और यूजीसी में मनमाफिक लोग भेजे गए। परिणाम यह हुआ कि यूजीसी ने 1993 तक पीएचडी उपाधि प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को नेट के समकक्ष मान लिया। तब शायद यह सोचा गया होगा कि व्यवस्था को लूटने वाले लुटेरों की महत्वाकांक्षाएं इसके आगे नहीं जाएंगी, लेकिन यह सिलसिला नहीं रुका और यूजीसी पर दबाव बनाते हुए पहले यह सीमा वर्ष 2000 तक और फिर 2002 तक बढ़ा दी गई। लेकिन सवाल तो प्राध्यापकों के धंधे की मंदी का भी था, सो अब हमेशा के लिए पीएचडी को नेट/स्लेट के बराबर मान लिया गया।
इस मनमानी को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक प्रकरण में संज्ञान में लिया और यूजीसी को निर्देशित किया कि नेट का विकल्प पीएचडी नहीं हो सकती, लेकिन व्यवस्था पर जोंक की तरह चिपके ताकतवरों ने इस निर्णय को कोई तवज्जो नहीं दी। आज भी देश में यूजीसी का नया नियम ही ससम्मान लागू है। सवाल यह है कि पीएचडी जब नेट के बराबर ही है तो फिर अब यूजीसी देश के विश्वविालयों पर पीएचडी हेतु प्रवेश परीक्षा/चयन परीक्षा लेने का दबाव क्यों बना रही है? आज तक जो पीएचडी हुई हैं, उनमें खुद यूजीसी को कलमकारी पीएचडी की गंध आती है। एक ऐसी परीक्षा, जिसमें विषय की समग्र परीक्षा ली जाती है, उस उपाधि के बराबर कैसे हो सकती है जिसका कोई भी सर्वमान्य मानक देशभर में नहीं है। अगर पीएचडी डिग्री नेट के बराबर है तो फिर कोई अभ्यर्थी नेट की परीक्षा क्यों देगा? वह पीएचडी करने का आसान रास्ता क्यों नहीं चुनेगा? और, फिर यूजीसी खुद यह परीक्षा हर साल दो-दो बार आयोजित कराके देश का समय और धन क्यों बर्बाद करती है?
एक और मजेदार बात यह भी है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करने जा रही हैं, जो प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अपरिहार्य योग्यता होगी, भले ही उनके पास बीएड या डीएड जैसी डिग्री हो, जबकि उच्च कक्षाओं में पढ़ाने के लिए यूजीसी ने अपनी ही बनाई नेट अर्हता वाली शर्त को किसी भी तरह कबाड़ी गई पीएचडी के समकक्ष मान लिया है। नेट की तर्ज पर देश के अधिकतर राज्यों में राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा स्लेट या सेट भी आयोजित की जा रही हैं, जो यूजीसी के नए नियम के कारण पीएचडी के बराबर हो गई हैं।
क्या यह उन उम्मीदवारों के साथ भद्दा मजाक नहीं है, जिन्होंने सालों मेहनत करके नेट या स्लेट क्वालीफाई किया? उनकी बराबरी वे करेंगे, जो ठेके पर अपनी थीसिस लिखा लाए या किसी दूसरी थीसिस से चुराकर नई थीसिस तैयार कर ली और पीएचडी हो गए? जिस डिग्री की कहीं भी कोई सुव्यवस्थित परीक्षा प्रणाली आजतक नहीं थी और अभी भी नहीं बनी है, वह डिग्री एक राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के बराबर कैसे हो सकती है? लेकिन भ्रष्टतंत्र में कुछ भी संभव है, वरना उच्च न्यायालय के निर्णय को इतनी दबंगई के साथ खारिज नहीं किया जा सकता था।
यूजीसी के इस नियम से भ्रष्ट प्राध्यापकों का धंधा चौपट हो गया, क्योंकि छात्रों ने अब पीएचडी करने के बजाय नेट क्वालीफाई करने हेतु पढ़ना शुरू कर दिया था। अब न तो प्राध्यापकों के मनोरंजन के लिए शोध छात्राएं थीं और न आटा पिसाने वाले शोध छात्र। सो प्राध्यापकों की निहित स्वार्थी लॉबी नेट के विरुद्ध संगठित हो गई। इसमें उन अफसरों, नेताओं और धनपतियों का भी सहयोग उन्हें मिला, जो अपनी बीवियों, बच्चों और चमचों को कॉलेजों में चिपकाना चाहते थे, लेकिन नेट क्वालीफाई करने की बाधा उनके सामने थी। इस बाधा को दूर करने के लिए भ्रष्ट तंत्र का सहारा लिया गया और यूजीसी में मनमाफिक लोग भेजे गए। परिणाम यह हुआ कि यूजीसी ने 1993 तक पीएचडी उपाधि प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को नेट के समकक्ष मान लिया। तब शायद यह सोचा गया होगा कि व्यवस्था को लूटने वाले लुटेरों की महत्वाकांक्षाएं इसके आगे नहीं जाएंगी, लेकिन यह सिलसिला नहीं रुका और यूजीसी पर दबाव बनाते हुए पहले यह सीमा वर्ष 2000 तक और फिर 2002 तक बढ़ा दी गई। लेकिन सवाल तो प्राध्यापकों के धंधे की मंदी का भी था, सो अब हमेशा के लिए पीएचडी को नेट/स्लेट के बराबर मान लिया गया।
इस मनमानी को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक प्रकरण में संज्ञान में लिया और यूजीसी को निर्देशित किया कि नेट का विकल्प पीएचडी नहीं हो सकती, लेकिन व्यवस्था पर जोंक की तरह चिपके ताकतवरों ने इस निर्णय को कोई तवज्जो नहीं दी। आज भी देश में यूजीसी का नया नियम ही ससम्मान लागू है। सवाल यह है कि पीएचडी जब नेट के बराबर ही है तो फिर अब यूजीसी देश के विश्वविालयों पर पीएचडी हेतु प्रवेश परीक्षा/चयन परीक्षा लेने का दबाव क्यों बना रही है? आज तक जो पीएचडी हुई हैं, उनमें खुद यूजीसी को कलमकारी पीएचडी की गंध आती है। एक ऐसी परीक्षा, जिसमें विषय की समग्र परीक्षा ली जाती है, उस उपाधि के बराबर कैसे हो सकती है जिसका कोई भी सर्वमान्य मानक देशभर में नहीं है। अगर पीएचडी डिग्री नेट के बराबर है तो फिर कोई अभ्यर्थी नेट की परीक्षा क्यों देगा? वह पीएचडी करने का आसान रास्ता क्यों नहीं चुनेगा? और, फिर यूजीसी खुद यह परीक्षा हर साल दो-दो बार आयोजित कराके देश का समय और धन क्यों बर्बाद करती है?
एक और मजेदार बात यह भी है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करने जा रही हैं, जो प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अपरिहार्य योग्यता होगी, भले ही उनके पास बीएड या डीएड जैसी डिग्री हो, जबकि उच्च कक्षाओं में पढ़ाने के लिए यूजीसी ने अपनी ही बनाई नेट अर्हता वाली शर्त को किसी भी तरह कबाड़ी गई पीएचडी के समकक्ष मान लिया है। नेट की तर्ज पर देश के अधिकतर राज्यों में राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा स्लेट या सेट भी आयोजित की जा रही हैं, जो यूजीसी के नए नियम के कारण पीएचडी के बराबर हो गई हैं।
क्या यह उन उम्मीदवारों के साथ भद्दा मजाक नहीं है, जिन्होंने सालों मेहनत करके नेट या स्लेट क्वालीफाई किया? उनकी बराबरी वे करेंगे, जो ठेके पर अपनी थीसिस लिखा लाए या किसी दूसरी थीसिस से चुराकर नई थीसिस तैयार कर ली और पीएचडी हो गए? जिस डिग्री की कहीं भी कोई सुव्यवस्थित परीक्षा प्रणाली आजतक नहीं थी और अभी भी नहीं बनी है, वह डिग्री एक राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के बराबर कैसे हो सकती है? लेकिन भ्रष्टतंत्र में कुछ भी संभव है, वरना उच्च न्यायालय के निर्णय को इतनी दबंगई के साथ खारिज नहीं किया जा सकता था।
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