Sunday, April 3, 2011

सौ फीसदी साक्षरता के लिए दूरस्थ शिक्षा महत्वपूर्ण


स्कूली शिक्षा के दायरे से 81 लाख बच्चों के बाहर होने पर चिंता व्यक्त करते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने शनिवार को कहा कि दूरस्थ शिक्षा बच्चों तक शिक्षा की पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है और इस दिशा में इग्नू की अहम भूमिका है। इग्नू के 22वें दीक्षांत समारोह को वीडियो कांफ्रेंसिंग से संबोधित करते हुए सिब्बल ने कहा कि हम सभी जानते हैं कि सामाजिक एवं आर्थिक विकास की दिशा में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। ताजा जनगणना में साक्षरता दर में 9.2 फीसदी की बढ़ोत्तरी और महिला साक्षरता दर में 11.8 फीसदी का इजाफा शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि अब आबादी का 74 फीसदी हिस्सा यानी 77.84 करोड़ लोग साक्षर हैं। पिछली जनगणना में साक्षरता दर 64.83 फीसदी थी। महिला साक्षरता दर 53 प्रतिशत से बढ़कर 65 प्रतिशत और पुरुष साक्षरता दर 75 प्रतिशत से बढ़कर 82 प्रतिशत हुई है। अभी भी करीब 80 लाख बच्चे स्कूली शिक्षा के दायरे से बाहर हैं जो चिंताजनक है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने कहा कि हमारा लक्ष्य वर्तमान करीब 13 प्रतिशत सकल नामांकन दर को 2020 तक बढ़ाकर 30 प्रतिशत करना और अंतत: पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करना है। सिब्बल ने कहा कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने में दूरस्थ शिक्षा और आन लाइन शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस दिशा में इग्नू को लोगों तक शिक्षा की पहुंच बनाने और डिग्री प्रदान करने से आगे बढ़ते हुए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। सिब्बल ने कहा कि अभी देश में करीब 700 विश्वविद्यालय और 2,600 कॉलेज हैं। 30 प्रतिशत सकल नामांकन दर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आने वाले समय में एक हजार अतिरिक्त विश्वविद्यालय और 20 से 30 हजार कालेजों की जरूरत होगी जो तत्काल संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य के लिए हमें कुछ अलग करने की जरूरत होगी, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित नहीं हो।


जरूरी योग्यता के बिना ही पढ़ा रहे 21 फीसदी शिक्षक


बच्चों को अनिवार्य व मुफ्त शिक्षा के लिए कानून के अमल में आने के एक साल बाद भी चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। छह से 14 साल के 81 लाख बच्चों को स्कूल अब भी नसीब नहीं हो पाया है। पांच लाख से अधिक अतिरिक्त शिक्षक, तीन लाख से अधिक प्रशिक्षक और 14 लाख से अधिक अतिरिक्त क्लासरूम की जरूरत है। 21 प्रतिशत शिक्षकों के पास पढ़ाने की योग्यता नहीं है, लेकिन वे भी पढ़ा रहे हैं। शिक्षा का अधिकार कानून अमल के एक साल पूरा होने के बाद मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने माना कि कानून के अमल की दिशा में बेहतर पहल के बावजूद यह हकीकत चिंताजनक है कि 81 लाख बच्चे अभी भी स्कूल से महरूम हैं। अलबत्ता बीते वर्षों में सर्वशिक्षा अभियान के नतीजे अच्छे रहे हैं। साक्षरता दर 74 प्रतिशत से अधिक हो गई है। लड़कियों की साक्षरता दर में 12 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि पांच लाख से अधिक और शिक्षकों और आर्ट व शारीरिक शिक्षा जैसे पाठ्यक्रमों के लिए तीन लाख से अधिक प्रशिक्षकों की कमी को अगले तीन साल में पूरा किया जाएगा। देश के 9 प्रतिशत स्कूल अभी भी सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि जो अभी पढ़ा रहे हैं, उनमें से 21 प्रतिशत के पास शिक्षकों की योग्यता नहीं है। सबसे अहम् सवाल स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का है। लिहाजा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने अधिसूचना जारी कर दी है। उन्हें पांच साल में सारी योग्यताओं को पूरा करना होगा।


Friday, April 1, 2011

माफियाओं के हाथ में उच्च शिक्षा



ज्ञान और सूचना की सदी के तौर पर घोषित 21वीं सदी में भारतीयों को आगे रखने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय की योजनाओं की कोई सानी नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की योजना है कि देश के नामचीन संस्थान और कॉलेज अपनी खुद की डिग्री बांटें। शिक्षा के विकास को देखते हुए सरकार की इस योजना में कोई बुराई नजर नहीं, अगर कॉलेज या संस्थान नामचीन हैं तो उन्हें डिग्री के लिए किसी पर आश्रित क्यों रहना चाहिए। कुशल हाथ और शिक्षित दिमाग की खोज में जुटी दुनिया के देशों में भारतीय प्रतिभाओं की पहुंच इससे बढ़ेगी। इस तरह एशिया और ज्ञान की 21वीं सदी में भारतीय डंका बज सकेगा। पर इससे पहले सवाल यह है कि वैधानिक तरीकों की आड़ में अपने यहां जिस तरह से शिक्षा में मनमानियां की जा रही हैं, उससे क्या यह लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा। कुछ इसी तरह भारतीय छात्रों का भला चाहते हुए स्वर्गीय अर्जुन सिंह ने डीम्ड विश्वविद्यालयों की श्रृंखला खड़ी कर दी थी। शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने और ज्यादा से ज्यादा छात्रों को डिग्रियां देने के लिए खड़ी की गई इन संस्थाओं की हालत अंदरखाने में देखें तो वास्तविकता साफ हो जाएगी। हकीकत में ये डीम्ड विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटने की दुकान बन गए हैं। दिल्ली से सटे हरियाणा में दो मानद विश्वविद्यालय हैं। दोनों ने अपने अध्यापकों को मौखिक आदेश दे रखे हैं कि किसी छात्र को फेल नहीं करना है। इन विश्वविद्यालयों के संचालकों की समस्या यह है कि अगर उनके यहां छात्र फेल होने लगे तो दूसरी बार उनके यहां एडमिशन कौन लेगा और उनकी शैक्षिक दुकान कैसे चलेगी? दिल्ली के दक्षिणी हिस्से में चल रहे एक संस्थान से लोगों ने दो साल पहले की तारीख में एमफिल का एडमिशन करा लिया और अब वे अध्यापक बनने के लिए जरूरी नेट की परीक्षा से छूट पा गए हैं। सच तो यह है कि यह संस्थान पैसे कमाने और डिग्रियां बांटने की दुकान बन गए हैं। इसलिए क्या गारंटी है कि नामचीन कॉलेजों और संस्थानों को डिग्री देने की सहूलियत मिलते ही उसका फायदा पैसा कमाने की दुकान बन चुके ये संस्थान नहीं उठाएंगे और यह अधिकार पाने के लिए खानापूर्ति करने में कामयाब नहीं होंगे। कहने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक समिति बनाई है जो उन संस्थानों के शैक्षिक इतिहास और गरिमा की जांच करेगी। यह समिति इन कॉलेजों में शिक्षा के स्तर व इतिहास को वर्षो के उनके रिकॉर्ड के आधार पर जांचेगी। इसके साथ ही उन्हें नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल में कम से कम ए श्रेणी में पंजीकृत होना जरूरी होगा। जिस देश में मेडिकल काउंसिल, आइसीटीइए और डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा देने वाली समितियों में पैसों का खेल चलता है, वहां यह कैसे शिक्षा की दुकान बने ये कॉलेज डिग्री बांटने की दुकान नहीं बनेंगे। पहले विश्वविद्यालय से जुड़े होने के कारण इन पर शैक्षिक गुणवत्ता बनाए रखने का थोड़ा बहुत दबाव रहता था जो आगे खत्म ही हो जाएगा। अभी फर्जी डिग्री से पायलटों की भर्ती का मामला चर्चा में है। फर्जी डिग्री से पायलट बनने की कहानी अभी चर्चा में है। इसका कारण भी यही था कि डीजीसीए ऐसी संस्थाओं को प्रशिक्षण की छूट दे दी जिनका मकसद पैसे कमाना था। जयपुर से गिरफ्तार एक छात्र ने कैमरे के सामने बताया कि उसे पायलट ट्रेनिंग के लिए संबंधित संस्थान को पांच लाख रुपये दिए। अगर कमजोर छात्रों को फेल कर दिया जाता और फर्जी डिग्री के आधार छात्रों का प्रवेश नहीं होता तो उनकी कमाई मारी जाती। लिहाजा, उन्होंने अपनी कमाई का तो ध्यान रखा, लेकिन इन अयोग्य पायलटों के हाथों में यात्रियों की सुरक्षा के बारे में विचार करना जरूरी नहीं समझा। कपिल सिब्बल ने मानव संसाधन विकास मंत्री बनते ही डीम्ड विश्वविद्यालयों की जांच कराई थी, जिसमें 128 डीम्ड विश्वविद्यालयों में से 44 किसी भी मानक पर खरे नहीं उतरे, लेकिन इन्होंने फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले रखा है। यानी उनका कुछ बिगड़ता नहीं दिख रहा है, उल्टे छात्रों को वे डिग्री बांटने की कवायद में जुटे हुए हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि संस्थानों और कॉलेजों को डिग्री देने की छूट मिली तो गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए फुलप्रूफ इंतजाम कैसे होंगे। क्या सरकार फिर डीम्ड विश्वविद्यालयों की तरह इंतजार करेगी कि वे कैसा प्रदर्शन करते हैं और फिर उन पर सवाल खड़े करेगी और वही ढाक के तीन पात वाली कहानी दोहराई जाती रहेगी। शिक्षा की दुकानों को  यह अधिकार ठीक नहीं



ऐसे तो नहीं मिल पाएगा शिक्षा का अधिकार


अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का कानून बनाकर सरकार खुश तो हो सकती है, लेकिन उसमें दिखावा ज्यादा हकीकत कम है। आलम यह है कि कानून को बने एक साल पूरा होने पर भी कोई राज्य इस कानून के प्रावधानों पर खरा नहीं उतरा है। एक भी ऐसा राज्य नहीं है कि जहां बच्चों को पढ़ाई की पूरी सामग्री मुफ्त उपलब्ध हो। जबकि खुद राजधानी दिल्ली में भी ऐसे उदाहरण हैं जहां बच्चों के लिए स्कूल तक नहीं है। इंतहा यह है कि सिर्फ 16 फीसदी लोगों को ही इस कानून की जानकारी है। केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष एक अप्रैल को 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का कानून लागू किया था। पहला साल बहुत उत्साहव‌र्द्धक नहीं है। सरकारी कागजी रिपोर्ट जो भी बताए, लेकिन जमीन पर काम करने वालों का तजुर्बा तो इसकी खराब तस्वीर ही सामने लगता है। बचपन बचाओ आंदोलन ने पिछले महीनों में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे नौ राज्यों से जो आंकड़ा इकट्ठा किया है वह हर किसी पर उंगली उठाता है। सिर्फ सरकारी स्कूलों की बात भी हो तो इन नौ राज्यों के 251 स्कूलों में से 24 फीसदी बच्चे ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। उत्तर प्रदेश में ड्राप आउट 30 फीसदी और बिहार में 25 फीसदी पाया गया। मुफ्त शिक्षा भी उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 20 फीसदी स्कूल एडमिशन फीस वसूल रहे हैं जबकि 40 फीसदी स्कूलों मंे पढ़ाई की सामग्री के पैसे देने पड़ रहे हैं। ध्यान रहे कि कानून के अनुसार सभी चीजें मुफ्त देने का प्रावधान है। पठन सामग्री के बाबत बिहार की स्थिति सबसे खराब है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार के 80 फीसदी स्कूलों में किसी तरह की पाठ्य सामग्री मुफ्त उपलब्ध नहीं है। उत्तर प्रदेश के सिर्फ 33 फीसदी स्कूलों में सिर्फ पुस्तक उपलब्ध है, नोट बुक या यूनीफार्म नहीं। झारखंड की स्थिति थोड़ा अच्छी है जहां 75 फीसदी स्कूलों में पुस्तक दी जा रही है। कानून को असरदार बनाने के लिए स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (एसएमसी) का प्रावधान किया था और उसे निगरानी की जिम्मेदारी दी गई थी। पर हालत यह है कि बिहार के 68 फीसदी और मध्य प्रदेश के 73 फीसदी स्कूलों में एसएमसी का गठन नहीं हुआ। गुरुवार को जारी होने वाली इस रिपोर्ट में सरकार को दिल्ली का हाल भी बता दिया गया है। दिल्ली के ही एक गांव बदरपुर खादर की स्थिति यह है कि इस गांव में अब तक कोई स्कूल ही नहीं है। जाहिर है कि फिलहाल दीपक तले ही अंधेरा है.


चार लाख बच्चों का एडमिशन



नर्सरी में दाखिला की दौड़ खत्म होने के बाद अब सरकारी स्कूलों में कक्षा 6 से लेकर कक्षा 8 तक में करीब चार लाख बच्चों के लिए दाखिले का दरवाजा कल से खुल रहा है। राजधानी के सभी 934 सरकारी स्कूलों में 1 अप्रैल से दाखिला शुरू होगा। दिल्ली नगर निगम के स्कूलों में कक्षा पांच की पढ़ाई पूरी करने वाले बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में प्राथमिकता के आधार पर होगा। इसके लिए निगम स्कूल के पास स्थित सरकारी स्कूलों में पांचवीं पास कर चुके बच्चों की सूची भेज दी गई है। सरकारी स्कूलों में दाखिले के दौरान सबसे बड़ी राहत की बात यह होगी कि न तो कोई परीक्षा होगी और न ही कोई इंटरव्यू होगा। छात्र को सीधे दाखिला मिलेगा। 1 अप्रैल से दाखिले शुरू होकर तक अगस्त के पहले हफ्ते तक चलेंगे। अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने के इच्छुक माता-पिता अपने निवास के निकटतम सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य, क्षेत्रीय शिक्षा अधिकारी अथवा जिला उपशिक्षा निदेशक के कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं। दाखिले के लिए अभिभावकों को सिर्फ फॉर्म लेकर जमा कराना है। किसी प्रकार की राशि नहीं वसूल की जाएगी। अभिभावक जिला उपशिक्षा निदेशक के संबंध में जानने के लिए शिक्षा निदेशालय की वेबसाइट देख सकते हैं। वेबसाइट पर जिला उप निदेशकों की सूची उनके कार्यालय पते के साथ उपलब्ध हैं।

कृषि कॉलेज को हरी झंडी