प्रतियोगी परीक्षा संचालित कराने वाली संस्थाओं को अब पुरानी मानसिकता को बदलना होगा और सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून के तहत परीक्षार्थियों को परीक्षा से जुड़ी सारी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है। जस्टिस आरवी रवींद्रन और एके पटनाइक की पीठ ने इस फैसले के साथ इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (आइसीएआइ) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था इस पारदर्शिता कानून के तहत एक अधिकारी संस्था होना चाहिए, जो आरटीआइ के लिए आने वाले आवेदनों की छंटनी करे। पीठ ने कहा, गोपनीयता का बहाना अब ज्यादा दिन नहीं चलेगा। प्रतियोगी परीक्षा संचालित कराने वाली संस्थाओं, जैसे आइसीएआइ को समझना होगा यह युग ज्यादा से ज्यादा सूचनाओं के आदान-प्रदान का है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि पारदर्शिता ही एकमात्र रास्ता है, जो भ्रष्टाचार को कम कर सकता है। जजों ने कहा, इसमें संदेह नहीं कि पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त काम करना और रिकॉर्डो को ज्यादा संभाल कर रखना होगा। पीठ ने कहा कि अतिरिक्त काम को सूचना न देने की ढाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इन संस्थाओं को आरटीआइ के प्रावधानों को स्वीकारना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश आइसीएआइ द्वारा दायर उस अपील की सुनवाई करते दिए जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त कर सकते हैं।
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Thursday, September 8, 2011
Monday, July 25, 2011
साक्षर भारत मिशन को लेकर उदासीन हैं राज्य
नई दिल्ली कागजों में भले ही बहुत कुछ हो, लेकिन प्रौढ़ अनपढ़ों को साक्षर बनाने का मन शायद राज्य सरकारों का भी नहीं करता। केंद्र ने करीब दो साल पहले साक्षर भारत मिशन शुरू किया था, लेकिन राज्यों ने उसे जरूरी तवज्जो नहीं दी। नतीजा यह है कि कोई भी राज्य ऐसा नहीं, जहां इस मिशन का काम लटका न पड़ा हो। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्य भी इस मामले में कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं। सरकार खुद मानती है कि राज्यों के उदासीन रवैए के चलते निरक्षरता मिटाने के अभियान में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। सूत्रों के मुताबिक पूर्व की समीक्षा बैठक में सहमति जताने के बावजूद बिहार का कामकाज काफी पीछे है। सभी जिला व ब्लाकों पर समन्वयक नहीं नियुक्त हो पाए हैं। बेगूसराय, भोजपुर एवं खगडि़या जिलों में हजारों प्रौढ़ शिक्षा केंद्र अब भी नहीं शुरू हो पाए हैं। सरकार ने 2009-10 में मिशन में शामिल तीन जिलों में धन खर्च की रिपोर्ट भी केंद्र को देने में कोताही की। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का कुछ ऐसा ही हाल है। साक्षर भारत मिशन के पहले चरण (2009-10) में प्रदेश के 26 जिलों को शामिल किया गया था जबकि 66 जिले मिशन में शामिल करने की श्रेणी में आते थे। शेष बचे जिलों को इस साल शामिल किया जाना है। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश ने भी पहले चरण में न सिर्फ धन खर्च में उदासीनता दिखाई, बल्कि स्वयंसेवक शिक्षकों (वालंटियर टीचर) के इंतजाम में कोताही की जबकि उसे लगभग चार लाख ऐसे वालंटियर्स की व्यवस्था करनी थी। प्रौढ़ निरक्षरों को साक्षर बनाने में कुछ इसी से मिलती-जुलती अनदेखी पश्चिम बंगाल, पंजाब और हरियाणा जैसे दूसरे राज्यों में भी सामने आई है। केंद्र की नजर में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र समेत चार प्रदेश की सरकारों ने अपने राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण को जरूरी तवज्जो नहीं दी। मालूम हो कि 2001 में देश में लगभग 30 करोड़ लोग निरक्षर थे। सरकार मानकर चल रही थी कि मिशन कामयाब हुआ तो 2012 तक इसमें 10 से 11 करोड़ की कमी हो जाएगी, लेकिन राज्यों के रुख को देख नहीं लगता कि यह हो पाएगा। सरकार ने 15 से 35 आयु वर्ग के प्रौढ़ निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिए सितंबर, 2009 में साक्षरता भारत मिशन की शुरुआत की थी।
वित्त मंत्री की घोषणा पर एचआरडी ने जताया एतराज
नई दिल्ली वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी भले ही संप्रग सरकार के खजाने के मालिक हों लेकिन ऐसा नहीं है कि वे जिसे जो चाहें दे दें। वित्त मंत्री ने एक निजी उच्च शिक्षण संस्थान को एकमुश्त 10 करोड़ रुपये का विशेष अनुदान का एलान तो अपने बजट में कर दिया, लेकिन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियम-कायदों के दायरे में वह उसका पात्र ही नहीं है। यही वजह है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी) ने पात्रता की शर्ते पूरी किए बगैर उसे अनुदान देने में हाथ खड़े कर दिए हैं। वित्त मंत्री ने इस साल फरवरी में अपने बजट भाषण में मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एमएसइ) चेन्नई को दस करोड़ रुपये का विशेष अनुदान दिए जाने की घोषणा की थी। इस संस्थान के संचालक मंडल के चेयरमैन डॉ. सी रंगराजन हैं। वित्त मंत्री के इस एलान पर अमल की कोशिशें तो चालू वित्त वर्ष के शुरू में ही हो गई थीं, लेकिन अब तक उस पर अमल नहीं हो पाया है। वजह यह है कि यूजीसी सिर्फ उन्हीं सरकारी, डीम्ड या निजी विश्वविद्यालयों व कॉलेजों को अनुदान दे सकता है, जो यूजीसी अधिनियम की धारा 2-एफ व 12-बी के तहत उसके यहां से मान्यता प्राप्त हों। मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स इन उपबंधों के तहत यूजीसी से मान्यता प्राप्त ही नहीं है। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अनुदान व विशेष अनुदान के लिए यूजीसी के इन नियमों-कायदों की बाबत वित्त मंत्रालय के साथ ही मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स को भी अवगत करा दिया है। हालांकि मंत्रालय ने विशेष अनुदान के लिए मना नहीं किया है, लेकिन यह भी साफ कर दिया है कि अनुदान के जरूरी मापदंडों को पूरा करने के बाद ही वह मदद कर पाएगा। मंत्रालय ने मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स को 2-एफ व 12-बी की मान्यता के लिए यूजीसी में आवेदन की सलाह दी है।
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