Wednesday, July 6, 2011

उठने लगी राष्ट्रीय परीक्षा नीति की मांग


एक तरह के पाठ्यक्रम के लिए अलग-अलग परीक्षाओं को आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं प्रतीत होता है। उदाहरण केलिए यदि कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो क्या जरूरत है कि उसे विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में बैठना पड़े। विार्थी इतनी परीक्षाएं देते-देते पस्त हो जाता है और असफल होने पर कुंठा व निराशा का शिकार भी बनता है। केवल मेडिकल ही नहीं, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की परीक्षाओं में भी अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित की जा रही हैं..भी तक क्रिकेट में ही लीग मैचेज हुआ करते थे, अब स्कूल-कॉलेज और विश्वविालयों में भी परीक्षा लीग इस तरह बढ़ती जा रही है कि परीक्षार्थियों केसाथ अभिभावक भी परेशान हो गए हैं। पहले मुख्य रूप से तिमाही, छमाही और वार्षिक ये ही तीन परीक्षाएं ली जाती थीं। छोटी कक्षाओं में इस तरह की परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं था। लेकिन अब वार्षिक परीक्षा या मासिक परीक्षा के अलावा भी नित्य परीक्षाएं आयोजित हो रही हैं। इसमें प्रवेश परीक्षा, जांच परीक्षा, योग्यता परीक्षा, दक्षता परीक्षा, क्वालिफाइंग परीक्षा व चयन परीक्षा और न जाने कैसी-कैसी परीक्षाओं के आयोजन स्कूल-कॉलेज व विश्वविालय ही नहीं अपितु इसके लिए बनी कई निजी संस्थाएं इस समय हर शहर में काम कर रही हैं।

बस इनको आप जिम्मेदारी दे दीजिए। इन संस्थाओं ने आज अपना इस क्षेत्र में केवल मुकाम ही नहीं बनाया है, बल्कि इसकी बदौलत अच्छी-खासी रकम भी पैदा कर रही हैं। इससे भी बड़ी बात व चिंता का विषय यह है कि इनके पाठ्यक्रम भी अलग-अलग हैं। परीक्षा के नाम पर रोज बाजार में नई-नई विभिन्न विषयों की पुस्तकें आ रही हैं। इनके प्रकाशकों की तो चांदी है, भले ही इन पुस्तकों से परीक्षा में कुछ भी न पूछा जाता हो। हां, इसके पीछे की जो कहानी है, वह जरूर एक अलग दास्तां बयान करती है। इस धंधे से जुड़े मेरे कुछ मित्र हैं, उनका कहना है कि इन पुस्तकों के प्रकाशकों व मुद्रकों के पास कोई प्रकाशक मंडल नहीं है, फिर भी वे कुछ जानी-मानी हस्तियों के नाम पुस्तक में लिखकर अपनी शाख बनाते हैं और उसके सहारे करोड़ों रुपए की कमाई कुछ काली तो कुछ सफेद कर रहे हैं। जिसका नाम पुस्तक में देते हैं, उसे पारिश्रमिक के नाम पर कुछ रुपए थमा देते हैं। यही वजह है कि परीक्षाओं की बाढ़ आ गई है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति स्नातक, परास्नातक के अलावा बीएड की डिग्री भी हासिल किए है, किंतु उसे भी शिक्षक बनने के लिए शिक्षक पात्रता की परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है। आखिर इन परीक्षाओं का क्या मतलब है? पिछले दिनों प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद केअध्यक्ष सीएनआर राव ने खुद इतनी तरह की परीक्षाओं के बोझ और तनाव से लदे छात्रों की दुर्दशा पर गहरी चिंता जताते हुए कहा था कि भारत में उचित शिक्षा व्यवस्था नहीं है। परिणाम हो रहा है कि विार्थी जीवन का लंबा समय फिजूल की इन परीक्षाओं में ही उलझ कर रह जाता है। उसे समाज या देश के लिए सोचने का अवसर ही नहीं मिल पाता है। वह कोई सार्थक कार्य भी नहीं कर पाता है। उल्टे छात्र की ऊर्जा व सर्जनात्मकता धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है। आगे चलकर वह निराशा और कुंठा का शिकार हो जाता है।

परीक्षाओं के मकड़जाल से विार्थियों को तत्काल मुक्त कराने की जरूरत है। अब समय आ गया है कि परीक्षा का मॉडल बदला जाए और परीक्षाएं एक ही स्तर यानी राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाएं। इधर कुछ क्षेत्रों में ऐसी परीक्षाएं लेने का प्रयास शुरू भी हो गया है। इसे कम से कम इंटरमीडिएट के स्तर तक जरूर ले जाना चाहिए। एक तरह के पाठ्यक्रम के लिए अलग-अलग परीक्षाओं को आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं प्रतीत होता है। उदाहरण केलिए यदि कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो क्या जरूरत है कि उसे विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में बैठना पड़े। विार्थी इतनी परीक्षाएं देते-देते पस्त हो जाता है और असफल होने पर कुंठा व निराशा का शिकार भी बनता है। केवल मेडिकल ही नहीं, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की परीक्षाओं में भी अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित की जा रही हैं। यही हाल कानून की पढ़ाई अथवा विभिन्न स्नातक व परास्नातक पाठ्यक्रमों का भी है। जरूरी है कि एक तरह के पाठ्यक्रम के लिए एक अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा हो। इसके लिए केंद्र सरकार को ही पहल करनी होगी। कई अवसरों पर मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने इस तरह के विचार व्यक्त भी किए हैं। अमेरिका जैसे विकसित देश में छात्रों को किसी एक स्ट्रीम में जाने के लिए सिर्फ एक ही परीक्षा देनी पड़ती है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस मकड़जाल को तोड़ने के लिए कई समितियों का गठन भी किया है। लेकिन फिलहाल कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट के अभी हालिया निर्णय के बाद इसकेलागू होने की उम्मीद जरूर बढ़ी है। इससे छात्रों का हित तो होगा ही, भ्रष्टाचार व कदाचार से भी मुक्ति मिल सकेगी। अभी तक जो लोग परीक्षा के नाम पर धंधा करते आ रहे हैं, उस पर भी लगाम लगेगी।

(
लेखक अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षक महासंघ के महामंत्री हैं)

Monday, July 4, 2011

शिक्षा पर गंभीर सवाल


झारखंड में परीक्षाफल से उपजी परिस्थितियों में शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी खामी देख रहे हैं  लेखक 
अरस्तू ने कहा था कि नेतृत्व के खराब कमरें और अदूरदर्शिता का खामियाजा बिना किसी गलती के भी आम जनता को भुगतना पड़ता है। आज यह बात पूरे भारत पर लागू होती दिख रही है-खासकर शिक्षा के क्षेत्र में। झारखंड का एक ताजा मामला इसका प्रमाण भी है। सचमुच झारखंड में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद विकास का अभाव, भ्रष्टाचार, माओवाद आदि के बीच झारखंड की सरकार और शासन-व्यवस्था ने राज्य का मजाक बना दिया है। हालात सिर्फ राजनीतिक परिक्षेत्र के खराब न होकर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक क्षेत्रों तक के खराब हैं। झारखंड में इंटरमीडिएट के परीक्षाफल से उपजी परिस्थितियों ने पूरे देश के सामने शिक्षा प्रणाली को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो सीबीएसई या अन्य राज्यों के बोर्डो के इंटरमीडिएट के रिजल्ट के बाद विद्यार्थी विभिन्न स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेकर अपने स्वर्णिम भविष्य की तैयारी में जुट जाते हैं, लेकिन झारखंड में इंटरमीडिएट के परीक्षाफल के बाद आक्रोश और निराशा-हताशा का आलम छाया हुआ है। महज 41 प्रतिशत विद्यार्थी ही कामयाब हुए हैं। साइंस के मात्र 28 फीसदी छात्र सफल हुए। ऐसी ही स्थिति कॉमर्स की भी है। कला विषयों की हालत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है। बड़ी संख्या में अनेक विद्यार्थी ऐसे हैं, जो देश की विभिन्न इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेजों की प्रवेश परीक्षा में अच्छे रैंक से उत्तीर्ण हुए हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि इंटर की परीक्षा में फेल हो गए हैं। इन मेधावी विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों में शून्य अंक तक दिए गए हैं। विद्यार्थी इतने बदहवास-निराश हो चले हैं कि दो ने आत्महत्या कर ली है। अन्य कई विद्यार्थियों ने भी इस तरह के प्रयास किए। अनेक अवसादग्रस्त हो गए हैं। इस समय पूरे देश में जहां छात्र अपने सुखद भविष्य के सपने देख रहे हैं, वहीं झारखंड के छात्र क्रमिक अनशन, भूख हड़ताल और आंदोलन पर उतरे हुए हैं। आक्रोश इतना ज्यादा है कि झारखंड इंटरमीडिएट शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी महासंघ व अखंड प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ इस मामले में एक मंच पर मिलकर सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ने को कूद पड़े हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की प्रतिक्रिया शुरू से ही अत्यंत ढीली-ढाली और निराशापूर्ण रही- खास तौर से मानव संसाधन विभाग और झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) की, जो इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार है। झारखंड सरकार की ही तरह झारखंड एकेडमिक काउंसिल में पूरी अव्यवस्था छाई हुई है। न मूल्यांकन प्रणाली निश्चित है और न ही परीक्षक। किस प्रणाली के आधार पर कॉपी की जांच हो रही है, शिक्षकों को नहीं पता है। प्रदेश की मैट्रिक व इंटर शिक्षा सीबीएसई सिलेबस पर आधारित है। मूल्यांकन पद्धति पुराने ढर्रे पर (बिहार वाली) ही चल रही है। हालांकि, बिहार में मूल्यांकन पद्धति में बदलाव हो चुका है। मूल्यांकन से पूर्व मुख्य परीक्षक व परीक्षकों को मार्किंग स्कीम या जांच कार्य को संपादित करने के बारे में जानकारी नहीं दी जाती है। प्रभाव रिजल्ट पर दिख रहा है। वर्ष 2010 का भी रिजल्ट खराब रहा था। विज्ञान में महज 30 प्रतिशत विद्यार्थी ही पास हो सके थे। रांची में कॉलेज के प्राचार्यो की एक बैठक में खराब रिजल्ट के लिए पूरी तरह जैक को जिम्मेदार ठहराया गया है और सभी कॉलेजों ने एक सुर में कहा कि जैक व कॉलेजों के बीच संवादहीनता है। दवाब में आकर सरकार और झारखंड एकेडमिक काउंसिल ने कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन आधे अधूरे तरीके से। छात्र कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन की मांग कर रहे थे, पर जैक ने शाही फरमान जारी कर दिया है कि किसी भी स्थिति में कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन नहीं हो सकता है। केवल स्क्रूटनी हो सकती है। इस संबंध में छात्रों का कहना है कि गड़बड़ रिजल्ट देने के बाद इस प्रकार की बातें ठीक नहीं हैं। सचमुच पौने दो लाख छात्रों के भविष्य को लेकर सरकार और झारखंड एकेडमिक काउंसिल का रवैया जरा भी सहानुभूतिपूर्ण नहीं है। यहां यह समझ लिया जाए कि स्क्रूटनी में कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन नहीं होता सिर्फ किसी प्रश्न में अगर अंक न दिए गए हों तो अंक दे दिए जाते हैं, जबकि पुनर्मूल्यांकन में पूरी जांच फिर से होती है। जब सीबीएसई के पैटर्न पर नया सिलेबस बना तो उसी पद्धति पर चरणबद्ध मार्किंग और मार्किंग स्कीम के तहत कॉपियों की जांच होनी चाहिए। चरणबद्ध मार्किंग में प्रश्नों के उत्तर को चार या पांच चरणों में बांट दिया जाता है। प्रत्येक चरण के लिए अंकों का निर्धारण होता है। अगर छात्र एक चरण में भी सही उत्तर देता है तो उसे अंक मिलता है, केवल अंतिम उत्तर न मिलने और अन्य भाग के सही रहने पर छात्रों को 80 फीसदी अंक तक दिए जाते हैं। यह अपने आपमें एक सही और संतुलित पद्धति भी है, लेकिन वहां के मानव संसाधन विभाग और जैक ने इसको पूर्णरूपेण लागू करने में कोई तत्परता नहीं दिखाई और कोई जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय उलटे शिक्षकों और छात्रों को ही दोषी ठहराया। झारखंड का मूल निवासी होने के नाते मैंने इस संदर्भ में जैक के अध्यक्ष से फोन पर बात की कि विद्यार्थियों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। मैंने सुझाव दिया कि स्क्रूटनी की बजाय कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन ही सही हल है, लेकिन उन्होंने इस सुझाव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि झारखंड के कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है और पूरे देश में ऐसा कहीं नहीं होता। यह कहकर उन्होंने फोन पटक दिया। यहां यह बताना जरूरी है कि कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन गैरकानूनी और असामान्य स्थिति नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में ही कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन होता रहता है। अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालयों में प्राध्यापन के दौरान पुनर्मूल्यांकन तो छोडि़ए हमें विद्यार्थियों को कॉपियां तक दिखानी पड़ती थीं। एक अभूतपूर्व स्थिति से निपटने के लिए झारखंड में पुनर्मूल्यांकन के लिए अगर कानून और नियमों में संशोधन करना पडे़ तो इससे पीछे नहीं हटना चाहिए। आखिर ऐसा करने से कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा। हमारे संविधान में संशोधन लगातार होते रहते हैं। अरस्तू के समय में लोकतंत्र नहीं था, लेकिन आज के लोकतांत्रिक समय में सरकार और अधिकारी क्या आम जनता के हित में कभी सोचेंगे? कम से कम शिक्षा के क्षेत्र में तो हमारे नीति-नियंताओं को नियम-कायदों और परंपराओं की आड़ लेना समाप्त करने के लिए आगे आना ही चाहिए। (लेखक दिल्ली विवि में एसोसिएट प्रोफेसर हैं).

Friday, July 1, 2011

उच्च शिक्षा का यह निम्न कारोबार



क्या यह उन उम्मीदवारों के साथ भद्दा मजाक नहीं है, जिन्होंने सालों मेहनत करके नेट या स्लेट क्वालीफाई किया? उनकी बराबरी वे करेंगे, जो ठेके पर अपनी थीसिस लिखा लाए या किसी दूसरी थीसिस से चुराकर नई थीसिस तैयार कर ली और पीएचडी हो गए? जिस डिग्री की कहीं भी कोई सुव्यवस्थित परीक्षा प्रणाली आजतक नहीं थी और अभी भी नहीं बनी है, वह डिग्री एक राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के बराबर कैसे हो सकती है?च्च शिक्षा का निम्न कारोबार केवल ग्रेजुएट होने का दाखिला लेने में ही नहीं है। देश में उच्च शिक्षा के शीर्ष समझे जानेवाले पीएचडी शोध के लिए जिस तरह से शिक्षक लॉबी और धनपति कारोबार कर रहे हैं, उसकी दशा तो और भी दयनीय है। देश में भ्रष्टाचार और लालफीताशाही कितनी ताकतवर है, यह एक बार हम फिर देख सकते हैं, जहां यूजीसी ने हाल में ही दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को भी रद्दी की टोकरी में फेंककर अपनी दबंगई का अहसास पूरे देश को करा दिया है। उसने अपने ही बनाए 25 साल पुराने मानदंडों को चंद रईसजादों के स्वार्थ के लिए छिन्न-भिन्न कर दिया है। पूरा मामला ठंडे दिमाग से समझना होगा। भरतीय गड़बड़तंत्र में उच्च शिक्षा की नियामक संस्थाओं में एक यूजीसी ने उच्च शिक्षा में उच्चतम गुणवत्ता युक्त शिक्षण सुनिश्चित करने के लिए 1985 में एक राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षा आयोजित करने और इस परीक्षा में अर्हता प्राप्त उम्मीदवारों को ही उच्च शिक्षा की शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन हेतु पात्र मानने का निर्णय लिया था, जिसका देशभर में स्वागत किया गया था। इस परीक्षा में तीन-तीन प्रश्नपत्रों के जरिए उम्मीदवार के समग्र विषय ज्ञान के साथ-साथ शोध अभियोग्यता व समग्र अध्यापक व्यक्तित्व की भी परीक्षा ली जाती रही। इस परीक्षा को राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा नाम दिया गया और इसे वर्ष में दो बार आयोजित किया जाने लगा। पिछले 25 वर्षो से यह परीक्षा देशभर में हर साल दो बार आयोजित की जाती रही है।

यूजीसी के इस नियम से भ्रष्ट प्राध्यापकों का धंधा चौपट हो गया, क्योंकि छात्रों ने अब पीएचडी करने के बजाय नेट क्वालीफाई करने हेतु पढ़ना शुरू कर दिया था। अब न तो प्राध्यापकों के मनोरंजन के लिए शोध छात्राएं थीं और न आटा पिसाने वाले शोध छात्र। सो प्राध्यापकों की निहित स्वार्थी लॉबी नेट के विरुद्ध संगठित हो गई। इसमें उन अफसरों, नेताओं और धनपतियों का भी सहयोग उन्हें मिला, जो अपनी बीवियों, बच्चों और चमचों को कॉलेजों में चिपकाना चाहते थे, लेकिन नेट क्वालीफाई करने की बाधा उनके सामने थी। इस बाधा को दूर करने के लिए भ्रष्ट तंत्र का सहारा लिया गया और यूजीसी में मनमाफिक लोग भेजे गए। परिणाम यह हुआ कि यूजीसी ने 1993 तक पीएचडी उपाधि प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को नेट के समकक्ष मान लिया। तब शायद यह सोचा गया होगा कि व्यवस्था को लूटने वाले लुटेरों की महत्वाकांक्षाएं इसके आगे नहीं जाएंगी, लेकिन यह सिलसिला नहीं रुका और यूजीसी पर दबाव बनाते हुए पहले यह सीमा वर्ष 2000 तक और फिर 2002 तक बढ़ा दी गई। लेकिन सवाल तो प्राध्यापकों के धंधे की मंदी का भी था, सो अब हमेशा के लिए पीएचडी को नेट/स्लेट के बराबर मान लिया गया।

इस मनमानी को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक प्रकरण में संज्ञान में लिया और यूजीसी को निर्देशित किया कि नेट का विकल्प पीएचडी नहीं हो सकती, लेकिन व्यवस्था पर जोंक की तरह चिपके ताकतवरों ने इस निर्णय को कोई तवज्जो नहीं दी। आज भी देश में यूजीसी का नया नियम ही ससम्मान लागू है। सवाल यह है कि पीएचडी जब नेट के बराबर ही है तो फिर अब यूजीसी देश के विश्वविालयों पर पीएचडी हेतु प्रवेश परीक्षा/चयन परीक्षा लेने का दबाव क्यों बना रही है? आज तक जो पीएचडी हुई हैं, उनमें खुद यूजीसी को कलमकारी पीएचडी की गंध आती है। एक ऐसी परीक्षा, जिसमें विषय की समग्र परीक्षा ली जाती है, उस उपाधि के बराबर कैसे हो सकती है जिसका कोई भी सर्वमान्य मानक देशभर में नहीं है। अगर पीएचडी डिग्री नेट के बराबर है तो फिर कोई अभ्यर्थी नेट की परीक्षा क्यों देगा? वह पीएचडी करने का आसान रास्ता क्यों नहीं चुनेगा? और, फिर यूजीसी खुद यह परीक्षा हर साल दो-दो बार आयोजित कराके देश का समय और धन क्यों बर्बाद करती है?

एक और मजेदार बात यह भी है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित करने जा रही हैं, जो प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अपरिहार्य योग्यता होगी, भले ही उनके पास बीएड या डीएड जैसी डिग्री हो, जबकि उच्च कक्षाओं में पढ़ाने के लिए यूजीसी ने अपनी ही बनाई नेट अर्हता वाली शर्त को किसी भी तरह कबाड़ी गई पीएचडी के समकक्ष मान लिया है। नेट की तर्ज पर देश के अधिकतर राज्यों में राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा स्लेट या सेट भी आयोजित की जा रही हैं, जो यूजीसी के नए नियम के कारण पीएचडी के बराबर हो गई हैं।

क्या यह उन उम्मीदवारों के साथ भद्दा मजाक नहीं है, जिन्होंने सालों मेहनत करके नेट या स्लेट क्वालीफाई किया? उनकी बराबरी वे करेंगे, जो ठेके पर अपनी थीसिस लिखा लाए या किसी दूसरी थीसिस से चुराकर नई थीसिस तैयार कर ली और पीएचडी हो गए? जिस डिग्री की कहीं भी कोई सुव्यवस्थित परीक्षा प्रणाली आजतक नहीं थी और अभी भी नहीं बनी है, वह डिग्री एक राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के बराबर कैसे हो सकती है? लेकिन भ्रष्टतंत्र में कुछ भी संभव है, वरना उच्च न्यायालय के निर्णय को इतनी दबंगई के साथ खारिज नहीं किया जा सकता था।

Wednesday, June 29, 2011

देश के भविष्य से खिलवाड़


लेखक दाखिले के लिए शत-प्रतिशत अंकों की अनिवार्यता को शिक्षा क्षेत्र की बड़ी विसंगति के रूप में देख रहे हैं...
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स ने इस वर्ष अपने यहां दाखिले की कट ऑफ सूची सौ फीसदी घोषित कर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। वैसे तो पिछले सात-आठ वर्षो से देश के विख्यात कॉलेजों की कट ऑफ सूची नब्बे प्रतिशत के आसपास चल रही है, लेकिन सौ फीसदी की अनिवार्यता घोषित कर इस कालेज ने शिक्षा क्षेत्र की विसंगतियां और उनके प्रति सरकार की उदासीनता उजागर कर दी। इसमें संदेह नहीं कि देश के प्रतिष्ठित कॉलेजों में मेधावी विद्यार्थी ही पहुंच पाते हैं और यदि कोई कॉलेज अपनी कट ऑफ सूची सौ फीसदी रखता है तो वह यही संदेश दे रहा होता है कि वही विद्यार्थी दाखिले के लिए आएं जो मेधावी हों, लेकिन क्या उन छात्रों को मेधावी नहीं माना जाएगा जो 70-80 प्रतिशत नंबर ला रहे हैं? आखिर यह एक तथ्य है कि आज से एक-डेढ़ दशक पहले 70-80 प्रतिशत नंबर लाने वाले विद्यार्थी न केवल मेधावी कहलाते थे, बल्कि विख्यात कॉलेजों में आसानी से दाखिला भी पाते थे। आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ है कि अब सीबीएसई या माध्यमिक शिक्षा के अन्य बोर्डो के विद्यार्थी बड़ी संख्या में 90 प्रतिशत या इससे अधिक नंबर ला रहे हैं? अब स्थिति यह है कि 95 प्रतिशत के नीचे नंबर पाने वाले विद्यार्थियों के अभिभावक परेशान हो उठते हैं, क्योंकि वे यह जानते हैं कि उनके बच्चों को विख्यात कॉलेजों में दाखिला लेने में मुश्किल आ सकती है। आखिर ऐसी स्थिति क्यों आई? क्या ऐसा कुछ है कि बच्चे अचानक अत्यधिक मेधावी हो गए हैं? कहीं ऐसी स्थिति इसलिए तो नहीं बनी कि सीबीएसई ने अपनी परीक्षा प्रणाली बदल दी है? इसमें एक हद तक सच्चाई दिखती है, क्योंकि परीक्षा के बदले पैटर्न के बाद से ही छात्रों में 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाने की होड़ शुरू हो गई है। तमाम छात्र कोचिंग के जरिये शत-प्रतिशत अंक लाने की कोशिश करते हैं। ऐसे कोचिंग इंस्टीट्यूट की भी कमी नहीं जो विद्यार्थियों को शत-प्रतिशत नंबर लाने की कला में पारंगत बनाते हैं। सीबीएसई बोर्ड इसके लिए प्रयत्नशील दिखता है कि ज्यादा संख्या में छात्र अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हों। क्या राजनीतिक स्तर पर बोर्ड को इसके लिए प्रेरित किया गया है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि अब प्रश्न पत्र भी सरल बनने लगे हैं और परीक्षकों को भी अंक देने में उदारता बरतने की सलाह दी जाने लगी है। शायद यही कारण है कि जहां 2007 में सीबीएसई बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में 90 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले छात्रों की संख्या करीब आठ हजार थी वहीं इस वर्ष ऐसे छात्रों की संख्या 20 हजार से ज्यादा है। आज के विद्यार्थियों की पढ़ाई-लिखाई का सारा जोर ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने पर रहता है। इस तरीके की शिक्षा प्रणाली से विद्यार्थियों में संपूर्ण बौद्धिक विकास की संभावना क्षीण होती जा रही है, क्योंकि वे सवालों के जवाब रटने तक केंद्रित रहते हैं। समस्या यह भी है कि परीक्षाओं में घूम-फिर कर वही सवाल पूछे जा रहे हैं जो दो-चार वर्ष पहले आ चुके होते हैं। इन सवालों को हल करते समय बौद्धिक कौशल की परख मुश्किल से हो पाती है। बावजूद इसके कोई भी इस पर विचार करने वाला नहीं कि केवल ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने की होड़ में जुटे विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित कैसे कहा जा सकता है? क्या यह कहा जा सकता है कि ज्यादा अंक लाने की होड़ में फंसे छात्र जीवन की दौड़ में सफलता के चरम पर पहुंच सकते हैं? क्या वे अपने जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान करने में सक्षम होंगे? इस समय शिक्षा का जैसा तंत्र चल रहा है उसमें छात्रों के बौद्धिक कौशल को निखारने और व्यक्तित्व का विकास करने पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। जब तक छात्रों के बौद्धिक कौशल को विकसित करने वाली शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली नहीं बनाई जाती तब तक ऐसी भावी पीढ़ी का निर्माण संभव नहीं जो देश के भविष्य को सुरक्षित रख सके। विडंबना यह है कि आज छात्रों, शिक्षकों और साथ ही स्कूलों का सारा जोर ज्यादा नंबर लाने पर केंद्रित है, क्योंकि इससे ही प्रतिष्ठा का निर्धारण होने लगा है। प्रतिष्ठित कॉलेजों की ऊंची होती कट ऑफ लिस्ट यह बताती है कि ऐसे कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय नाममात्र के हैं जहां दाखिले के लिए मारामारी मचती है। ऐसे शिक्षा संस्थान चंद बड़े शहरों तक ही सीमित हैं और उनमें सीटें भी करीब-करीब यथावत हैं। छोटे और मझोले स्तर के शहरों में ऐसे कॉलेज इक्का-दुक्का हैं जो मेधावी विद्यार्थियों को आकर्षित करते हों। चंद प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों या उनके तहत आने वाले कॉलेजों के शिक्षा स्तर के सामने सामान्य कॉलेजों का शिक्षा स्तर इतना गया बीता है कि अब यह अंतर एक खाई के रूप में नजर आता है। देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों और साथ ही उनके कॉलेजों में पढ़ाई पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता। न तो छात्र पढ़ने पर ध्यान देते हैं और न ही शिक्षक पढ़ाने पर। यहां कभी छात्र हड़ताल के मूड में होते हैं तो कभी शिक्षक। रही-सही कसर स्तरहीन पाठ्यक्रम ने पूरी कर दी है। परिणाम यह है कि इन विश्वविद्यालयों से डिग्री धारकों की ऐसी फौज निकल रही है जो देश के लिए उपयोगी नहीं सिद्ध हो रही। चूंकि हमारे देश में गुणवत्ता प्रधान शिक्षा देने वाले कॉलेजों-विश्वविद्यालयों की संख्या बहुत कम है इसलिए उनकी कट ऑफ सूची लगातार ऊंची होना लाजिमी है। इसके चलते 60-70 अथवा 70-80 प्रतिशत अंक पाने वाले छात्रों का मनोबल टूट रहा है। बहुत संभव है कि 90 और 80 प्रतिशत अंक वाले छात्रों का बौद्धिक स्तर एक जैसा हो, लेकिन आज 80 प्रतिशत नंबर वाले छात्रों के लिए किसी प्रतिष्ठित कॉलेज में कोई स्थान नहीं। इन हालात में सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि प्रतिष्ठित कॉलेज अपने यहां दाखिले के लिए अलग से परीक्षा लें, जैसा कि मेडिकल और इंजीनियरिंग शिक्षा संस्थान करते हैं। इससे कम नंबर पाने वाले विद्यार्थियों को भी 90 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले सीबीएसई बोर्ड के छात्रों के साथ प्रतिष्ठित कॉलेजों में दाखिले का अवसर मिल सकेगा, लेकिन इतने भर से बात बनने वाली नहीं है। आज आवश्यकता इसकी भी है कि गुणवत्ता प्रधान शिक्षा वाले कालेजों जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स, सेंट स्टीफेंस आदि को विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाए। इन्हें अन्य कॉलेजों के शिक्षा स्तर को सुधारने की जिम्मेदारी भी सौंपी जानी चाहिए। देश की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए इस तरह के बहुत से सुझाव सामने आ चुके हैं, लेकिन किन्हीं कारणों से फिलहाल मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल शिक्षा सुधार के अपने एजेंडे पर आगे बढ़ते नहीं दिख रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र के प्रति यह उदासीनता भारत के विकास में एक बड़ी बाधा है। हमारे नीति-नियंताओं को यह आभास होना चाहिए कि वे शिक्षा क्षेत्र में आवश्यक हो चुके सुधारों की अनदेखी कर देश के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं।

शत-प्रतिशत अंकों का खौफ


कार्तिकेय दिल्ली के एक नामी-गिरामी स्कूल में ग्यारहवीं में पढ़ते हैं। मैंने 15 जून, 2011 को उनके चेहरे पर तनाव तथा निराशा के भाव देखे। पूछने पर पता चला कि जबसे उन्होंने दिल्ली के एक कॉलेज में प्रवेश के लिए कट-ऑफ लिस्ट देखी है तभी से चिंतित हैं। दिल्ली के श्रीराम कॉलेज आफ कॉमर्स (एसआरसी) ने विज्ञान के विद्यार्थियों के प्रवेश की अर्हता कक्षा 12 में चार विषयों में शत-प्रतिशत अंकों की रखी है। इस संवेदनहीन घोषणा ने सारे देश में विद्यार्थियों तथा उनके माता-पिता के होश उड़ा दिए हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने अवश्य इस प्रकार के निर्णय की अव्यावहारिकता तथा अस्वीकार्यता को पहचाना और उससे अपनी असहमति व्यक्त की। ग्रेडिंग लागू कर बच्चों को तनाव से मुक्त करने का जो प्रयास किया जा रहा है एसआरसी के इस निर्णय ने उस पर पानी फेर दिया है। मेरा विश्वास है कि इस प्रकार के निर्णय संस्था के सभी अध्यापकों को एक साथ मिल बैठकर करने चाहिए। उसके सभी संभावित पक्षों पर खुली चर्चा होनी चाहिए। कुछ कॉलेज अपनी श्रेष्ठता के लिए जाने जाते हैं। कुछ शायद अपने को इसीलिए श्रेष्ठ मान लेते हैं क्योंकि वहां प्रवेश पाने वालों का प्रतिशत प्रति वर्ष ऊंचा उठता जाता है। आजकल मीडिया, विशेषकर कुछ पाक्षिक तथा साप्ताहिक प्रकाशन कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों की श्रेष्ठता सूचियां बनाने लगे हैं। युवाओं पर इनका प्रभाव पड़ता है। यह अलग तथ्य है कि इन श्रेष्ठता सूचियों के पीछे कुछ और कारण भी होते हैं। जो विद्यार्थी स्नातक स्तर पर कॉमर्स पढ़ना चाहते हैं परंतु बारहवीं तक अन्य विषय पढ़कर आए हैं वे इस शत-प्रतिशत अर्हता के शिकार हुए हैं। इन दोनों वगरें के विद्यार्थी जब साथ-साथ पढ़ते हैं तब उनकी शैक्षिक उपलब्धियों में क्या कोई अंतर आता है? कोई भी श्रेष्ठ संस्थान अपने शोध तथा अध्ययन से इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर खोज सकता है और तदनुसार अगले वर्षो में प्रवेश के नियामक तय कर सकता है। यह भी ध्यान रखना होगा कि प्रवेश प्रणाली ऐसी न बन जाए कि विज्ञान के विद्यार्थी प्रवेश पा ही न सकें? दिल्ली में जब इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं तब सीबीएसई को आधारबिंदु मान लिया जाता है। अकसर भुला दिया जाता है कि देश में चालीस से अधिक स्कूल बोर्ड हैं। सबके अंक निर्धारण अलग-अलग स्तर पर होते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के लगभग सीधे नियंत्रण में कार्यरत सीबीएसई लगातार अधिक से अधिक अंक प्रदान करने के लिए कुछ वषरें से विशेष रूप से प्रयत्नशील रहा है। आज से 15-20 वर्ष पहले अस्सी प्रतिशत अंक पाने वाला विद्यार्थी श्रेष्ठता की सर्वोच्च श्रेणी में माना जाता था। आज यह सम्मान 95-96 प्रतिशत पाने पर भी नहीं मिलता है। संभव है कि दिल्ली के एक कॉलेज ने अनजाने ही ऐसे अनेक पक्षों पर गहन चर्चा तथा गंभीर निर्णय लेने की आवश्यकता को उजागर कर दिया हो। सबसे पहले यह प्रश्न उठता है कि क्या केवल अधिक अंक ही प्रतिभा की श्रेष्ठता के द्योतक हैं या कुछ और पहलु भी व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक हैं? क्या निर्णय लेने की क्षमता, सर्जनात्मकता, कलाओं में अभिरुचि, खेलों में भागीदारी जैसे अन्य पक्ष शिक्षा के आवश्यक अंग नहीं हैं? अंकों का आधार प्रवेश प्रक्रिया को सरल बना देता है मगर उच्च शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करता। हर श्रेष्ठ कॉलेज का कर्तव्य है कि वह 4-5 अन्य कॉलेजों से कार्यकारी संबंध स्थापित करे, उनकी श्रेष्ठता में वृद्धि करने का बीड़ा उठाए तथा गुणवत्ता को बढ़ावा दे। यदि दो देशों के बीच की दो संस्थाओं में इंस्टीट्यूशनल नेटवर्किंग हो सकती है तो दिल्ली विश्वविद्यालय के 4-5 कॉलेजों के बीच क्यों नहीं हो सकती? विश्वविद्यालय को विभिन्न विकल्पों पर विचार करना होगा ताकि एक ही कॉलेज पर अनावश्यक दबाव न पड़े तथा केवल अंक ही मानक बनकर न रह जाएं। यदि अंकों पर जोर बढ़ता गया तो हमें न तो नए तेंदुलकर मिलेंगे और न धौनी। अंकों के आधार पर तो महात्मा गांधी और आइंस्टीन कभी आगे की शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। साइना नेहवाल तथा सानिया मिर्जा जैसी प्रतिभा वाली कितनी ही बालिकाओं की प्रतिभा कोचिंग तथा ट्यूशन केंद्रों पर मिट्टी में मिल जाती। आज देश के पास अपना छह दशकों का शैक्षिक अनुभव है। राष्ट्रीय स्तर पर अनेक संस्थाएं शोध तथा अध्ययन के कार्य कर रही हैं। केंद्र सरकार अपने विशेषज्ञों को ट्रेनिंग के लिए अमेरिका तथा यूरोप भेजती रहती हैं। कक्षा दस में लागू की गई ग्रेडिंग प्रणाली से बच्चों को कुछ तनाव मुक्ति तथा राहत मिली है। यदि कक्षा बारह तथा प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं में नवाचार नहीं किए गए तो तनाव से बचाने के सारे प्रयास व्यर्थ हो जाएंगे। विश्वविद्यालयों तथा स्कूल बोर्ड के बीच लगातार जीवंत संवाद बनाए रखने की कोई कारगर व्यवस्था बनानी होगी, तभी इस प्रकार की समस्याओं का समाधान संभव होगा। इसके साथ-साथ सरकार को भी नए कॉलेज खोलने होंगे। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)


अव्यावहारिक मानदंड


दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ कालेजों ने प्रवेश प्रक्रिया के पहले दौर में जिस तरह 12वीं की परीक्षा में केवल 99-100 प्रतिशत अंक पाने वाले छात्रों को ही दाखिले के योग्य माना उससे देश भर के लोगों का चकित होना स्वाभाविक है। इतनी ऊंची कट ऑफ लिस्ट के बाद यदि वे अभिभावक भी बेचैन हो उठे जो भविष्य में अपने बच्चों को दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने का सपना देख रहे हैं तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। इस पर आश्चर्य नहीं कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के साथ-साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह ने इतनी ऊंची कट ऑफ लिस्ट पर अफसोस जाहिर किया, लेकिन इस समस्या के लिए केवल दिल्ली विश्वविद्यालय के कालेजों को कठघरे में खड़ा कर कर्तव्य की इतिश्री नहीं की जानी चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि इतनी ऊंची कट ऑफ लिस्ट छात्रों और अभिभावकों को हताश करने वाली है, लेकिन इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 12वीं की परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा प्रतिशत अंक पाने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह सही है कि सौ प्रतिशत अंक पाने वाले दो-चार छात्र ही होंगे, लेकिन नब्बे प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले छात्रों की गिनती करना मुश्किल है। एक तथ्य यह है कि जहां 90 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले छात्रों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है वहीं कालेजों की सीटें सीमित बनी हुई हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कालेजों में 54000 सीटें हैं, जबकि प्रवेश पाने वाले छात्रों की संख्या सवा लाख से अधिक होने का अनुमान है। इस स्थिति में कालेजों के लिए अपनी कट-ऑफ लिस्ट ऊंची रखना मजबूरी है। कालेज चाहकर भी सभी छात्रों को दाखिला नहीं दे सकते। इसमें संदेह नहीं कि प्रवेश के लिए 100 अथवा 99 प्रतिशत अंकों की अनिवार्यता अव्यावहारिक भी है और अनुचित भी, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय की इस अव्यावहारिकता से एक लाभ यह हुआ कि उच्च शिक्षा की एक गंभीर समस्या सतह पर आ गई। इस समस्या का समाधान आश्चर्य अथवा अफसोस प्रकट कर नहीं किया जा सकता। यह सही समय है कि इस समस्या के मूल कारणों की पहचान कर उनका निवारण किया जाए। आज जैसी समस्या दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले छात्रों के समक्ष है वैसी ही देश के अन्य हिस्सों के छात्रों के सामने भी है और इसका मूल कारण यह है कि गुणवत्ता प्रधान उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थान गिने-चुने हैं। देश में कुछ राज्य तो ऐसे हैं जहां दिल्ली विश्वविद्यालय के स्तर का एक भी विश्वविद्यालय नहीं। परिणाम यह है कि एक बड़ी संख्या में छात्र बेहतर उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आने के लिए विवश होते हैं। हो सकता है कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की चाह रखने वाले छात्रों को दिलासा देने में समर्थ हो जाएं, लेकिन उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि दिल्ली ही देश नहीं है। इसमें संदेह है कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय अथवा राज्य सरकारें छात्रों को गुणवत्ता प्रधान उच्च शिक्षा दिलाने के प्रति गंभीर हैं। निश्चित रूप से यह उनकी गंभीरता का सूचक नहीं माना जा सकता कि निजी क्षेत्र उच्च शिक्षा संस्थानों का निर्माण करने में लगा हुआ है। उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र का सहयोग लिया ही जाना चाहिए, लेकिन यदि केंद्र अथवा राज्य सरकारें यह सोच रही हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र के सहयोग मात्र से समस्या का समाधान हो जाएगा तो यह सही नहीं।