मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा गीता सार को स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल करने के निर्देश का राज्य में विपक्षी राजनीतिक दलों और अल्पसंख्यक समुदाय ने विरोध शुरू कर दिया है। इससे पहले भी सरकार द्वारा स्कूलों में सूर्य नमस्कार शुरू कराने का विपक्षी दलों एवं अल्पसंख्यक समुदायों ने जमकर विरोध किया था। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नवनियुक्त नेता अजय सिंह राहुल ने मुख्यमंत्री के निर्देश को शिक्षा के भगवाकरण की दिशा में उठाया गया एक और कदम बताते हुए कहा है कि इसका पूरे प्रदेश में कड़ा विरोध किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्कूलों को हवन और गीता पाठ के लिए नहीं बनाया गया है। हम सरकार के इस कदम का पूरे प्रदेश में पुरजोर विरोध करेंगे। भोपाल के आर्कबिशप डॉ. लियो कार्नेलियो ने कहा है कि यह शिक्षा प्रणाली में राज्य सरकार का अनुचित हस्तक्षेप है। यह एक पंथनिरपेक्ष देश है और हमारी अनेक धर्मो वाली संस्कृति है। कांग्रेस विधायक आरिफ अकील ने कहा कि केवल गीता सार ही क्यों, अन्य धर्मो की शिक्षा को भी पाठ्यक्रम में शामिल क्यों नहीं किया जा सकता। माकपा के राज्य सचिव बादल सरोज ने कहा है कि यह घोषणा बेतुकी है, क्योंकि दर्शन, संस्कृत एवं हिन्दी जैसे विषयों में विश्व के अनेक अन्य पौराणिक गं्रथों सहित गीता पहले से ही पाठ्यक्रम का हिस्सा रही है|
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Saturday, April 23, 2011
Wednesday, February 23, 2011
पंजाब में क, ख, ग भी नहीं जानते 7वीं के बच्चे
केंद्र और राज्य सरकार द्वारा सालाना करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद पंजाब में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की बदहाली कम नहीं हो रही है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सातवीं के बच्चों को क, ख, ग तक की पहचान नहीं है। वे ज और ल जोड़कर जल भी नहीं बता पाते। शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने हाल ही में अमृतसर के सरकारी स्कूलों का दौरा किया तो यह हकीकत सामने आई। निरीक्षण दल ने उच्चाधिकारियों को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि स्कूलों में मुआयना करने के दौरान छात्रों का अक्षर ज्ञान शून्य मिला। सरकारी हाई स्कूल मल्लूनंगल पहुंच कर सातवीं के विद्यार्थियों से मातृभाषा पंजाबी की वर्णमाला पूछी तो अधिकतर बच्चों ने चुप्पी साधे रखी। कई बार बच्चों की नजरें अक्षरों की पहचान करने में फेल हो गईं। सातवीं कक्षा के बच्चों को जब कुछ संधि के सवाल पूछे तो बच्चे संधियों के नाम बताना तो दूर छोटे-छोटे शब्दों की संधि तक नहीं बना पाए। अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में बाकायदा लिखा है कि उन्हें हैरानगी है कि ये छात्र आखिर सातवीं कक्षा तक पहुंच कैसे गए हैं जब उनके ज्ञान को देखा जाए तो वह प्राइमरी के लायक भी नहीं हैं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही हाल है। अफसरों ने खुलासा किया है कि जगदेव कलां स्थित सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल पहुंची और यहां प्लस टू के विद्यार्थियों से अंग्रेजी भाषा में सेल्फ इंट्रोडक्शन (आत्म परिचय) देने के लिए कहा, लेकिन 35-40 विद्यार्थी अपना खाता न खोल सके। कोई भी अपना परिचय अंग्रेजी में नहीं दे सका। अफसरों ने खुद ही छात्रों से उनके परिचय से संबंधित सवाल पूछे तो भी कोई छात्र जवाब नहीं दे सका। इतना ही नहीं पाठ्यक्रम से संबंधित सवाल पूछने पर भी विद्यार्थी बगले झांकते नजर आए। मात्र एक विद्यार्थी ने हौसला कर चार-पांच लाइनें सुना कर क्लास टीचर और विद्यार्थियों की इज्जत पर बट्टा लगने से बचाया। निरीक्षण दल के मुखिया कैलाश शर्मा ने बताया कि वह स्कूलों के पढ़ाई के स्तर की रिपोर्ट डीजीएसई कार्यालय को भेज रहे हैं। इन स्कूलों के खिलाफ डीजीएसई कार्यालय द्वारा कार्रवाई की जाएगी। हालांकि उन्होंने विद्यार्थियों में अक्षर ज्ञान न होने और आत्मविश्वास की कमी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
जामिया मिलिया को मिला अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा
जामिया मिलिया इस्लामिया ने अपने नब्बे साल के इतिहास में भले ही कभी अपना अल्पसंख्यक स्वरूप न छोड़ा हो, लेकिन आधिकारिक रूप से इसे तय होने में कई दशक लग गए। मंगलवार को अंतत: यह तय हो गया कि जामिया मिलिया इस्लामिया केंद्रीय विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान है। अब वहां न सिर्फ मुस्लिम बच्चों को दाखिले में 50 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा, बल्कि पहले से चला आ रहा अनुसूचित जाति व जनजाति के छात्रों को 22.5 प्रतिशत और जामिया से ही स्कूली पढ़ाई शुरू करने वालों का 25 प्रतिशत का कोटा भी खत्म हो जाएगा। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग ने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक स्वरूप के बारे में यह एतिहासिक फैसला देकर उसकी नई मंजिल की राह तय कर दी है। फैसला सुनाने के बाद आयोग के चेयरमैन जस्टिस (सेवानिवृत्त) एमएसए. सिद्दीकी ने कहा, हमने कानूनी पहलुओं के आधार पर जामिया को अल्पसंख्यक दर्जे का शिक्षण संस्थान (विश्वविद्यालय) घोषित किया है। संविधान के अनुच्छेद 30 (1) एवं राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग अधिनियम की धारा 2 (जी) में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान परिभाषित हैं। उस रोशनी में देखें तो अपनी स्थापना के बाद से अब तक कभी भी जामिया अपने अल्पसंख्यक स्वरूप के दायरे से बाहर नहीं रहा है। गौरतलब है कि संप्रग की पिछली सरकार में उच्च शिक्षण संस्थानों के दाखिले में पिछड़े वर्ग के छात्रों को 27 प्रतिशत आरक्षण के कानून के साथ ही जामिया में उसके अमल को लेकर विरोध शुरू हो गया था। जामिया टीचर्स एसोसिएशन की ओर से उसके तत्कालीन सचिव प्रो. तबरेज आलम और जामिया ओल्ड ब्वायज एसोसिएशन और जामिया स्टूडेंड यूनियन ने 2006 में न सिर्फ इस आरक्षण का विरोध किया, बल्कि विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे के लिए आयोग में वाद भी दायर कर दिया। वादकारियों ने इसमें जामिया के कुलपति, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय को पक्षकार बनाया था। इस बीच, एक अहम बात यह भी रही कि खुद विश्वविद्यालय प्रशासन (रजिस्ट्रार एसएम अफजल) ने 2006 में आयोग में शपथ पत्र देकर जामिया को अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने का विरोध किया था। हालांकि विश्वविद्यालय ने बाद में नरम रुख अख्तियार कर लिया। जबकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय चाहता था कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित इसी तरह के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बारे में फैसला आने के बाद ही आयोग इस पर निर्णय करे। आयोग के इस फैसले पर जामिया टीचर्स एसोसिएशन के सचिव डॉ. रिजवान कैसर ने कहा कि विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे के बावजूद उसके धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बस दाखिले में सिर्फ दो श्रेणी रह जाएंगी, जिसमें मुस्लिम समुदाय के बच्चों को 50 प्रतिशत और बाकी में सभी दूसरे समुदाय को पढ़ाई का मौका मिलेगा।
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